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चौमुखी चुनौतियों के चक्रव्यूह में उत्तर प्रदेश के चुनाव

चौमुखी चुनौतियों के चक्रव्यूह में उत्तर प्रदेश के चुनाव

चुनावी बिगुल के बीच उत्तर प्रदेश में आया राम और गया राम की कहानियां तेजी से दोहराई जाने लगी हैं। पांच साल तक सत्ता की मलाई खा चुकी आत्माएं अचानक जाग गई हैं। चाहे समाजवादी पार्टी से भारतीय जनता पार्टी की ओर आ रही आत्माएं हों या फिर भारतीय जनता पार्टी को छोडक़र समाजवादी पार्टी में जा रही पुण्यात्माएं, सबकी नैतिकता बड़ी तेजी से जाग रही है। राजनीति, जिसकी पहली शर्त सिद्धांत होनी चाहिए, वह पीछे छूटती नजर आ रही है। जब से राजनीति में पैसे और रसूख का बोलबाला बढ़ा है, तब से ऐन चुनावों से पहले नैतिकताएं जागने का खेल बढ़ा है। सिद्धांत और विचार भी याद आने लगते हैं।

पिछले सात साल के दौरान एक शब्द बहुत व्यापक हुआ है, नैरेटिव। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिंदी पत्रकारिता ने बहुत शब्द गढ़े थे। बाद के दिनों में हिंदी कविता के छायावादी दौर ने नए-नए शब्दों का ठोस वितान रचा। लेकिन आज के दौर में यह कार्य मीडिया, शैक्षिक और शोध संस्थान के स्कंधों पर जमी वाम वैचारिकी ने शब्द गढऩे और प्रचलित करने की यह भूमिका तेजी से निभाई है। नैरेटिव इसी वैचारिकी ने गढ़ा है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी से स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान की आत्मा के जाग जाने और अचानक से अपनी नई राह ढूंढऩे की कहानियों के बहाने भी वाम वैचारिकी द्वारा प्रचलित यह शब्द चर्चा में आ गया है। कहा जाने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी ने पिछड़े आधार का जो नैरेटिव सेट किया था, वह अब फेल हो गया है। पहले ओमप्रकाश राजभर ने भाजपा का साथ छोड़ा था, और बाद में स्वामी प्रसाद मौर्य ने। जाहिर है कि वैचारिकी की बुनियाद पर नई कहानियों की खोज में डूबे रहने वाले मीडिया को इनमें कहानियां नजर आएंगी ही।

राजनीति चूंकि धारणाओं का खेल है। चूंकि आज की राजनीति जिस पश्चिमी मॉडल के लोकतंत्र की नौका की पतवार बनने की कोशिश करती रहती है, उसमें संख्या का महत्व है। यूं तो हजारों साल से भारतीय समाज वर्ण व्यवस्था की बुनियाद पर आगे बढ़ता रहा है। इसमें किंचित बुराइयां भले ही आईं, लेकिन यह सामाजिक ताने-बाने का केंद्र रहा है। लेकिन लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप ने इसे और बढ़ावा ही दिया है। लोहियावादी राजनीति एक तरफ जाति तोडऩे की बात करती थी और दूसरी तरफ ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ का नारा भी लगाती रही। जाति तोडऩे और जाति को ताकत देने की इस राजनीति के बीच से जातिवाद लगातार उभरता चला गया। लोहियावादी समाजवाद से निकली तमाम पार्टियां सिर्फ और सिर्फ जातीय अंकगणित के आधार पर बढऩे लगीं। और इतना बढ़ीं कि इस धारा की पार्टियों के बारे में आम धारणा यह स्थापित हो गई कि फलां का मतलब यादव की पार्टी तो फलां का मतलब कोइरी-सैनी की पार्टी तो फलां का मतलब पटेल-कुर्मी की पार्टी। इसे दुर्योग कहें या संयोग कि भारतीय राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने और बदलाव की वाहक बनने में लोहियावादी समाजवाद और भारतीय जनसंघ सहयोगी रहे। सहयोग की बुनियाद पर कांग्रेस को पहली बार 1963 के चुनावों में चुनौती देने उतरी लोहियावादी समाजवाद की धारा लगातार जातिवाद की ओर बढ़ती गई। इसी चुनाव में जनसंघ के महासचिव रहते जौनपुर से मैदान में उतरे दीनदयाल उपाध्याय ने कार्यकर्ताओं की तमाम मांग को दरकिनार करते हुए खुद को ब्राह्मण घोषित करते हुए वोट मांगने से इनकार कर दिया। तब उन्होंने कहा था कि इससे वह भले ही जीत जाएंगे, लेकिन सिद्धांत हार जाएगा। जनसंघ और बाद के दौर में उसके परवर्ती रूप भारतीय जनता पार्टी ने इसी सैद्धांतिकी के सहारे राजनीति की। लेकिन वह आधुनिक राजनीति के साध्य सत्ता से दूर रहा। बाद में उसे भी अघोषित रूप से इस तरह की राजनीति में अपनी राह तलाशनी पड़ी। हालांकि उसे बाम्हन और बनियों के साथ ही शहरी खाए-अघाए लोगों की पार्टी कहा जाता रहा। यह बात और है कि बाद में जब गोविंदाचार्य की अगुआई में इसने अपनी सोशल इंजीनियरिंग शुरू की, पिछड़े वर्ग में उसने अपना आधार बढ़ाया तो उसका भी आधार बढ़ा। जाहिर है कि इस बुनियादी सोच के साथ विकसित भाजपा का साथ स्वामी प्रसाद मौर्य या ऐसे ही नेता अपनी कथित अंतररात्मा के नाम पर पार्टियां छोड़ेंगे तो भाजपा विरोधी वाम वैचारिकी को अपने ‘नैरेटिव’ को प्रचारित करने का मौका तो मिलेगा ही।

राजनीति का मूल उद्देश्य यह नहीं है कि वह जातियों के आधार पर अपना विकास करे। भारतीय परंपरा में ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की गहरी अवधारणा रही है। अंग्रेजों की सत्ता आने के पहले तक के भारतीय सामाजिक ढांचे को देखना और समझना हो उन्हें जयप्रकाश नारायण के निबंध ‘भारतीय समाज व्यवस्था’और धर्मपाल की लिखी किताब ‘भारत का स्वधर्म’ के गुजर जाना चाहिए। बहरहाल आज की राजनीति जातियों को खत्म करने की बजाय प्रकारांतर से उसे बढ़ावा देने की ही कोशिश करती है। जातीय स्वाभिमान और अधिकार दिलाने के नाम पर गठित पार्टियों ने अपनी जातियों का कितना भला किया, यह तो शोध का विषय है। लेकिन यह साफ है कि जाति आधारित पार्टियों के नेताओं ने अपने लिए लोकतांत्रिक राजतंत्र को बढ़ावा जरूर दिया है। जहां लोक की बजाय उनके परिवार को तवज्जो देना सबसे बड़ा लक्ष्य है। लोहियावादी समाजवाद से नाम पर विकसित पार्टियां तो प्राइवेट लिमिटेड बन ही चुकी हैं, अब छोटी जातियों की पार्टियां भी इसी आधार पर आगे बढ़ रही है। स्वामी प्रसाद मौर्य की नैतिकता हो या ओमप्रकाश राजभर का स्वाभिमान, सिर्फ इसलिए जागता है कि उनके परिवार को उस राजनीतिक धारा में तवज्जो नहीं मिली, जिसके साथ वे रहे।

रही बात भारतीय जनता पार्टी की तो उसने भी पिछले चुनाव में धड़ल्ले से उन लोगों को शामिल किया था। उनमें से 67 लोगों को उसने टिकट भी दिया था। इनमें से भी 54 तो ऐसे थे, जो ऐन चुनावों से पहले ही भाजपा में शामिल हुए थे। वैसे आम धारणा यह है कि राजनीति में जिस तरफ भगदड़ मचती है, उस पार्टी का पलड़ा भारी माना जाता है। इस लिहाज से नैरेटिव विकसित करने की कोशिश भी हो रही है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार के तमाम कार्यों के बावजूद भाजपा विधायकों और मंत्रियों तक को लेकर उनके वोटरों की राय अच्छी नहीं है। कह सकते हैं कि जिस तरह 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी और भारतीय जनता पार्टी से लोग खुश थे, लेकिन अपने स्थानीय भाजपा सांसद से संतुष्ट नहीं थे, उत्तर प्रदेश में कुछ-कुछ वैसा ही माहौल है। इसलिए ऐसी खबरें हैं कि भाजपा इस असंतुष्टि को थामने के लिए पचास से साठ विधायकों का टिकट काट सकती है। दारा सिंह चौहान हों या स्वामी प्रसाद मौर्य या विनय शाक्य, भाजपा का साथ छोडऩे और उनकी नैतिकता जाग जाने की एक बड़ी वजह यह भी है।

अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल और ओमप्रकाश राजभर की पार्टी जैसे कई छोटी पार्टियों से गठबंधन कर लिया है। छोटी पार्टियों के उनकी तरफ आने से वे उत्साहित भी हैं। लेकिन जिस तरह उनके आधार वोट बैंक की जाति ने अभी से दबंगई दिखानी शुरू की है, वह मतदान में नकारात्मक असर दिखा दे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। बलिया में जिला परिषद के चुनावों में समाजवादी पार्टी की जीत और उसके बाद निकाले गए जुलूस के लोगों ने जिस तरह राज्य सरकार के मंत्री उपेंद्र तिवारी के दरवाजे के बाहर उत्पात मचाया था, उसे लोग भूल नहीं पाए हैं। छोटी जातियों के लोगों के बीच चर्चा है कि जब सरकार ना होने पर मंत्री तक तो समाजवादी कार्यकर्ता दरवाजे पर चढक़र चुनौती दे सकते हैं तो सत्ता में आने के बाद वे क्या करेंगे? इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

राज्य सरकार की नौकरशाही भी समाजवादी कार्यकर्ताओं की सोच से आक्रांत रहती रही है। कई अधिकारी निजी बातचीत में इसे स्वीकार भी कर रहे हैं। जाहिर है कि यह सोच समाजवादी पार्टी के खिलाफ जाएगी। अखिलेश की एक चुनौती यह भी है कि गठबंधन में शामिल सभी छोटे दल अधिक से अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं। 12 जनवरी को राष्ट्रीय लोकदल के साथ सीट बंटवारे को लेकर हुई बैठक में जयंत चौधरी पहुंचे ही नहीं। जाहिर है कि अखिलेश को दो तरह का दबाव झेलना पड़ रहा है। स्थानीय सीटों पर सक्रिय अपने कार्यकर्ताओं को साधे रखना और अपने सहयोगियों के लिए उन्हें अपनी दावेदारी छोडऩे के लिए मनाना।

भाजपा का साथ छोड़ते लोगों के चलते उसकी चुनौतियां तो जाहिर हो ही रही हैं। उसे कोइरी, कुर्मी, नोनिया, राजभर, सैनी आदि जातियों का भरपूर समर्थन रहा है। ब्राह्मण के नाराज होने की कहानियां खूब सुनाई गई हैं। लेकिन यह भी सच है कि ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा अब भी भारतीय जनता पार्टी के साथ है। चुनावों से पहले जातीय गोलबंदी के जरिए ताकत दिखाने का खेल शुरू हो जाता है। हाल ही में दिल्ली में हुई त्यागी समाज की एक बैठक में शामिल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों की मान लें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के चलते छिटके जाट समुदाय के लोगों के एक बड़े हिस्से का मन बदल चुका है। यह संयोग नहीं है कि मोदी सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लगातार एक साल तक आंदोलन चलाने वाले राकेश टिकैत भी बयान देने लगे हैं कि भाजपा ही बढ़त पर है।

चुनावों के पहले राजनीति की ओर से वायदों की बरसात अनजानी नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि आज की जनता इन वायदों को समझने लगी है। भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में कुछ कदम भी माने जा रहे हैं। मुफ्त राशन, किसान सम्मान निधि और प्रधानमंत्री आवास जैसी योजनाओं ने समाज की सोच को बदला है। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में आये बदलाव ने एक बड़े वर्ग को राहत दी है। विशेषकर महिलाएं इससे खुश नजर आ रही हैं। एक टेलीविजन रिपोर्ट में पति के उलट पत्नी खुलकर योगी राज की कानून व्यवस्था की स्थिति को बेहतर बताने से नहीं हिचकी। लड़कियों के स्कूलों और कॉलेजों के सामने शोहदों की जुटान पर लगी रोक भी महिलाओं का मानस बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है। चुनाव आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश में इस बार 52 लाख 80 हजार 882 नए मतदाता जुटे हैं। जिनमें लडक़ों की तुलना में लड़कियां करीब पांच लाख ज्यादा है। उनकी संख्या है 28 लाख 86 हजार 988। यह कोई मामूली संख्या नहीं है और चुनाव नतीजों को प्रभावित करने में इसकी बड़ी भूमिका होगी। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पुराना वोटर कई बार वोटिंग के लिए उदासीन भी हो जाता है, लेकिन नया मतदाता ज्यादा उत्साहित होता है। राम मंदिर का निर्माण, विश्वनाथ धाम का कायाकल्प और मथुरा की तैयारी भी भाजपा के वोटरों में जान फूंकने के लिए काफी है। राममंदिर के प्रभाव को देखना हो तो अयोध्या की यात्रा करनी चाहिए, जहां उमडऩे वाली भीड़ और उसकी आपसी चर्चाओं पर गंभीरता से ध्यान देने के बाद पता चल सकता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति किस मोड़ पर खड़ी है।

रही बात कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी की, तो उनके लिए खोने को बहुत कुछ नहीं है। प्रियंका गांधी की अगुआई में पिछले कुछ साल से कांग्रेस लगातार प्रमुख विपक्ष की भूमिका निभाते नजर आई है। लेकिन वह अपनी इस सक्रियता को वोटों में कितना बदल पाती है, यह देखा जाना दिलचस्प होगा। बहुजन पार्टी का जो हाल है, वह भी छुपा नहीं है। वैसे माना जा रहा है कि गैर जाटव दलित समुदाय के वोटरों पर वह अपनी पकड़ खो चुकी है। पिछले चुनाव में इन वोटरों ने भाजपा का साथ दिया था। अभी तक यह वोटर मुखर नजर नहीं आ रहा है।

राजनीति के दो रूप होते हैं। ऑन रिकॉर्ड वह आदर्शवाद की बात करती है और ऑफ द रिकॉर्ड उसे धत्कर्मों से परहेज नहीं रहता। पहले सूचनाओं का इतना प्रवाह नहीं था, उसके संसाधन भी नहीं थे। लिहाजा तब जनता इस ऑफ द रिकॉर्ड और ऑन द रिकॉर्ड की हकीकत को पहचान नहीं पाती थी। लेकिन चीजें बदल गई हैं। सूचना क्रांति ने जहां कई विकृतियों को बढ़ावा दिया है, वहीं लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में भी काम किया है। क्षुद्र सोच और समूहवादी मानसिकता से इतर सोचने वाले लोग भी हुए हैं। जो जातीय आधार की बजाय अलग ढंग से सोच रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चुनाव में उनका भी असर नजर आएगा।

 

उमेश चतुर्वेदी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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