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पंजाब में गिरता लोकतान्त्रिक मूल्यों का स्तर

पंजाब में गिरता लोकतान्त्रिक मूल्यों का स्तर

हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा कर दी गई है। इनमें से एक राज्य पंजाब है, यहां पंजाब राज्य के बारे में चर्चा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि वर्तमान में पंजाब में लोकतांत्रिक मूल्यों का स्तर गिरता जा रहा है।  यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी एक रैली को संबोधित करने के लिए बठिंडा जा रहे थे तो उनके मार्ग में राज्य सरकार ने अवरोध उत्पन्न किया। जिसके कारण एक बार फिर से राज्य और केंद्र सरकार के मध्य टकराव देखने को मिला।

गौरतलब है कि भारत में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है जहां केंद्र और राज्य में केंद्र को सर्वोपरि माना गया है और राज्य को केंद्र से अलग होने का अधिकार नहीं है। लेकिन जिस तरह की घटनाएं पंजाब में घटित हो रही है वह संसदीय शासन प्रणाली और लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या है। दरअसल ऐसा पहली बार नहीं है इससे पहले भी पंजाब में लोकतांत्रिक मूल्यों का मखौल उड़ाया गया है। १९८० के आसपास इंदिरा गांधी द्वारा भिंडरावाला जैसे आतंकवादी का संरक्षण कर पंजाब में लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या की गई। और आगे चलकर यही भिंडरावाला इंदिरा गांधी की हत्या का भी कारण बना। वर्तमान में कांग्रेस सरकार भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए पंजाब में लोकतांत्रिक मूल्यों के अवेलहना कर रही है यही कारण है कि पंजाब के वास्तविक मुद्दे कहीं खो गए हैं

वर्तमान मैं किसान आंदोलन के समय भी ऐसा ही देखने को मिला, कई महीनों से पंजाब में किसान आंदोलन के माध्यम से किसानों के रूप में छिपे राजनैतिक गुंडों ने पंजाब में अलग-अलग घटनाओं के माध्यम से पंजाब में लोकतंत्र को सवालों के घेरों में खड़ा कर दिया है। यह तथाकथित किसान अब बहुत ज्यादा अराजकता फैलाने का काम कर रहे हैं, चाहे वह अबोहर में जनप्रतिनिधि अरुण नारंग को निर्वस्त्र करने की घटना हो, चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालयों पर हमले की बात हो और चाहे धनौला में किसानों द्वारा ही फसलों को उखाडने की बात हो और चाहे राजपुरा में बीजेपी पदाधिकारियों पर मारपीट की बात हो। इन सब घटनाओं से पंजाब भी अब बंगाल की राह पर चलता दिखाई दे रहा है। क्या पंजाब में सच में अब लोकतंत्र खत्म हो गया है, जो किसानों के रूप में ऐसी घटनाएं गुंडों द्वारा बार बार हो रही है?

पंजाब में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर १४ फरवरी को चुनाव सम्पन्न होने वाले हैं, किंतु जिस प्रकार जिला फाजिल्का, फिरोजपुर और तरनतारन में प्रत्याशियों के नामांकन पत्र रोकने के लिए पथराव व मारपीट की गई है, उससे ऐसा लग रहा है कि अब राजनीति ताकत और अहंकार का खेल हो लिया है। वास्तव में लोकतंत्र में विपक्षी के बिना राजनीति की कल्पना ही नहीं की जा सकती। देश में प्रत्येक व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार है। राजनीति किसी की जागीर नहीं। यह नैतिक तौर पर भी नीच हरकत है कि किसी प्रत्याशी को नामांकन पत्र दाखिल करने से रोका जाए।

विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों में हिंसक घटनाओं में निरंतर गिरावट आ रही है, लेकिन पंचायती चुनावों व स्थानीय निकाय चुनावों में हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं। चुनावों में पहले हिंसा केवल मतदान के दिन होती थी, अधिकतर फर्जी वोट डालने-रोकने या फिर बूथों पर कब्जा जैसी घटनाएं होती थी, लेकिन छोटे स्तर के चुनावों में नामांकन दाखिले के वक्त बढ़ी हिंसक घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। यह केवल निम्न स्तर के नेता की संकुचित सोच का ही परिणाम नहीं बल्कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भी राजनीतिक साजिश से इन्कार नहीं किया जा सकता।

बूथ स्तर पर अपनी पार्टी ईकाईयों को मजबूत करने के लिए अपने वर्करों को उकसाकर किसी भी प्रकार की हिंसक घटनाओं को अंजाम देने से नहीं कतराते। इस खतरनाक परंपरा की सबसे बड़ी चोट प्रदेश की जनता को झेलनी पड़ रही है। गांव स्तर पर राजनीतिक शत्रुता तनाव का कारण बन रही है, यही कारण है कि पिछले दो तीन पंचायती चुनावों में हत्याओं की कई घटनाएं घटीं हैं। विधायकों के खिलाफ हिंसा के मामले दर्ज हो रहे हैं। देखा जाए तो इन चुनावों में विधायकों व सांसदों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए, ये चुनाव छोटे नेताओं को वरिष्ठ नेताओं की दखलअंदाजी के बिना लडऩे दिया जाना चाहिए। विधायकों पर इस बात का दबाव नहीं होना चाहिए कि पार्टी से सबंधित पार्षदों की जीत-हार से विधायक की लोकप्रियता, कार्यकुशलता या वफादारी तय की जाएगी।

बहरहाल वर्तमान विधानसभा चुनाव में पंजाब के वास्तविक मुद्दे नशाखोरी, कानून व्यवस्था कहीं खो गया है और उनका स्थान बिजली, फ्री पानी ने ले लिया है।

 

डॉ. प्रीति

(लेखिका असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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