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कांग्रेस को ले डूबी वंशवाद की राजनीति

कांग्रेस को ले डूबी वंशवाद की राजनीति

वंशवाद राजनीति के दो पहलू हैं एक जिसमें लोकतंत्र की स्थापना से पहले राजाशाही में सत्ता का स्थानांतरण पिता से अपनी संतान को कर दिया जाता था जो लोकतंत्र में भी प्रजातंत्र का जामा पहनाकर हो रहा है यह देश के लिये खतरनाक है। दूसरा पहलू है कि जहां परिवार का कोई सदस्य सक्रिय रूप से राजनीति में है। सत्ता पर काविज अपने परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य पिता, मां, भाई, बहिन आदि की सहायता कर रहा है और सीधे जनता से सेवा के माध्यम से जुड़ा हो। अपने निजी कार्यों के बल पर राजनीति में भागेदारी चाहता हो, ऐसे परिवार के सदस्य को रोका नहीं जा सकता। उसे स्वत: ही जनता का साथ मिलने लगता है इस रूप को वंशवाद की राजनीति कह कर विरोध करना अनुचित होगा।

यदि किसी पार्टी के बड़े नेता जो सत्ता में शीर्ष पद पर हो अपने बेटे को सीधा सत्ता सौंपने का प्रयास करता है, इसे शुद्ध वंशवाद परिवारवाद की राजनीति ही कहा जायेगा। पार्टी के अध्यक्ष अपने बेटे, बेटी या परिवार के किसी सदस्य को अपने प्रभाव से पद ट्रंासफर करवा लेते हैं या कई मुख्यमंत्री आदि इस तरह से करते हैं तो यह प्रजातंत्र का गला घोंटने जैसा होगा। यह देश और जनता को हानिकारक होगा। इस तरह नालायक अयोग्य व्यक्ति को भी सत्ता मिल सकती है जो नेतृत्व देने में असफल हो जायेगा और इसका खामियाजा देश को और जनता को भुगतना पड़ेगा।

अधिकांश राजनैतिक पार्टियों के नेता इसका दुरूपयोग कर वंशवादी व्यवस्था को जिन्दा किये हुये है। दक्षिण भारत में ऐडीएमके और डीएमके पार्टियां इसके सटीक उदाहरण हैं। जहां पूरी ही पार्टी परिवार के किसी सदस्य को सौंप दी जाती है। यही हाल उत्तरी भारत में बिहार में लालू यादव की पार्टी और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की पार्टी और अजीत सिंह ने भी अपने पुत्र को पार्टी की कमान देकर किया है। लालू यादव ने तो प्रजातंत्र का जो मजाक बनाया उसका दूसरा उदाहरण मिलना कठिन है। अपनी पत्नी राबड़ी देवी को जो स्वयं लिखना पढऩा नहीं जानती जिन्हें सरकार की संरचना तक की जानकारी नहीं को ही मुख्यमंत्री बना दिया। सभी वरिष्ठ अनुभवी नेता उनकी लाईन में पीछे लग गये। पूरे परिवार को ही राजनैतिक पद सौंपनें या दिये जाने की पूरी व्यवस्था कर दी। यही हाल उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ने अपने पूरे कुनबे दूर-दराज के सभी रिश्तेदारों को राजनैतिक पदों से सुशोभित करा दिया। बेटे को मुख्यमंत्री भी बना दिया। भाई-भतीजे से बेटे, साले, जीजा, भान्जे सभी को संवैधानिक पद देकर पूरी सरकार परिवार रिश्तेदारमय कर दी।

यही हाल कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस ने भी किया, पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता पर नेहरू परिवार काब्रिज रहा। यहां तक कि पार्टी की बागडोर एक विदेशी मूल की महिला को सौंप दी जिन्हें न राजनीति की समझ न अनुभव था। 25 वर्ष होने को आ गये, सोनिया जी अभी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनी हुयी हैं। बीच में उन्होंने अपने बेटे को ही अध्यक्ष बना दिया था। जनता ने राहुल गांधी के नेतृत्व को नकार दिया तो फिर पुन: वे अध्यक्ष बन गयी। इस तरह से किसी पार्टी या सरकार का हस्तांतरण ही देश को खतरा रहता है। बाकी उनके पुत्र को सांसद, विधायक आदि का चुनाव लड़े जाने पर किसी को एतराज नहीं रहा होगा। एक ही परिवार के लोग एक के बाद एक 60-70 साल तक बनते जाये तो उससे ज्याद प्रजातंत्र का मजाक और क्या हो सकता है।

शिवसेना के उद्धव ठाकरे भी पार्टी अध्यक्ष बन गये उनके पिता बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद में मुख्यमंत्री भी बन गये जिन्हें 1 दिन भी सरकार चलाने का अनुभव नहीं था कभी किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे। परिवार में किसी को एमएलए, एमपी, का टिकिट दिया जाना गलत नहीं। ये वंशवाद की राजनीति नहीं कही जा सकती न वंशवाद की परिधि में आता है। टिकिट पाकर चुनाव लडऩे और सत्ता से सत्ता की कुर्सी को हस्तांतरण कर परिवार में किसी को देने में बड़ा फर्क है।

जब राजनैतिक पार्टियों में वंशवाद की बात आती है तो सबसे ज्यादा प्रश्न कांग्रेस पार्टी पर उठाये जाते हैं। एक ही परिवार के उत्तराधिकारी एक के बाद एक पार्टी के अध्यक्ष और यहां तक की प्रधानमंत्री बनते रहे। हद तो तब हो गयी जब परिवार में अन्य लोंगों के होते हुये विदेशी मूल की सोनिया गांधी अध्यक्ष बन गयी। इसका कारण केवल परिवार की चाहत ही नहीं हैं, परन्तु उन नेताओं का भी हाथ है जो सत्ता परिवार के सदस्यों को सत्ता सौंपना चाहते हैं। जब सत्ता में रहते हुये किसी नेता को मार दिया जाता है तो स्वयं पार्टी के अन्य नेता उसी परिवार के किसी सदस्य को पार्टी का मुखिया बनाकर सहानुभूति लहर का फायदा उठाते हैं। सत्ता में रहते हुये अधिकांश नेता परिवार के सदस्यों को ही पद देकर बढ़ाते जाते हैं दूसरी लाईन में किसी अन्य नेता को लगातार बढऩे का अवसर नहीं देते हैं ऐसे में अयोग्य पुत्र, पुत्रियां शीर्षस्थ स्थान पर पहुंच जाते हैं। जब संघर्ष का समय आता है तो नेतृत्व की क्षमता न होने के कारण पार्टी चुनाव हारती जाती है। कांग्रेस के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। राजीव गांधी की अकाल मृत्यु के कारण उनकी पत्नी को अवसर मिलते ही पार्टी अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने अपने को मजबूत रखने के लिये गैर राजनैतिक मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। हद तो जब हो गयी कि वे लोक सभा का चुनाव दिल्ली से हार गये फिर भी आसाम से उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाकर प्रधानमंत्री बनाया गया। इसके बाद जब संघर्ष का समय आया तो पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह दोनों ही नेतृत्व देने में नाकाम रहे। इस तरह पार्टी डूबती चली गयी। इससे 10 साल में भारत विकास की गति मे पिछड़ गया। यही हाल प्रदेशों का रहा। परिवारवाद की राजनीति की तो हद ही हो गयी है। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के बेटे ने उनके पिता की मौत के बाद, बिहार में रामविलास पासवान की मौत के बाद और लालू यादव की बीमारी के बाद उनके बेटों ने पार्टी संभाली। जिस तरह जमीन, जायजाद, फैक्टरी, दुकान, व्यापार बच्चों को ट्रांसफर होता है इसी तरह पार्टियां भी बच्चों को ट्रांसफर की जाने लगी। लोकतंत्र की हत्या का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। अब इसकी दूसरे पहलू से चर्चा करें तो क्या परिवार के लोगों को राजनीति नहीं करने देना या नेतृत्व देनें से रोका जाना भी प्रजातंत्र की हत्या होगी। प्रत्येक व्यक्ति को अपने हिसाब से, विचारों से कार्य करने का अधिकार है।

कुछ लोग भाजपा पर भी पश्न उठाते हैं पर भाजपा में आज तक किसी भी अध्यक्ष ने पार्टी की अध्यक्षता किसी भी परिवार के सदस्य को कभी ट्रांसफर करने की कोशिश नहीं की। कुषाभाऊ ठाकरे, जनकृष्ण मूर्ति, बंगारू लक्ष्मण, वैंकेया नायडू, लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, और अमित शाह के बेटे बेटियां कोई भी राष्ट्रीय तो क्या प्रदेश तक के अध्यक्ष नहीं बनाये गये। इसके पूर्व भी अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि किसी के भी परिवार के सदस्यों को भी बनानें का न प्रयास हुआ न ही कोई बना। ये स्वस्थ्य लोकतंत्र है हालांकि कि परिवार के किसी सदस्य को अपनी दम पर अध्यक्ष पद के स्थान तक पहुंचने में किसी का कोई आपत्ति नहीं होना चाहिये।

भाजपा के विरोधी अक्सर प्रमोद महाजन की बेटी या राजनाथ सिंह के बेटे की बात करते हैं परन्तु उन लोगों का राजनीति में आना कतई वंशवाद की राजनीति में नहीं है। प्रमोद महाजन की पुत्री को उनकी मृत्यु के बाद टिकिट मिला, महाराष्ट्र भाजपा का अध्यक्ष नहीं बनाया गया। राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। कभी उनके पुत्र पंकज सिंह को आगे बढ़ाने का उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया। यहां तक कि जब वे राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तब उनके बेटे को पार्टी टिकिट देने का प्रस्ताव आया तो उन्होनें बेटे को टिकिट दिये जाने के प्रस्ताव पर असहमति जतायी और बेटे का टिकिट रोक दिया था। लम्बे समय तक सतत राजनीति करने के बाद ही उनके पुत्र को विधायक का टिकिट मिला, वे जीते। पंकज सिंह यदि राजनाथ सिंह के पुत्र न होते तो शायद मंत्री भी बन गये होते। जिन नेताओं के परिवार के लोग क्षेत्र में जनता से जुड़े हों और रात दिन काम करते हों वे जनता में लोकप्रिय हो जाते हैं और राजनीति का अनुभव और ज्ञान भी उन्हें होता है।

नेताओं के परिवार के लोगों का राजनीति में आना गलत नहीं न ही उन्हें रोका जा सकता। उन्हें भी राजनीति करने का पूरा अधिकार है पर कोई नेता अपने पद का या सत्ता का दुरूपयोग करके अपने पद पर स्थापित करे यह गलत है। ऐसी वंशवाद की राजनीति रोकी जाना चाहिये। भाजपा को छोड़कर लगभग सभी बड़ी-छोटी पार्टियां अपने परिवार के लोगों को ही पार्टी की कमान सौंप देती है। जिस तरह से घर का व्यापार बच्चों को ट्रांसफर किया जाता है। भाजपा के अतिरिक्त कोई अन्य पार्टी ऐसी नहीं जो वंशवाद की राजनीति न करती हो। अपने परिवार के सदस्यों को लोकतंत्र के सारे मूल्यों को तिलांजलि देकर पार्टी या सरकारी पदों का हस्तांतरण न करते हों।

 


डॉ. विजय खैरा

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