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हिजाब संकीर्ण सोच?

हिजाब संकीर्ण सोच?

देश मुस्लिम लड़कियों द्वारा हिजाब पहनने को लेकर हो रहे प्रदर्शनों को देख रहा है। समझ में नहीं आता कि शिक्षा-संस्थाओं में सांप्रदायिकता का यह जहर क्यों फैलता जा रहा है? अब मजहबी संकीर्णता और जिद का प्रदर्शन हिजाब के लिए प्रदर्शन से हो रहा है, कल को यह शिक्षा संस्थाओं में नमाज को लेकर फिर कैंटीन में हलाल मीट को लेकर होगा और हो सकता फिर रविवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक छुट्टी पर हो–और इस तरह यह लिस्ट अंतहीन हो जाएगी। गौरतलब है कि लक्षद्वीप में आजादी के 70 साल से भी अधिक समय से स्कूलों में साप्ताहिक अवकाश रविवार नहीं शुक्रवार को होता था। हालांकि, प्रशासन ने हाल ही में इस सिस्टम को बंद कर दिया है। अब, रविवार को स्कूलों में छुट्टी हो गई, जिससे विवाद खड़ा हो गया क्योंकि लोगों ने आरोप लगाया कि यह कदम मुस्लिम छात्रों के पक्ष में नहीं है। को आग दी जा रही है। परदे के पीछे से इसमें राजनीति अहम भूमिका निभा रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने एवं कट्टरवादी शक्तियों को संगठित करने का यह षडयंत्र है। इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन बच्चों को पढ़ाई पर ध्यान लगाना चाहिए था वे साम्प्रदायिक आग्रहों-पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर पहनावे के आधार पर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह स्थिति न केवल शैक्षिक सत्र के लिए नुकसानदेह है बल्कि स्कूल-कॉलेजों के माहौल को लंबे समय तक के लिए दूषित एवं तनावमय कर सकती है। इसके अलावा, यह भारत की परंपरा रही है, कश्मीर से कन्याकुमारी तक, छात्रों और आम जनता के लिए ड्रेस कोड को भौगोलिक स्थितियों और जलवायु की परिस्थितियों के अनुसार ही स्वीकार किया जाता है, न कि धार्मिक आधार पर। दुनिया भर में भी, उपरोक्त धारणा के अनुसार ही ड्रेस कोड का पालन किया जाता है।

यहां एक निजी शिक्षण संस्थान में धार्मिक पोशाक पर एक मामले में फैसले का उल्लेख करना उचित है। इस मामले में, केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए. मोहम्मद मुस्ताक ने अपने फैसले में कहा – ‘इस मामले में, मेरा विचार है कि याचिकाकर्ता संस्था के बड़े अधिकार के खिलाफ अपने व्यक्तिगत अधिकार को लागू करने की मांग नहीं कर सकते हैं। यह संस्था को तय करना है कि क्या याचिकाकर्ताओं को हेडस्कार्फ और पूरी बाजू की शर्ट के साथ कक्षा में भाग लेने की अनुमति दी जा सकती है। यह पूरी तरह से संस्थान के अधिकार क्षेत्र में है।’ इस बीच, 10 फरवरी को, कर्नाटक  उच्च न्यायालय  ने कहा कि वह कॉलेजों को फिर से खोलने का एक आदेश पारित करेगा, और छात्रों से मामले के निपटारे तक ऐसी धार्मिक चीजों को पहनने पर जोर नहीं देने के लिए कहा। इसके अलावा, डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी मशहूर पुस्तक ‘पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन’  के दसवें अध्याय के पेज नंबर 231 में लिखा है – ‘परदा प्रथा की वजह से मुस्लिम महिलाएं अन्य जातियों की महिलाओं से पिछड़ जाती हैं। वो किसी भी तरह की बाहरी गतिविधियों में भाग नहीं ले पाती हैं जिसके चलते उनमें एक प्रकार की दासता और हीनता की मनोवृत्ति बनी रहती है। उनमें ज्ञान प्राप्ति की इच्छा भी नहीं रहती क्योंकि उन्हें यही सिखाया जाता है कि वो घर की चारदीवारी के बाहर वे अन्य किसी बात में रुचि न लें।’ अपनी किताब के पेज नंबर 231 पर ही वो आगे लिखते हैं – ‘परदा प्रथा ने मुस्लिम पुरुषों की नैतिकता पर विपरीत प्रभाव डाला है। परदा प्रथा के कारण कोई मुसलमान अपने घर-परिवार से बाहर की महिलाओं से कोई परिचय नहीं कर पाता। घर की महिलाओं से भी उसका संपर्क यदा-कदा बातचीत तक ही सीमित रहता है। बच्चों और वृद्धों के अलावा पुरुष अन्य महिलाओं से हिल-मिल नहीं सकता, अपने अंतरंग साथी से भी नहीं मिल पाता। महिलाओं से पुरुषों की ये पृथकता निश्चित रूप से पुरुष के नैतिक बल पर विकृत प्रभाव डालती है। ये कहने के लिए किसी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं कि ऐसी सामाजिक प्रणाली से जो पुरुषों और महिलाओं के बीच के संपर्क को काट दे उससे यौनाचार के प्रति ऐसी अस्वस्थ प्रवृत्ति का सृजन होता है जो अप्राकृतिक और अन्य गंदी आदतों और साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है।’ लेकिन कर्नाटक में पूरे मामले को जिस तरह से सांप्रदायिक रंग दिया गया है और जिस तरह से इस बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, उसमें बात सतही फैसलों से बनने वाली भी नहीं है। अब मामला यह नहीं है कि बात कहां से शुरू हुई थी, अब समस्या इसे लेकर शुरू हुई राजनीति है, जो समाज की पुरानी जटिलताओं के बारे में फैसला सडक़ों पर कर लेना चाहती है, भारत की सांझा संस्कृति को आहत करना चाहती है। सह-अस्तित्व एवं समन्वय में विश्वास करने वाले लोगों को संकट में डालना चाहती है। व्यक्तिगत रूचि, आस्था, मान्यता आदि सदा भिन्न रहेंगी, पर उनमें आपसी टकराव न हो, परस्पर सहयोग, सद्भाव एवं आपसी समझ बनी रहे, यह आवश्यक है। राजनीतिक स्वार्थों के लिये इसे खण्डित करने के प्रयास देश तोडक़ है।

 

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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