ब्रेकिंग न्यूज़ 

लखनऊ के नवाबी स्वाद की लज्जत

लखनऊ के नवाबी स्वाद की लज्जत

लखनऊ के अवधी व्यंजन जगप्रसिद्ध हैं। यहां के नवाबों ने खानपान के बहुत से व्यंजन चलाये हैं। व्यंजन खुशरंग, सुगन्धित और स्वादिष्ट होते हैं तो उससे पेट ही नही भरता बल्कि, लज्जत और स्वाद के उस मापदण्ड पर खरा उतरता है जो कोई-न-कोई संस्कृति शताब्दियों के बाद उत्पन्न करती है। मुगलकाल में अवध प्रांत अपनी समृद्धि के लिए विख्यात था। यहां के नवाब वाजिद अली शाह अपने शाही अंदाज और शानो-शौकत के लिए मशहूर थे। उन्हें लजीज खाने का बेहद शौक था। शाही रसोई में उनके खानसामे तरह-तरह के मुगलई लजीज पकवान बनाया करते थे और वहां ये पारंपरिक पकवान आज भी बेहद पसंद किए जाते हैं। गरम मसालों की खुशबू से भरपूर लज्जतदार अवधी व्यंजन आज पूरी दुनिया में मशहूर है। नवाबी दौर में लजीज व्यंजनों की अवधी पाक शैली अपने उरूज पर थी।

PAG 20-23_Page_1पाक कला के माहिर अवध के बावर्ची और रकाबदारों ने मसालों के अतिविशिष्ट प्रयोग से अवध के खान-पान की परंपरा को अद्वितीय लज्जत बख्शी और इसे कला की ऊंचाइयों तक पहुंचाया अवध के बावर्चीखाने ने जन्म दिया पाक कला की दम पद्धति को जिसमें व्यंजन कोयले की धीमी आंच पर पकाए जाते थे। पकाते समय भाप पतीली से बाहर न निकले इसके लिए सने हुए आटे की लोई को पतीली के ढक्कन के किनारों पर चिपका दिया जाता था। लखनऊ की बिरयानी का खास स्वाद दम शैली से बिरयानी बनाने के कारण आता है और यही इसे हैदराबादी बिरयानी से अलग भी करता है। अवधी खाने की विशेषता मसालों और अन्य सामग्रियों के एक खास संतुलन से उत्पन्न स्वाद से जानी जाती थी और आज भी यह परंपरा जीवित है।

महान विद्वान टी.एस. इलियट के अनुसार जब किसी सभ्यता का पतन होने को होता है तो सबसे पहले उसका दस्तरखान उलटता है। दस्तरखान केवल शाही दरबार, अमीरों के महलों और रईसों के दरबारों तक सीमित नहीं था। सामान्य घरों में भी लखनऊ का दस्तरखान अपनी बेमिसाली के लिए मौजूद था। तबाखीर के फनकारों का एक वर्ग था जिसने नमकीन और मीठे व्यंजनों की तैयारी और उपलब्धता में अपनी फनकारी के कमाल दिखाये थे। लखनऊ की रीतियों की जानकारी रजबअली बेग सुरूर और अब्दुल हलीम शरर की तहरीरों (रचनाओं) से भी मिलती है जिसे पंडित रतननाथ ने अपनी पुस्तकों में इंगित किया है। पुस्तकों में इसका प्रत्यक्ष कम ,लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भ अधिक मिलता है।

PGE 20-23_Page_2

शायद लखनऊ के दस्तरखाने का इतिहास, इसकी स्वच्छता, कोमलता व मृदुलता का स्तर इतिहास के बिखरे हुए पृष्ठों में तलाश करने की बात है। इनके मूल्यांकन करने के उपरांत जरूर इसी खोई हुई चीज को प्राप्त करने का पता चल सकता है। इससे कहीं ज्यादा उत्साहवर्धक बात यह है कि बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में भी लखनऊ वालों के मिले-जुले स्मरण में अपने दस्तरखान की अनुपमता और परख की चेतना बाकी है, बावर्चियों और तबाखों के गुजरे हुए फन के उत्तराधिकारी आज भी मौजूद हैं जो बहुत कुछ भूल जाने के बावजूद भी बहुत कुछ नही भूल सके हैं। लखनऊ के माहिर बावर्चियों एवं तबाखों की सब से बड़ी विशेषता एवं पहचान (अनुपमता) है। पकाने की विधि, मसालों का चयन और उनके प्रयोग में एक विशेष अनुपात का ध्यान आज भी लखनऊ के दस्तरखनों की अलग पहचान है।

PAGE 20-23_Page_2

ज्यादातर लोग अवधी खाने को मुगलई खाने के इर्द-गिर्द की चीज मानते हैं। लेकिन यह बिल्कुल गलत है। दरअसल ईरानी और अवधी कायस्थों के बावर्चीखाने से मिलकर निकली खाने की खुशबू को अवधी दस्तरख्वान कहा जाता है। अवधी खाना मुगलई खानों की तुलना में इस्तेमाल कम किया जाता है। जिससे इसे हजम करना आसान होता है और यह जल्दी हजम होने वाले खानों में शुमार किया जाता है। अवधी खाने में ड्राई-फ्रूट, जाफरान, जड़ी-बूटियां, लहसुन, अदरक, काली मिर्च, प्याज, छोटी और बड़ी इलायची, का इस्तेमाल होता है। अवधी खाने की खास बात यह होती है, कि इसमें मसाले नहीं, बल्कि मसालों के जूस को डाला जाता है। अवधी खाने शोरवेदार होते हैं और इसमे पोटली बना कर अदरक-लहसन आदि डाला जाता है। यही नहीं, खाना बनाते समय मलाई और दूध का भी इस्तेमाल किया जाता है।


तले आलू का सालन


PAG 20-23_Page_2

तले आलू का सालन अवध की बहुत ही मशहूर डिश है। इसे बड़ी महफिलों और बड़े आयोजनों में बनाया जाता है। इसको बनाने में ख्याल यह रखना चाहिए कि जो आलू खरीदे गये है वे साइज में बड़े हों। आलू को दो टुकड़ों में काट दिया जाता है। और उसको सरसों के तेल में तला जाता है। सबसे बड़ी कला आलूओं को तलना है। हल्की आंच पर आलू को तब तक तलें, जब तक वह हल्के सुर्ख न हो जाएं। हल्के हाथ से तले जिससे आलू न टूटे, न जले, आलू के सालन की खूबसूरती इसकी लालिमा लिए रंगत और आलूओं का ठोस होना है। उसके बाद गोश्त को अच्छी तरह से धोकर, मसालों में पकाया जाता है। नहारी में ग्रेवी गाढ़ी होती है,तो तले आलू के सालन में पतली। पतला सालन बना कर आलू उसमें डाल दिये जाते है। मसाले सभी नहारी वाले ही पड़ते है, लेकिन यह पोटली वाले नहीं होते। तले आलू का सालन गर्म-गर्म खाया जाए और कोशिश करें कि इसे लखनवी खमीरी रोटी के साथ खाएं।



अरहर की दाल


21 वीं सदी में अरहर की दाल पानी में बनाई जाती है, लेकिन दौरे अवध में अरहर की दाल दूध के साथ बनाई जाती थी। दाल को धोकर हल्की आंच पर पतीली में चढ़ा दिया जाता था। उसमें इतना दूध डाला जाता था, जितने में दाल डूब जाए। दाल को पकने में कम से कम चार घंटे लगते थे। हां, आप भी ट्राई करें तो बीच-बीच में इसमें मलाई डालना मत भूलिये।

क्या क्या जरूरी है?

मसाले, अदरक, लहसुन, प्याज, नमक-मिर्च स्वादानुसार, हल्की सी सफेद मिर्च, हल्की सी कली और लाल मिर्च, भुना जीरा, हल्का सा गरम मसाला, खुशबू के मसाले, इलायची, जावित्री और लौंग।

शेफ एडवाइज-

अरहर की दाल बनाते समय टोंड मिल्क का इस्तेमाल करें तो बेहतर है। अगर ऐसा संभव नहीं है,तो दूध में पानी मिला लें। दाल दूध को सोख लेती है इसलिए बीच-बीच में हल्के हाथ से चलाते रहें। हां पतीली के ढक्कन को पूरा न हटाएं बस उतना ही हटाएं, जितने से कफगीर (उबाल) पतीली में चली जाए। मलाई का इस्तेमाल करेंगे तो दाल सोंधी बनेगी और टेस्टी होगी। एक बात का ख्याल रहे, कि दाल को सर्व करते समय बघार असली घी और लहसुन का लगाएं। पतीली में इतना दूध हो, कि दाल उसमें पूरी तरह से डूब जाए।

इतिहास के झरोखे से

अवध के दौर का यह ऐसा किस्सा है, जिसकी चर्चा लगभग सभी जगह होती है। नवाब आसिफुद्दौला को अरहर की दाल बहुत पसंद थी। और खासा (वह जगह जहां खाना बनता है) में इस दाल को पकाने के लिए स्पेशल कुक हुआ करता था। बाबा काजमी किताबों के हवाले से बताते हैं कि नवाब साहब को सर्व की जाने वाली दाल के बघार में, सोने की गिन्नी बुझा दी जाती थीं और नवाब साहब इस दाल को चमचे से खाया करते थे। किस्सा यह है कि बावर्ची को दाल बनाने के लिए एडवांस में 200 गिन्नियां दी जा चुकी थी। जैसा कि होता है किसी ने नवाब साहब के कान में यह बात डाल दी, कि बावर्ची गिन्नी अपने पास रख लेता है, उसे खाने में नहीं डालता। नवाब साहब ने यह बात जब बावर्ची से पूछी तो बावर्ची को गुस्सा आ गया और उसने एक करिश्मा नवाब साहब के सामने किया। थाल में बुझाई जा चुकी गिन्नियां रखी थी। नवाब साहब ने जैसे ही उन गिन्नियों में एक गिन्नी को छुआ, वह बुरादा बन गयी। नवाब साहब समझ गये कि असलियत क्या है? लेकिन इस घटना के बाद उस बावर्ची ने शाही बावर्ची खाना छोड़ दिया और नवाब साहब ने अरहर की दाल को।

नोट

चांदी, दिल को मजबूत करती है, और सोना मर्दानी ताकत में इजाफा करता है। अवधी खानों में मोती भी पीस कर मिलाए जातें हैं।


ताफतान


मैदे में खमीर पैदा करके हल्की मिठास के साथ बनायी जाती है ताफतान, यह अफगानी रोटी है। किसी जमाने में लखनऊ में इसका बहुत चलन था। इसे मैदे से बनाया जाता है। मैदे में खमर पैदा करके हल्की मिठास के साथ बनाया जाता है। इसे घी में गूंथा कर तंदूर में बनाया जाता है।


शीरमाल


शीरमाल की शुरूआत गाजीउद्दीन हैदर के जमाने में हुई थी। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने रोटियों का कॉम्पटीशन करवाया था। उसी कॉम्पटीशन में शीरमाल अपने अस्तिव में आई। शीरमाल में शीर का मतलब दूध और माल का मतलब घी। इन दोनों चीजों को मैदे में अच्छी तरह से गूंथा जाता है और गूंथे हुए मैदे से बनी रोटी को शीरमाल कहते हैं। सबसे पहले मैदे और दूध को घी में गूंथ लिया जाता है। फिर अलग-अलग पेड़ों (लोईयां) में बांट दिया जाता है। फिर कच्ची घास से बनी हुई कपड़े की गद्दी पर इन पेड़ों को फैला दिया जाता है। उसके बाद तंदूर में लगाया जाता है और उस पर दूध या फिर जाफरान का छिड़काव होता है। जिसने भी शीरमाल को खाया है, वह यह बात जानता होगा कि शीरमाल के ऊपरी हिस्से में एक हल्का सा कट लगा होता है। इस कटे हुए हिस्से की भी अपनी पुरानी कहावत है। नवाब साहब ने जब कॉम्पटीशन के बाद रोटियों को चखा और शीरमाल को पहला ईनाम मिला, तो जिस हिस्से को काट कर छोड़ा था उसकी याद में आज भी शीरमाल में यह कट लगाया जाता है।


पुलाव


दूध के अन्दर मसाले डालकर झोल तैयार किया जाता है यकनी मसालों का दूध और चावलों को तीन स्टेप में दम किया जाता है।

अवध एक ऐसी जगह है, जहां पुलाव का ईजाद हुआ। पुलाव और बिरयानी में फर्क है। यह दोनों डिशेज देखने में भले ही लगभग एक जैसी लगत हों, लेकिन स्वाद में बिल्कुल अलग होती है। बिरयानी में मसाले आदि सामने ही दिखायी दे जाएंगे। जबकि पुलाव में मसालों का फ्लेवर मिलेगा। मसालों की रंगत नही दिखायी देगी, लेकिन स्वाद मिलेंगे। लखनवी पुलाव की शुरुआत नवाब आसिफद्दौला के जमाने में की गयी, उस समय का फेमस बावर्ची सज्जू का ईजाद किया हुआ है पुलाव। जब बड़ा इमामबाड़ा बन रहा था। उस समय जरूरत ऐसे खाने की थी, जो ज्यादा तैयार हो जाए और नवाब भी खा सकें। नवाब अपने लिए किसी खास डिश को बनवाना नही चाहते थे।

इसमें गोश्त की मसालों के साथ भुनाई की जाती है। दूध के अंदर मसाले डालकर झोल तैयार किया जाता है। मसालों का दूध और चावल तीन स्टेप में पुलाव को दम किया जाता है। सबसे पहले गोश्त के साथ यकनी होती है। फिर दूसरे स्टेप में मसालेदार दूध डालना होता है। तीसरे स्टेप में पसरे हुए चावल को यकनी और दूध के ऊपर डालकर आटे से ढक्कन को सील कर दिया जाता है और दम के लिए रख दिया जाता है। दम का मतलब हल्की आग में पकाना।

मसाले-

इसमें तकरीबन 42 तरह के मसाले पड़ते है। मुख्य रूप से इलायची, जावित्री, जायफल, तेजपत्ता, छोटी इलायची, कालीमिर्च, लाल मिर्च, खड़ा नमक, संदल बुरादा, बालझड़ इसी तरह के अन्य मसाले भी होते हैं।


लखनऊ से सुरेन्द्र अग्निहोत्री

lanspyвладимир мунтян исцеление

Leave a Reply

Your email address will not be published.