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मेड़ता की राजकुमारी

मेड़ता की राजकुमारी

वह मेड़ता की राजकुमारी थी। राजमहल हीरे-जवाहरात से भरा पड़ा था। खूब धन-धान्य था। उसके  पिता रत्न सिंह की वीरता की पूरे राजस्थान में धाक थी। पिता और रानी मां, वीरकुमारी, दोनों राजकुमारी पर बलिहारी जाते थे।

राजकुमारी का जन्म पाली जिले में स्थित एक छोटे से गांव कुड़की में 1498 ईस्वी में हुआ। मेड़ता में किलानुमा महल में राजकुमारी के लिए सभी सुख सुविधाएं थीं। नौकर चाकर थे, सखी सहेलियां थी, खुला आंगन था, अनेकों खेल खिलौने थे। इनमें से उसे एक मूर्ति बहुत पसंद थी। वह सदैव उसे अपने पास रखती। पल के लिए भी उसे अपने से जुदा न करती। उससे बातें करती, तरह-तरह के वस्त्र पहनाती, भोजन करवाती, रात्रि को सोते समय भी वह इसे मूर्ति को न छोड़ती और उसे अपनी छाती से लगाए रखती। राजा, रानी भी उसकी इस भक्ति भावना को देखकर खुश थे। वह भी कृष्ण भक्त थे। मेड़ता के महल और उसमें स्थापित कृष्ण मंदिर को हमने भी देखा है

राजकुमारी धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। उसने अब महल से बाहर झांक कर देखना शुरू कर दिया था। जब कभी महल के पास से कोई बाजा बजता, घोड़े पर बैठा दूल्हा अथवा बारात  निकलती तो वह बड़े ध्यान से देखती और असमंजस में पड़ जाती।

अंतत: एक दिन उसने अपनी मां से पूछ ही लिया, ‘मां! घोड़ी पर यह कौन बैठा है?’

‘दूल्हा।’

सुनकर जिज्ञासा जागी और उसने फिर पूछा, ‘मेरा दूल्हा….?’

‘तेरा दूल्हा तो तेरे पास है, पगली! वही जिसे तू एक पल के लिए भी जुदा नहीं करती।’

‘पर मां! वह घोड़ी पर सवार होकर बाजे गाजे के साथ बारात लेकर कब आएगा?’

‘दूल्हा अपनी इस प्यारी दुल्हनिया और हमारी लाडो को लेने के लिए साक्षात आने वाला है।’

राजकुमारी को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। वह उस दिन का इंतजार करने लगी जब गिरिधर दूल्हा बने उसे लेने आएंगे।

राजकुमारी के पिता ने मेवाड़पति राणा सांगा की एक जीत में सहायता की थी। इस विजय श्री से प्रसन्न होकर राणा ने अपने राजकुमार के लिए मेड़ता की राजकुमारी का हाथ मांग लिया। रत्न सिंह ने इस पेशकश को सहर्ष स्वीकार कर लिया। 1516 ईस्वी में मेड़ता की इस राजकुमारी, मीरा, का विवाह राजकुमार भोजराज कुंभा से हो गया। माता ने विदायगी के अवसर पर कहा, ‘बिटिया यही तेरे गिरिधर नागर हैं…मोर मुकुट धारी नंदलाल।’

माता-पिता ने बहुत सा दहेज दिया। पर मीरा अपने साथ प्रियतम की मूर्ति को ले जाना नहीं भूली। भूलती भी कैसे? यही तो उसकी  प्राणाधार थी। उसने चित्तौड़ के राज महलों में प्रवेश करते ही अपने लिए कृष्ण जी का मंदिर बनवा लिया और उसमें वह मूर्ति स्थापित कर दी। मीराबाई अपने पति को साक्षात कृष्ण मानकर जी-जान से टहल सेवा करती। पति की हर सुख-सुविधा का ध्यान रखती। मगर जब वह राजदरबार की ओर प्रस्थान करते तब वह मंदिर के किवाड़ बंद कर घंटों अपने गिरधर से बातें करती। हंसी ठिठोली करती, गुनगुनाती, गीत गाती और प्रेम मदमाती होकर अकस्मात नाचने लगती। पैरों में बंधी पायल के घुंघरूओं से महल गूंज उठता। राजपरिवार ने एक दिन देखा, दो दिन परखा। पर आखिर मीरा के व्यवहार पर कटाक्ष होने लगे। उनकी आपत्ति थी-  मीरा मेवाड़ की रानी है। राजसी ठाट-बाट से रहे। राजकुल की मर्यादा का पालन करना चाहिए। इसने तो सभी मर्यादाओं-परंपराओं का कचरा कर दिया।

मीरा की ननद उदा भाई एतराज करने में सबसे आगे थी उसने अपने भाई से शिकायत की बाई ने एक दिन अचानक महल में पहुंचकर मंदिर से आने वाली आवाजों को अपने कानों से सुना। उसने अपने भाई से शिकायत की। भाई ने एक दिन अचानक महल में पहुंचकर मंदिर से आने वाली आवाजों को अपने कानों से सुना। उसने  दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खुला वहां तो मीरा के सिवाय कोई नहीं था। वहां तो मीरा थी उसकी पत्नी। अन्य कोई भी तो नहीं था बस कृष्ण-कन्हैया की मूर्ति जरूर थी। इतना सब कुछ होने पर भी राजपरिवार की आंखों में मीरा बराबर खटकती रही। इसी दौरान भोजराज की एक युद्ध में घायल होने के पश्चात, 1521 ईस्वी में मृत्यु हो गई। पिता रत्न सिंह की मृत्यु तो इससे पूर्व कान्हवा की लड़ाई के दौरान 1528 ईस्वी में ही हो चुकी थी।

प्रथा के अनुसार मीरा को पति के साथ सती होने के लिए जोर डाला गया। वह नहीं मानी। वह तो बराबर यही कहती रही-

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो कोई

बसो मोरेनैनन में नंदलाल

मोहनी मूरति, सांवरि सूरति नैना बने बिसाल

अधर सुधारस मुरली बाजति, उर वैजयंती माला।

मेरे तो दूल्हा वही हैं, मेरी तो बालपन में ही उनसे शादी हो गई थी। वह तो अजर अमर हैं।

अब मीरा महलों की दहलीज को पार कर और राजकुल के समस्त बंधनों को तोड़कर शहर के मंदिरों में प्रेम-दीवानी अपने प्रिय को रिझाने के लिए भजन गाती, कीर्तन करती और खूब नाचती। ज्यों-ज्यों उसकी दीवानगी बढ़ती गई त्यों-त्यों राजघराने का उसके प्रति क्रोध बढ़ता गया। उसे नाना प्रकार के कष्ट दिए गए। मौत के घाट उतारने के लिए सांप की पिटारी भेजी गई। विष का प्याला पीने के लिए भेजा गया। मीरा ने इस का अपने पदों में स्वयं उल्लेख किया है-

राणा ने भेज्या विष का प्याला,

सो अमरित सम जान्या जी।

इस बीच उसने बड़ों से सलाह मशवरा करना उचित समझा। भारत के प्रसिद्ध संत, अपने समकालीन कवि चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदास को उन्होंने पत्र लिखा-

स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषण-हरण गोसाईं

बारहिं बार प्रनाम करहुं अब हरहुं सोक समुदाई

घर के स्वजन हमारे जेतेसबन्ह  उपाधि बढ़ाई।

साधु सगअरु भजन करत माहिंदेतक्लेसमहाई

मेरे माता-पिता के सम हो, हरि भक्तन्हसुखदाई।

हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।

और तुलसीदास जी ने उत्तर दिया-

जाके प्रिय राम बैदेही

सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम स्नेही।

और उनका उत्तर पाते ही वह राजमहलों का त्यागकर वृंदावन की ओर चल दी। जोगन का भेष बना, एक तारा हाथ में थामे और अपने आराध्य देव का गुणगान करते हुए आगे बढ़ती रही। जिधर से वह गुजरती लोग उसका भव्य स्वागत करते। कृष्ण भक्तों के रूप में उसकी ख्याति अब दूर-दूर तक फैल चुकी थी। कभी मीरा कृष्ण के रूप पर बलिहारी जाती, कभी विरह के गीत गाती-

हे रीम्हारा दर्द जाण्या कोई

मीरा की पीर मिटे तब, जब बैदसांवरियाहोई।

कभी प्रेम हिंडोले झूलती और अपने प्रेमी के संग होली खेलती।

फागुन के दिन चार, होली खेल मना रे …

घट के सब पट खोल दिए हैं, लो रंग सब डाल रे।

प्रेम में उसे अपनी सुध-बुध भी भूल जाती। आसपास भी की कोई खबर न रहती। उसे तो अब सभी ओर, सभी में नंदलाल ही दिखाई  देने लगे थे। उसने तो उनके चरणों  में अपने को समर्पित कर दिया था। यह प्रेम की पराकाष्ठा थी। प्रेमी के साथ प्रेमिका के अभिन्न होने की अवस्था।

मीरा के गीत उसकी आत्मा की सच्ची पुकार थे। प्रेम की हूक थी- कोयल की सी।

‘ढाई आखर प्रेम के’ का वह उदाहरण हो गई।

मीरा अब द्वारका में द्वारकाधीश के दर्शन के लिए पहुंच गई। रणछोड़ जी के मंदिर पहुंचकर वह गिरिधर नागर के चरणों में गिर गई और उसी पल मूर्ति में समा गई। मीरा का ऐसा व्यक्तित्व भारतीय इतिहास में ढूंढ पाना मुश्किल है। वह परम संत, विचारक, कवियत्री, प्रतिभा संपन्न, रूपवती, गुणवती, कलावती, सरल हृदया, बेपरवाह, दूरदर्शी, शुद्ध आत्मा और प्रेम मूर्ति थी। वह साहसी, सशक्त, शांत, संवेदनशील, मृदुल और मृदुभाषी थी। भक्ति का वह उदाहरण थी। आज भी लोग यही कहते हैं- मीरा जैसी भक्ति जी, कोई कर दिखलाओ।

 

डॉ. प्रतिभा गोयल

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