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वर दे, वीणावादिनी वर दे!

वर दे, वीणावादिनी वर दे!

जैसा आप सभी पाठकजन जानते हैं कि प्रभु श्री कृष्ण ने स्वयं श्रीमद्भागवत गीता में बताया है कि महिनों में मार्गशीष और ऋतुओं में बसन्त मैं हूं। यही बसन्त ऋतु का आगमन पतझड़ के बाद होता है जिसे हम ऋतुराज, कामसखा, पिकानन्द, पुष्पमास, पुष्प समय, मधुमाधव आदि नामों से भी पुकारते हैं। इस ऋतु में वन-उपवन, बाग-बागीचों में लताएं, नए-नए लाल-हरे कोमल पत्तों से ही नहीं  बल्कि नाना प्रकार के पुष्पों से भी भर जाती हैं। इस प्रकार मौसम और प्रकृति में जो मनोहारी बदलाव होते हैं उससे प्रकृति का कण-कण खिल उठता है यानि हम मानवों के साथ साथ  पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं।

पतझड़ पश्चात माघ शुक्ल पंचमी को वसंत पंचमी कहिये या श्रीपंचमी या ज्ञान पंचमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन को ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। इसलिये इस दिन विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा बड़े ही उल्लास व उमंग के साथ की जाती है। यह त्यौहार वैसे तो पूरे भारत में, फिर भी खासकर पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बहुत ही बड़े रूप में बड़े उल्लास से मनाया  जाता है। इस दिन हर क्षेत्र के शिक्षाविद यानि कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार मां सरस्वती की वंदना के साथ साथ अपने अपने  उपकरणों सरस्वती स्वरूपा जैसे कलम, कापी, पुस्तक, वाद्य यंत्रों वगेरह  की पूजा-वंदना से ही दिन की शुरुवात करते हैं और मां शारदे से  अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। यहां आपके ध्यान के लिये बता दूं की ज्यादातर लोग पूजा-वंदना के बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं।

सनातन धर्म में बसंत पंचमी के दिन को स्वयं सिद्ध मुहूर्त वाला दिन माना जाता है जिसका मतलब होता है उस दिन प्रारंभ होने वाला हर कार्य सफलता को प्राप्त करेगा ही। इसीलिए इस दिन दूरगामी योजनाओं की शुरुआत कहिये या  शिशुओं को विद्यार्जन  के लिए पहली बार स्लेट/पाटी या पोथी की पूजा-अर्चना करवा कर सबसे पहले अक्षर ज्ञान के साथ-साथ लिखना सिखाया जाता है और पाठशाला में दाखिला भी कराया जाता है।

बसन्त पंचमी वाले दिन स्कूलों में शिक्षक हों या विद्यार्थी सभी पूरे उमंग व उल्लास के साथ विद्या की देवी माता सरस्वती की प्रतिमा को मंच पर स्थापित कर विधि-विधान के साथ सामूहिक पूजा-अर्चना करते हैं। इस पूजा-अर्चना करने के पश्चात सर्वप्रथम  आधुनिक युग के सर्वाधिक क्रान्तिकारी, प्रगतिवादी, चेतना के ओजस्वी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के चित्र पर माल्यार्पण वाला कार्यक्रम पूरे आदरसहित संपन्न किया जाता है। इसके उपरांत सभी उपस्थित उनका लिखित सर्वाधिक लोकप्रिय ‘वर दे, वीणावादिनि वर दे! प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे!!’ का  समवेत स्वरों में प्रार्थना करते  हैं।

इस दिन प्राय: प्राय: सभी विद्यालयों में या तो वार्षिकोत्सव का आयोजन किया जाता है अन्यथा मां शारदा के भक्ति गीतों का आयोजन। जिसमें मंच पर सुंदर-सी सजी सरस्वती देवी की  प्रतिमा के सामने,  दर्शकों की भारी भीड़ के आगे विद्यार्थीयों के साथ- साथ शिक्षकगण भी अपना अपना ब्याख्यान, गीत बड़े ही जोश, उमंग व उल्लास के साथ प्रस्तुत करते हैं। विजेताओं को प्रमाण पत्र व ईनाम भी दिया जाता है।

इसी प्रकार शहरों में सोसायटी के प्रांगण में, तो कहीं-कहीं पार्कों में सरस्वती माता की मूर्ति स्थापित कर सार्वजनिक पूजा के आयोजन के साथ साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पूरे उल्लास एवं धूमधाम से मनाने के पश्चात सामूहिक भोज सानन्द सम्पन्न किया जाता है। इस तरह यह स्पष्ट है कि बसन्त पंचमी वाला समय जहां एक तरफ ज्ञानवान बनने के लिये संकल्पित होने का अवसर प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर उमंग व उल्लास के साथ आयोजित होने वाले  सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपना हुनर भी प्रदर्शित करने का अवसर।

गोवर्धन दास बिन्नाणी

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