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मन और खाने के बीच है बड़ा संबंध: दास श्रीधरन

मन और खाने के बीच है बड़ा संबंध: दास श्रीधरन

मन और खाने के संबंध में हमारे आयुर्वेद और बुजुर्गों ने बहुत कुछ लिखा और बोला है। जब मां अपने हाथों से खाना बनाके खिलाती थी तो कितनी आत्मिक शांति मिलती थी। पहले खाने में प्यार होता था, अब लोग काम चलाते हैं।’’ उदय इंडिया के संवाददाता नीलाभ कृष्ण और प्रीति ठाकुर से बात करते हुए रासा फूड चैन के संस्थापक दास श्रीधरन ने कहा। प्रस्तुत है इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपकी ऑर्गेनिक फूड चेन न सिर्फ भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी है। किन कारणों ने आपको इस तरफ प्रेरित किया?

बीस साल पहले हमने यह काम शुरू किया था। हमने जब यह काम शुरू किया तो उसके बाद ही हमने भी भारतीय खाने के महत्व को पहचाना। आज पूरे विश्व में दूषित खाद्य पदार्थों की भरमार है, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि हमारी जो आयुर्वेदिक संस्कृति है और आयुर्वेद में बताये गईं खाना बनाने की विधियां हैं, वह काफी बढिय़ा थीं और आज भी वो काफी बेहतर है। आज के जमाने में रसायन और खादों के प्रयोग से इंडस्ट्रियल फार्मिंग की जो व्यवस्था शुरू हुई उसने हमारी सांस्कृतिक विरासत पर गंभीर चोटें की हैं। हमने अपने अनुभव से सीखा है कि हमारे भारतीय खाद्य पदार्थों में बहुत खूबियां हैं और अगर सही तरीके से इनको प्रमोट किया जाए तो यह सारी दुनिया में अपनी खुशबू फैलाएगा।Das-6

ऑर्गेनिक फूड के बारे में लोगो की अलग-अलग धारणायें हैं। फिर आप लोगों को कैसे विश्वास दिलाते हैं कि आप जो खाना परोस रहे हैं, वह ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों से बना है?

आपने बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल पूछा है, क्यूंकि सचमुच इस क्षेत्र में बहुत ही फरेबी लोग हैं जो झूठ को सच करते हैं। हमने अभी साल भर पहले बेंगलुरु में एक रेस्तरां खोला है ‘रासा’ के नाम से (जो की हमारी फूड चेन है) हमने इसके बगल में इसी नाम से एक कृषि स्कूल भी खोला है, जहां कृषि सम्बंधित पढ़ाई होती है, और हमारे रेस्तरां के लिए भी सारी सब्जियां वही उगाई जाती हैं, ऑर्गेनिक तरीके से। इसी तर्ज पर हमने भारत के महत्वपूर्ण शहरों में ऐसे ही रेस्तरां के साथ कृषि स्कूल खोलने की योजना बनाई है। हमारी योजना सिर्फ ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने की नहीं है बल्कि, हमारी योजना तो किसानों की उपज को सीधा रसोई तक लाने की है। जिस तरह हमारे प्रधानमंत्री भारत को एक ब्रांड की तरह प्रमोट कर रहे हैं, उसी तर्ज पर हमने भारतीय खाने को प्रमोट करने के लिए एक मसौदा तैयार किया है, जिसे हम प्रधानमंत्री के सामने पेश करेंगे। क्योंकि सरकार के समर्थन के बगैर ऐसा कर पाना हमारे लिए आसान नहीं होगा।

लंदन में आपके जो रेस्तरां हैं उनमे ज्यादातर भारतीय ही आते हैं या फिर वहां के स्थानीय लोग भी आते हैं?

हमारे 90 प्रतिशत ग्राहक यहां के स्थानीय निवासी ही हैं। हमने अपने खाने से यहां के लोगों की फूड हैबिट को बदल दिया है।

मन और खाने के बीच परस्पर क्या संबंध है?

मन और खाने के बीच ही तो सबसे बड़ा संबंध है, लेकिन लोगों को यह समझ नहीं आता। आज से 30-40 साल पहले लोग बहुत खुश रहते थे, आज जब सबके पास पैसा आ गया है तब भी वह खुश नहीं है। पहले जब मां अपने हाथों से खाना बना के खिलाती थी, तो कितनी आत्मिक शांति मिलती थी, पर आज रेडीमेड खाने का चलन इतना बढ़ गया है कि लोग भरतीय खाने को भूल ही गए हैं। अगर आप सप्ताह के सातों दिन रेस्तरां में खाएंगे तो सोच लिजिए आपकी क्या हालत होगी। पहले के खाने में प्यार होता था अब तो लोग काम चलाते हैं। मन और खाने के संबंध में हमारे आयुर्वेद और बुजुर्गों ने बहुत कुछ लिखा और बोला है।

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