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बज गया बिगुल

बज गया बिगुल

उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में  विधानसभा चुनाव का नगाड़ा बज चुका है। कोरोना की चुनौतियां, ओमिक्रॉन के बढ़ते खतरे के बीच चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है। चुनाव आयोग ने 10 फरवरी से चुनाव की घोषणा की है। जिसमें यूपी में सात चरणों, मणिपुर में दो चरणों में चुनाव होंगे। इसके अलावा पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में एक एक चरण में चुनाव होंगे।  चुनाव आयोग द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार इस बार देश के पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में 18.3 करोड़ मतदाता चुनाव में मतदान करेंगे। आपको बता दें कि चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता भी लागू हो चुकी है। वहीं इस बार इन पांच राज्यों में सख्त कोरोना प्रोटोकॉल के साये में विधानसभा चुनाव होंगे। चुनाव आयोग के ऐलान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 7 चरणों में चुनाव होगा। यहां 403 विधानसभा सीटें हैं। जबकि पंजाब में एक चरण में चुनाव सम्पन्न कराया जाएगा। सुरक्षा की दृष्टि से मणिपुर में 2 चरणों में मतदान होगा। जबकि उत्तराखंड, गोवा में एक एक चरण में चुनाव होंगे। बता दें कि उत्तराखंड में 70 सीटों पर चुनाव होने हैं। इसके अलावा पंजाब में 117, मणिपुर में 60 तो गोवा में 40 विधानसभा सीटों पर चुनाव होंगे। बता दें कि 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने बंपर बहुमत के दम पर सरकार बनाई थी। तब यहां 403 सीटों में से भाजपा को 312 सीटें मिली थीं। 2012 से लेकर 17 तक सत्ता में रहने वाली सपा मात्र 47 सीटों पर आकर सिमट गई थी। इस चुनाव में बीएसपी को 19, कांग्रेस को 7 और अन्य को 5 सीटें मिली थी। यहां योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी थी।

अगर उत्तराखंड की बात करें तो यहां भाजपा अपने दम पर सरकार में आई थी। यहां 70 सीटों में में से भाजपा ने 56 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस के खाते में 11 सीटें आई थी। उत्तराखंड में भाजपा पिछले 5 साल में 3 सीएम बदल चुकी है। भाजपा ने यहां त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में सरकार बनाई। कुछ महीनों बाद तीरथ सिंह रावत सीएम बने। तो एक बार फिर उन्हें हटाकर पुष्कर सिंह धामी को पार्टी ने सीएम बनाया है।

अगर पंजाब की बात करें तो यहां कैप्टन अमिरंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने 10 साल से सत्ता में रहे अकाली दल और भाजपा की  जोड़ी को सत्ता से बेदखल कर दिया था। 117 सीटों वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने मोदी लहर को नाकाम करते हुए 77 सीटें जीती थी। जबकि अकाली दल को 15 सीटें मिली थी। भाजपा 03 सीटें ही जीत सकी थी। लेकिन सबसे कमाल किया था आम आदमी पार्टी ने। पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही आप ने 20 सीटें जीतकर सभी को हैरान कर दिया था। हालांकि 5 साल में सीन पूरा बदल चुका है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी है, अब उन्होंने नई पार्टी गठन कर ली है और अब उनकी पार्टी का गठबंधन भाजपा के साथ है।

भाजपा की कठिन राह

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान हो चुका है। 10 मार्च को जब चुनाव नतीजे आएंगे तो  भाजपा  यह जरूर चाहेगी कि उसे उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर के साथ-साथ सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में फिर से सत्ता हासिल हो। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से 2024 के आम चुनाव में उसकी जीत की दावेदारी बढ़ जाएगी। पिछले साल 2 मई को पश्चिम बंगाल असेंबली चुनावों के नतीजे ने भाजपा को झटका दिया था। उसके बाद हुए हालिया विधानसभा और संसदीय उप-चुनावों में भी भाजपा कुछ खास दमखम नहीं दिखा सकी थी।  केंद्र की सत्ता में आसीन देश के इस सबसे बड़े राजनीतिक दल का ध्यान उत्तर प्रदेश पर कुछ ज्यादा होगी क्योंकि उसे वहां बीते 34 वर्षों की परंपरा को तोडऩे की चुनौती से जूझना है। उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से कोई भी राजनीतिक दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर सका है। यहां भाजपा की सत्तावापसी इस लिहाज से बहुत मायने रखती है क्योंकि इस प्रदेश से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे अपार समर्थन मिला था। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में इस बार भी बाजी मार ली तो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की राजनीतिक पूंजी में इस लिहाज से पर्याप्त इजाफा हो जाएगा कि वो दोबारा बड़े सामाजिक-आर्थिक सुधारों की तरफ कदम बढ़ा सके। इस चुनाव में कृषि कानूनों की वापसी यूपी चुनाव का प्रमुख मुद्दा भले न हो, लेकिन यह बैकग्राउंड में तो जरूर रहेगा।

जहां तक बात पंजाब की है तो भाजपा  वहां पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और शिरोमणि अकाली दल संयुक्त (स््रष्ठ-स्) लीडर सुखदेव सिंह ढींढसा के साथ त्रीदलीय गठबंधन में शामिल है। वह पंजाब के शहरी हिंदू मतदाताओं से समर्थन की उम्मीद लगाए बैठी है। खासकर, 5 जनवरी को एक रैली को संबोधित करने जा रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में लगी सेंध के मुद्दे से उसकी यह उम्मीद बढ़ गई है। आखिर में भाजपा  की उम्मीद इस बात पर टिकी है कि भले ही उसे इस चुनाव में बहुत सीटें नहीं आ जाएं, लेकिन कृषि कानूनों को लेकर उससे दूर हुआ सिख समुदाय कुछ हद ही सही, नजदीक आएगा।

वहीं, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा जैसे छोटे राज्यों के चुनाव थोड़े पेचीदा हैं। उत्तराखंड में भाजपा ने लगातार मुख्यमंत्री बदले जिससे कांग्रेस को मजबूती मिली। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में भारी जनसमूह के उमडऩे से पार्टी राहत की सांस ले रही है। उसे लग रहा है कि उसके ताजातरीन सीएम पुष्कर सिंह धामी भ्रमित हो रहे मतदाताओं में पार्टी के प्रति फिर से विश्वास बहाली में सफलता पाई है। उधर, गोवा में राजनीतिक अस्थिरता ने इस चुनाव को मजेदार बना दिया है।

सेमीफाइनल का चोचला

पांच राज्यों के चुनाव घोषित होते ही मीडिया महोत्सव शुरू हो गया है। कहा जा रहा है कि ये चुनाव 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल हैं और भाजपा, कांग्रेस समेत उन सभी राजनीतिक दलों, जो इन चुनावों में मैदान में हैं, की अग्निपरीक्षा इन चुनावों में होगी। लेकिन वास्तविकता ये है कि ये चुनाव राजनीतिक दलों के लिए नहीं बल्कि आम जनता या मतदाताओं की अग्निपरीक्षा साबित होने जा रहे हैं। क्योंकि इन चुनावों के नतीजे ही मतदाताओं के मानस का पैमाना होंगे और उनके अनुसार ही देश की भावी राजनीतिक दिशा, दशा और उसके मुद्दे तय होंगे जो अगले लोकसभा चुनावों की भूमिका तैयार करेंगे। संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार, दैनिक भास्कर में लिखते है की ‘2022 राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा चर्चा में रहने वाला वर्ष होगा। पांच राज्यों में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जबकि साल के आखिर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे। जब लोकसभा चुनाव से पहले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होते हैं तो उन्हें सामान्य तौर पर सेमीफाइनल और लोकसभा चुनाव को फाइनल कहा जाता है। इस साल की शुरुआत में लोकसभा सीटों के हिसाब से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के चुनाव होने हैं।

जैसे कि किसी भी मैच में सेमीफाइनल जीतने के बाद सिर्फ फाइनल में पहुंचने की गारंटी होती है, फाइनल मैच जीतने की नहीं। वैसे ही लोकसभा चुनाव से कुछ माह या साल भर पहले होने वाले विधानसभा चुनावों में जीत लोकसभा चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है। जैसे सेमीफाइनल में जीत फाइनल जीतने की संभावनाएं बढ़ाती है, वैसे ही राज्यों के चुनावों में जीत से लोकसभा चुनाव जीतने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

इस साल चुनावों से हमें सिर्फ यह पता लगेगा कि किस पार्टी का इन राज्यों में ज्यादा जनाधार है, लेकिन परिणाम 2024 का संकेत नहीं होगा। कई राज्यों में 2023 में विधानसभा चुनाव होंगे, जो कि जाहिर तौर पर 2024 के करीब है, लेकिन उन परिणामों को किसी संकेत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। भारतीय चुनावों में ऐसा दौर रहा है, जब लोग एक ही दल को राज्य और केंद्र के लिए चुनते थे, लेकिन आज की राजनीति में यह रुझान नहीं दिखता।

पिछले पांच सालों में दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में चुनाव हुए, जहां पर मतदाताओं ने राज्य और केंद्र के लिए मतदान करते हुए बहुत ही अलग तरीके से वोट डाला। यह पैटर्न पिछले पांच सालों में बदल गया होगा, इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं। इसलिए स्पष्ट तौर पर मेरी राय में विधानसभा चुनावों के परिणाम इस बात का संकेतक नहीं होंगे कि 2024 में क्या होगा। इसलिए विधानसभा चुनाव के परिणामों से 2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर फैसला देने से बचना चाहिए।’

कांग्रेस का डगमगाता नाव

इन विधानसभा चुनावों के परिणाम का कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर भी असर होगा। जिन पांच  राज्यों में अभी चुनाव होंगे, वहां पर सिर्फ पंजाब में कांग्रेस की सरकार है, लेकिन उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर में वह प्रमुख विपक्षी दल है। इसलिए उसके लिए जरूरी है कि वह कुछ राज्यों में चुनाव जीते, ताकि 2024 की उम्मीदों को उड़ान देने के लिए उसके नेताओं और समर्थकों में विश्वास कायम हो।

कांग्रेस के लिए बेहतर प्रदर्शन का सबसे अच्छा मौका पंजाब में है, जहां वह अपनी सरकार बचाने के लिए लिए मैदान में है, जबकि उत्तराखंड और गोवा में वह प्रमुख विपक्षी दल है। राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड में हर पांच साल में सरकार बदल जाती है। भाजपा यहां पर पिछले पांच सालों से सरकार में है, इसलिए कांग्रेस के पास उत्तराखंड जीतने का मौका है। लेकिन चुनाव अपने समर्थकों को संगठित करके जीते जाते हैं, किसी तय नियम से नहीं।

ऐसे नियम पिछले सालों में कई राज्यों में टूटे हैं और केरल इसका ताजा उदाहरण है। इसलिए कांग्रेस को भाजपा को हराने के लिए कड़ी मेहनत की जरूरत है, खासकर राज्य की राजनीति में ‘आप’ के प्रवेश को देखते हुए, जो कि कुछ भाजपा विरोधी मतों को अपने पक्ष में करके कांग्रेस की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।

इसमें कोई शक नहीं है की ‘आप’ विभिन्न राज्यों में अपना आधार बढ़ाने के लिए कड़ी कोशिश कर रही है। उसकी कोशिश है कि अगर वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर कांग्रेस को हटाने में कामयाब नहीं भी होती है, तो भी कम से कम कई राज्यों में कांग्रेस के पतन की वजह से बनी जगह को भर सके। इसका बहुत सा दारोमदार पंजाब व अन्य राज्यों में कांग्रेस के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। पंजाब में जीत निश्चित ही ‘आप’ की संभावनाओं को बढ़ाएगी और राष्ट्रीय राजनीति में केजरीवाल को एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरने में मदद करेगी।

इसी तरह जो अन्य नेता राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका की उम्मीद कर रही हैं, वह हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। पिछले साल बंगाल में तृणमूल की जबरदस्त जीत के बाद वह अन्य राज्यों में तृणमूल का आधार बनाने के लिए कड़ी कोशिश कर रही हैं। पार्टी अन्य दलों के कई नेताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रही है। लेकिन तृणमूल को आने वाले विधानसभा चुनावों में कुछ राज्यों में अपनी उपस्थिति महसूस करानी होगी, ताकि ममता बनर्जी भाजपा को चुनौती देने वाली सर्वमान्य विपक्षी नेता होने का दावा कर सकें।

बिहार और पश्चिम बंगाल की तरह ये विधानसभा चुनाव भी कोरोना महामारी के संक्रमण की छाया में हो रहे हैं। बिहार के चुनाव कोरोना की पहली लहर के उतार के दौर में हुए थे, जबकि पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के चुनाव कोरोना की दूसरी लहर के चरम दौर में हुए जब पूरे देश में कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों और इलाज की अफरातफरी से लोग जूझ रहे थे। अब पांच राज्यों के चुनाव कोरोना की तीसरी लहर के उस शुरुआती दौर में शुरू हुए हैं जब आशंका है कि अगर जरूरी कदम न उठाए गए तो तीसरी लहर भी भयावह हो सकती है। इसीलिए इस बार पहले से सबक लेकर चुनाव आयोग ने कोरोना प्रतिबंधों के सख्ती से पालन करने का संदेश और निर्देश राजनीतिक दलों और लोगों को दिया है। 2022 के विधानसभा चुनाव का मंच और भारतीय राजनीति पर इसका क्या प्रभाव होगा, यह अब तक पूरी तरह खुला है। वर्चुअल रैली, डोर टू डोर कैंपेन जैसे शर्तों के साथ सभी पार्टियां अपनी तैयारियों में लग चुकी हैं। आने वाले महीनों और 2024 के फाइनल से पहले के दो सालों में चीजें कैसे बदलेंगी, यह भविष्य के गर्भ में है और इसके लिए थोड़ा इंतजार का मजा लेना ही होगा।

 

नीलाभ कृष्ण

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