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शासन तंत्र ने संतों को मर्यादा देना छोड़ दिया है –स्वामी निश्चलानंद सरस्वती

शासन तंत्र ने संतों को मर्यादा देना छोड़ दिया है –स्वामी निश्चलानंद सरस्वती

शासनतंत्र और समाजतंत्र को समझ आना चाहिए कि मठ, मंदिर – शिक्षा, धर्म के अध्यात्मिक दुर्ग हैं, इन पर शासनतंत्र का कब्जा अशोभनिय है। ये हमारी संस्कृति को छिन्न-भिन्न करने का कुचक्र है। शंकराचार्य या धर्माचार्य की उपेक्षा करके विकास के नाम पर विनाश को ही निमंत्रण देंगे।’’ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने उदय इंडिया के समूह संपादक दीपक कुमार रथ से बात-चीत के दौरान ऐसा कहा। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश…

नवकलेवर कब होता है और इसकी क्या प्रक्रिया है?

ऋगवेद में दो मंत्रों के माध्यम से श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्राजी के महत्व को स्थापित किया गया है। मंत्रों में ये संदेश दिया गया है कि महोदधिजी के तट पर श्री बलराम और सुभद्रा सहित जगन्नाथजी विद्यमान हैं। जो लोग आस्थापूर्वक इनका दर्शन करते हैं वो अमरपद के भागी होते हैं। यहां इनके दारूब्रह्मरूप का भी वर्णन है। दारू शब्द का अर्थ है जो सभी प्रकार के दुखों को हर ले और जो जीवन को आन्नद से भर दे उसका नाम दारू है। लौकिक दृष्टि से दारू काठ को कहते हैं। लेकिन, यौगिक दृष्टि से दारू का अर्थ वही बताया गया है जो रूद्राक्ष का होता है। रूद्र शब्द का अर्थ होता है जो जीवन के सभी दुख हर ले और उसके कारणों को मिटा दे। इस दृष्टि से विचार करने से लगता है मानों भगवान शिव स्वयं को दारू के रूप में यहां प्रकट करते हैं। यहां कि परंपरा के अनुसार नीम के वृक्ष के काठ से जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्राजी की मूर्तियों का निर्माण होता है। भगवदगीता के अनुसार भगवान की मूर्तियों के कई रूप हैं जिनमें से एक दारू रूप भी है। जिस रूप में भगवान यहां स्थापित हैं। जब भगवान की पुरानी मूर्तियां जीर्ण हो जाती हैं तो नवकलेवर में भगवान की स्थापना होती है और जीर्ण कलेवर को भूसमाधि देने की प्रथा है। अधिक मास (मलमास) के शुक्ल पक्ष में भगवान का नवकलेवर किया जाता है। ऐसा योग अधिकतर 18 वर्षों के बाद प्राप्त होता है इस योग की प्राप्ति इस वर्ष अधिक आषाढ़ मास के रूप में हुई है। इस पूरी प्राक्रिया को नवकलेवर कहा जाता है।

मठ के रख-रखाव के साथ जिस तरह का दुव्यवहार हो रहा है उस पर क्या कहेंगे?

स्कंदपुराण के अनुसार श्री ब्रह्माजी की पांचवीं पीढ़ी में नीलमाधव का जन्म हुआ था। उन्होंने तीर्थयात्री ब्राह्मणों के मुख से नीलमाधव के माहत्म को सुना। अपने पुरोहित के अनुज विद्यायपथजी को अनुसंधान के लिए उज्जैनी क्षेत्र से उत्कल क्षेत्र को भेजा। कालांतर में वह स्वयं नीलमाधव का दर्शन करने यहां आए, लेकिन देव योग से नीलमाधव भूसमाधि को प्राप्त हो गए थे। दर्शन न हो पाने के कारण वे व्याकुल हो उठे तब नीलमाधव ने स्वप्न में उन्हें आश्वासन दिया। उसी संदर्भ में उन्हें दारू ब्रह्म को उत्पन्न करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भगवान ने स्वयं इस कार्य के लिए ब्रह्माजी को प्रेरित किया। ब्रह्माजी ने अपने करकमलों से जगन्नाथजी को पुरी क्षेत्र में महोदधिजी के तट पर प्रतिष्ठित किया। शिवअवतार भगवान शंकराचार्य जब पुरूषोत्मक क्षेत्र में आए तो उन्होंने श्री जगन्नाथजी से विहिन इस क्षेत्र को देख कर पुन: उन्हें प्रतिष्ठित करने का संकल्प लिया। उस समय के जो राजा थे उन्हें यजमान के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने 25 वर्ष की आयु में आज से 2498 वर्ष पूर्व जगन्नाथजी की स्थापना की थी और उसी दिन अपने पहले शिष्य श्री पदमपादाचारजी को गोवर्धन मठ के शंकराचार्यजी के रूप में प्रतिष्ठित किया और उन्हें ये दायित्व दिया कि जगन्नाथ भगवान की पूजा प्रतिष्ठा विधिवत चलती रहे। तब से जो भी क्षत्रिय राजा हुए उन्होंने शंकराचार्य की आज्ञा से इसका विधि विधान से संचालन किया है। इस धार्मिक कार्य की अनुमती सिर्फ शंकराचार्य को ही सुलभ थी, लेकिन जब से उड़ीसा की सरकार ने श्रीजगन्नाथ मंदिर को व्यवस्था के नाम पर अपने हाथ में लिया तब से ही शंकराचार्य की उपेक्षा होने लगी। मंदिर की शिक्षा, रक्षा, धर्म, सेवा आदि के रूप में जो ख्याति थी वो धीरे-धीरे शासनतंत्र के चंगुल में फंसकर धनार्जन करने वालों का केंद्र बन गया। ऐसे में धार्मिक, अध्यात्मिक दृष्टि से मंदिर को अत्यंत दूर कर दिया गया। शंकराचार्य के अधिकारों को पंडे-पुजारियों को समर्पित कर दिया गया। साथ ही शंकराचार्य ने जिस तिथि को जगन्नाथजी की स्थापना की थी उस तिथि को ही विलुप्त करने की कोशिश की। पुरीपीठ को क्षति पहुंचाने की कोशिश शुरू से ही यहां के शासन व्यवस्था की रही है। समुद्र तट पर एक सन्यासी के मठ को उड़ीसा सरकार ने अपनी टूरिस्ट डायरी में शंकराचार्य के मठ के रूप में वर्षों तक स्थापित किया। इस मठ के साथ हमेशा से ही शासनतंत्र के द्वारा अन्याय होता रहा है। पिछले वर्ष ऐसा महौल बना दिया गया कि मैं जगन्नाथजी के दर्शन से वंचित रहा। जबकि समिति के द्वारा मेरे लिए जो निर्णय लिया गया था उसे यहां के उच्च न्यायालय ने यहां के शासनतंत्र को क्रियान्वीत करने का आदेश दिया था। लेकिन, शासनतंत्र ने उसकी भी उपेक्षा की। शंकराचार्य का पूर्ण अधिकार होने के बाद भी यहां के शासनतंत्र ने उनकी उपेक्षा की है। इसका कारण ये है कि शासनतंत्र राजनैतिक व्यक्ति को ही यहां संत के रूप में स्थापित करते हैं। उन्ही के माध्यम से अपने प्रचारतंत्र को भी प्रशस्त करते हैं। अगर कोई माननीय शंकराचार्य भी यदि उनके कार्यकत्र्ता के रूप में काम करते हैं तो उनको पुरोत्साहित किया जाता है अन्यथा उपेक्षित किया जाता है। इसलिए शंकराचार्य की जो भूमिका होनी चाहिए उसे प्रस्तुत करने की भावना होने पर भी श्रीमंदिर को लेकर मैं मौन रहता हूं।

इस बार के नवकलेवर में भी शंकराचार्य और मठ की उपेक्षा की गई हैं, क्या कहेंगे इस विषय में?

मुक्ति मंडप के सदस्यों के साथ श्री गजपतिजी ने यहां आकर सूचना दी कि अमूक-अमूक कार्यक्रम अमूक-अमूक ढंग से पूर्व की विधा से संपन्न करने का निश्चिय लिया गया है। शासनतंत्र की ओर से हमारे पास ऐसा कोई संदेश नहीं आया है। शासनतंत्र ने दूरी बना कर रखी हुई है मुझे इससे कोई कष्ट नहीं है। मुझे कष्ट इसलिए नहीं है, क्योंकि मैं जगन्नाथजी से और जगन्नाथजी मुझसे दूर नहीं हैं। बाकी मुझसे कोई मार्गदर्शन लेता है तो ठीक है, नहीं लेता है तो भी ठीक ही है। भगवान की कृपा से गुरूओं की कृपा से हमको वो अध्यात्म विज्ञान का ज्ञान प्राप्त है जिससे पूरा विश्व दिव्य रूप धारण कर सकता है। लेकिन, मैं ऐसा महसूस करता हूं कि इस समय भारत के लोगों को हम जैसे लोगों से लाभान्वित होने की जरूरत नहीं है।

आप इस विषय पर कब तक मौन रहेंगे। अपकी कोई प्रतिक्रिया नहीं है?

मान-न-मान मैं तेरा मेहमान की कहावत को चिरतार्थ करने वालों में से मैं नहीं हूं। जब पुरी में रहता हूं तब भी और जब बाहर रहता हूं तब भी मौनी बाबा बन कर नहीं रहता हूं। जो मेरा कर्तव्य है उसे मैं प्रवचन आदि के माध्यम से पूर्ण करता हूं। बाकी किसी संस्थान में हस्तक्षेप करने का मेरा स्वभाव नहीं है। अगर कोई मुझसे लाभन्वित होना चाहता है तो ठीक, अन्यथा मुझे हठपूर्वक कुछ करने की इच्छा नहीं है। शासनतंत्र और समाजतंत्र को ये समझ आना चाहिए कि मठ, मंदिर-शिक्षा, धर्म के अध्यात्मिक दुर्ग हैं, इन पर शासनतंत्र का कब्जा अशोभनिय है। ये हमारी संस्कृति को छिन्न-भिन्न करने का कुचक्र है। और कोई भी शंकराचार्य या धर्माचार्य जिन्हें अपार, अद्भुत बल, दिव्य शक्ति प्राप्त होती है उनकी उपेक्षा करके विकास के नाम पर विनाश को ही निमंत्रण देंगे।

 

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