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टक्कर सरदारों की

टक्कर सरदारों की

विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पंजाब में सियासी सरगर्मियां बढ़ गई हैं। सभी सियासी पार्टियां सत्ता पर काबिज होने के लिए मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी पार्टियां प्रचार-प्रसार जुट चुकी हैं। सभी राजनीतिक दल वोट बैंक को साधने के लिए वोट बैंक को साधने के लिए अलग-अलग रणनीतियां तैयार कर रही हैं। पंजाब में सभी सियासी पार्टियों की निगाह हिंदू वोट बैंक पर टिकी हुई हैं। इसी बाबत शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी हिंदू वोट बैंक को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश कर रही है। चूंकि भारतीय जनता पार्टी को किसान आंदोलन की वजह से हर तरफ से विरोध का सामना करना पड़ा रहा है, इसलिए वह खास तौर से हिंदू आबादी वाले क्षेत्र में ज्यादा मेहनत कर रही है। विधानसभा चुनाव में हिंदू वोट बैंक के सहारे ही सियासी दलों की नैय्या पार हो सकती है।

पंजाब को मुख्य तौर पर तीन क्षेत्रों में बांटा गया है। माझा मालवा और दोआबा। प्रधानमंत्री  मोदी  ने जिस तरह से तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की अचानक घोषणा की, उसने पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरणों को ही बदलकर रख दिया। तमाम राजनीतिक दल मंथन व नई योजना बनाने में लग गए। दोआबा से लेकर माझा व मालवा में राजनीति बदलने लगी है। प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले पंजाब की राजनीति में किसान आंदोलन एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना हुआ था और पूरे चुनाव को प्रभावित कर सकता था, लेकिन केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानून को वापस लेने के फैसले के बाद चुनावों में अब दिलचस्प लड़ाई दिख रही है। राजनीतिक दल जिस मुद्दे पर सरकार को घेरने की योजना बना रहे थे, उसके खत्म होने के बाद अब उनके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध सकें।

पंजाब में चार बड़ी पार्टियां हैं- कांग्रेस, शिरोमणी अकाली दल, आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी। कृषि कानूनों से जुड़ी सियासत ने पंजाब के कई राजनैतिक समीकरण बदले हैं, जैसे- लंबे समय से चलता आया शिरोमणी अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठबंधन इसी मुद्दे पर टूटा। कैप्टन ने पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ा, फिर कांग्रेस पार्टी छोड़ खुद की नई पार्टी बनाई। उन्हें साथ मिला भाजपा का।

शिरोमणी अकाली दल का बड़ा आधार पंजाब के गांव हैं। इसलिए शहरी इलाकों में पकड़ मजबूत करने के लिए गठबंधन किया गया बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ।  बसपा पंजाब के दोआबा इलाके और शहरी हिस्सों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही है। वहीं आम आदमी पार्टी तय नहीं कर पा रही कि किसके साथ जाए। बैंस ब्रदर्स, टकसाली अकालियों समेत कई ऐसे पावर सेंटर हैं जो अपने-अपने इलाके में अच्छे वोट खींच सकते हैं।

पंजाब में राज उसी पार्टी का होता है, जो मालवा जीत लेता है। कुल सीटों में सबसे ज्यादा यानी 69 सीटें मालवा क्षेत्र में हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने यहां से 40 सीटें जीतीं थीं। कैप्टन अमरिंदर सिंह खुद मालवा से हैं। उनका मालवा में जनाधार भी है। बेअदबी कांड के कारण मालवा में अकाली दल का खासा नुकसान हुआ और अकाली दल को करारी चोट मालवा से ही लगी। मालवा में आप का जनाधार खासा बना हुआ था। कांग्रेस व आप में घमासान होने के पूरे आसार बने हुए थे लेकिन अब सियासी खेल में भाजपा की एंट्री हो गई है।

यह तो अब सामने आ ही गया है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह व भाजपा मिलकर चुनाव लड़ेंगे। गठबंधन को धार देते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस को मालवा में बड़ा नुकसान कर सकते हैं। भाजपा भी मालवा से कई जाट सिख नेताओं को पार्टी में ला सकती है। भाजपा के नेता इस पर योजना तैयार करने में लग गए हैं।  सुखबीर बादल का भी मालवा में कुछ सीटों पर जनाधार है। जिसमें उनकी पैतृक सीट मलोट, मुक्तसर, बठिंडा में अकाली दल का पक्का वोट बैंक है। सुखबीर बादल खुद जलालाबाद से चुनाव लड़कर जीत चुके हैं। ऐसे में मालवा में टक्कर अब अकाली दल-बसपा, कांग्रेस, आप व भाजपा में हो सकती है। मालवा से किसानों का रुख क्या रहेगा? इस पर भी सबकी नजर है।

हिन्दू है ह्रदय

पंजाब में हिंदू वोट बैंक की बात की जाए तो करीब 39 फीसद हिंदू और 33 फीसद अनुसूचित जाति (हिंदू और सिख) चुनाव में जीत दर्ज करने में अहम किरदार अदा करते हैं। पंजाब कांग्रेस ने मास्टरस्ट्रोक खेलते हुए दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। कांग्रेस आलाकमान के इस फैसले कहीं न कही अन्य राजनीतिक पार्टियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं उप मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ओपी सोनी को बैठाकर कांग्रेस ने हिंदू वोट बैंक में सेंधमारी करने की कोशिश जरूर की है लेकिन कैप्टन अमरिंदर के इस्तीफा देने के बाद यह वोट बैंक कहीं न कहीं जाने कांग्रेस के पाले से खिसक सकता है। पंजाब की सियासत में यह देखा भी गया है कि हिंदू वोट बैंक जिस पाले में जाता है सरकार उसी पार्टी की बनती है। हालांकि पंजाब कांग्रेस के पास जट्ट नेताओं की कमी नही हैं लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह के भाजपा से मिल जाने से पंजाब में कांग्रेस की परेशानी बढ़ा दी है।

भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो पार्टी का ज्यादातर चुनावी एजेंडा हिंदुत्व पर रहता है। हालांकि अभी किसान आंदोलन की आंच से भारतीय जनता पार्टी का पक्ष कमजोर है लेकिन अगर दूसरी सियासी पार्टी हिंदू वोट बैंक को साधने की सही रणनीति तैयार नहीं कर पाती है तो पंजाब में इसका सीधा फ़ायदा भाजपा को मिलेगा। वहीं अगर शिरोमणि अकाली दल की बात की जाए तो शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल हिंदु वोट बैंक को अपने साथ जोडऩे की लगातार कोशिश कर रहे हैं। चूंकी शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन में एक साथ चुनाव लड़ रही है। तो इस बाबता सुखबीर सिंह बादल ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी की सरकार में एक अनुसूचित जाति और एक हिंदू मुख्यमंत्री होगा। वहीं सुखबीर सिंह बादल भी हिंदू वोट बैंक को साधने की कोशिश में अपनी घोषणाओं में हिंदूओं पर खास ध्यान दे रहे हैं।

कैप्टन फैक्टर

कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब के सीएम रहने के साथ ही राज्य के गृहमंत्री भी रहे हैं।  कहना गलत नहीं होगा कि पंजाब के हालातों को जितने बेहतर और करीबी तरीके से कैप्टन समझ सकते हैं, शायद ही कोई अन्य समझ सकता होगा। अमरिंदर सिंह की मानें, तो पाकिस्तान के साथ सीमा साझा करने वाले पंजाब में बीते एक साल में ड्रोन के जरिये हथियार, ड्रग्स, रुपये जैसी चीजों के भेजे जाने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। आसान शब्दों में कहा जाए, तो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई खालिस्तानी स्लीपर सेल के सहारे पंजाब का माहौल बिगाडऩे की कोशिश कर रही है। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि किसान आंदोलन में नजर आने वाले खालिस्तानी समर्थक कहीं न कहीं पंजाब में भिंडरावाले का समय दोहराने की कोशिश कर सकते हैं। वहीं, किसान आंदोलन का समाधान निकलवाकर कैप्टन पंजाब में हीरो का दर्जा ले सकते हैं, जो कांग्रेस आलाकमान से लेकर सूबे में पार्टी के संगठन तक को हिला सकता है। अमरिंदर सिंह का राष्ट्रवादी विचारों का होना उनका सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट नजर आता है। पंजाब में सुरक्षा हमेशा से ही बड़ा मुद्दा रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

नीलाभ कृष्ण

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