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जेएनयू को सभी विचारों से युक्त बनाना

जेएनयू को सभी विचारों से युक्त बनाना

एक जेएनयूआईट के रूप में, मुझे खुशी है कि जेएनयू की एक साथी प्रोफेसर शांतिश्री धुलीपदी पंडित को जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का वीसी नियुक्त किया गया है। वह विश्वविद्यालय की पहली महिला वीसी हैं, जो खुश होने का एक और कारण है।

लेकिन तथाकथित वामपंथी उदारवादियों और असहमति के महान दूतों की प्रतिक्रियाओं को देखिए। वे  वीसी  के कुछ पुराने ट्वीट्स पर सवाल उठा रहे हैं और सुझाव दे रहे हैं कि ‘एक दक्षिणपंथी’ के रूप में, उन्हें भारत के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक के प्रमुख होने का कोई अधिकार नहीं है (हालांकि, द इंडियन एक्सप्रेस, दिनांक 09 फरवरी, 2022 की एक रिपोर्ट में, वीसी ने कहा है कि उनका ट्विटर अकाउंट ‘कभी नहीं’ था)। दूसरे शब्दों में, जो कोई भी उनके आख्यानों से सहमत नहीं है, उसे इस देश में प्रभाव के किसी भी पद पर कब्जा करने से स्वत: ही अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि उनके विचार सही हैं।

लेकिन फिर, ये तथाकथित वामपंथी-उदारवादी, जो ‘खान-मार्केट गैंग’ के प्रमुख सदस्य हैं और अनिवार्य रूप से ‘ब्राउन  कुली’ हैं, यह महसूस नहीं करते हैं कि तथाकथित किसान आंदोलन में वर्च्यू की खोज के बावजूद, जिसने एक साल से अधिक समय तक  दिल्ली की सीमा से लगे लोगों के जीवन को पंगु बना दिया, मेरे जैसे अन्य लोगों, और वीसी सहित, को यह कहने का संवैधानिक रूप से गारंटीकृत अधिकार है कि यह दलालों (बिचौलियों) का आंदोलन था।

इन तथाकथित वाम-उदारवादियों के लिए इस्लामी कट्टरवाद एक महान विकास हो सकता है, लेकिन हम जैसे लोगों के लिए, जिसमें वीसी शामिल हैं, यह खतरनाक है और हमें इसे व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। इसी तरह, हमें अलगाववादियों और ‘टुकड़े-टुकड़े’ गिरोह पर अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अधिकार है, जैसा कि इन वाम-उदारवादियों के पास है।

हमारे विपरीत, भारत में ये वाम-उदारवादी सबसे खराब फासीवादी हैं जिनके बारे में कोई सोच सकता है। वे असहमति का गला घोंटना चाहते हैं और हर तरह से हम पर राज करना चाहते हैं। हमें अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लडऩा और संरक्षित करना है।

हमारे संविधान में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि केवल तथाकथित वाम-उदारवादी लोग ही महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हो सकते हैं, कोई और नहीं। और फिर भी, वे ‘असहमति’ के महत्व की बात करते हैं और हम सभी पर ‘असहिष्णु’ होने का आरोप लगाते हैं। राजनीतिक दलों के सभी बड़े नेताओं के लिए जो सामान्य रूप से विपक्ष में हैं और विशेष रूप से राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के लिए, यह ‘असहिष्णुता’ देश में 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से आई है।

लेकिन, ये लोग खुद उन चीजों के प्रति कितने ‘सहिष्णु’ हैं जिन्हें वे देखना और सुनना नहीं चाहते हैं? और जिस प्रवृत्ति को वे बहुलवादी और लोकतांत्रिक भारत के लिए खतरनाक या आत्मघाती घोषित करते हैं, उस पर वे कितने ‘संगत’ हैं? मैं इस संबंध में कुछ उदाहरण देता हूं।

संसद के चल रहे बजट-सत्र में, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान, विपक्षी दलों ने, वैध रूप से, कुछ प्रासंगिक बिंदु उठाए और ट्रेजरी बेंच से जवाब मांगा। राहुल गांधी ने मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ अपने तेवर में कोविड-कुप्रबंधन, महंगाई, बेरोजगारी, देश की संघीय व्यवस्था की बात की। लेकिन जब मोदी ने लोकसभा में उनकी हर बात का जवाब दिया तो वे नदारद थे और उनके साथियों ने बार-बार व्यवधान पैदा किया। दरअसल, जब मोदी राज्यसभा में जवाब दे रहे थे तो कांग्रेस ने सदन से वाकआउट कर दिया। दूसरों के विचारों के प्रति उनकी सहनशीलता का स्तर ऐसा ही है! वे बोल सकते हैं और वे हमला कर सकते हैं, लेकिन वे दूसरों की नहीं सुनेंगे।

अब सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया सहित अपने बुद्धिजीवियों की ईमानदारी और निरंतरता को देखें। ‘असहिष्णुता’ के खिलाफ कुछ प्रमुख आवाजों ने कुछ साल पहले बैंगलोर साहित्य महोत्सव से खुद को अलग कर लिया, इसके प्रमुख आयोजक, इतिहासकार और लेखक विक्रम संपत के कार्यों पर आपत्ति जताते हुए। उनके अनुसार, संपत ने दो पाप किए थे। पहला, उन्होंने एक लेख लिखा था कि वे अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार क्यों नहीं लौटाएंगे (इसे पुरस्कार-वापसी ब्रिगेड के खिलाफ माना जाता था)। दूसरा, उन्होंने इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के एक समूह के साथ एक ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें सरकार से वैकल्पिक ऐतिहासिक आख्यानों पर विचार करने का आग्रह किया गया था। इस बीच, संपत को फेस्टिवल को बचाने के लिए आयोजक का पद छोडऩा पड़ा।

यह प्रसंग असहिष्णुता की शिकायत करने वालों की सहिष्णुता की गहराई को दर्शाता है! एक तरह से हमारे शीर्ष बुद्धिजीवियों की उस समूह की कोशिशों पर खामोशी का भी मामला था, जो एक केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया के अधिकारियों को नरेंद्र मोदी के वार्षिक दीक्षांत समारोह के निमंत्रण को वापस लेने के लिए मजबूर कर रहा था। कल्पना कीजिए, यहां, देश के प्रधानमंत्री को उनकी सरकार द्वारा वित्त पोषित विश्वविद्यालय में जाने की अनुमति नहीं दी गई। लेकिन असहिष्णुता के खिलाफ आंदोलन के हमारे नायकों द्वारा अस्वीकृति की कोई आवाज नहीं आई!

कुछ समय पहले, महाराष्ट्र में प्रमुख क्षेत्रीय समाचार पत्र लोकमत के खिलाफ भीड़-हिंसा हुई थी। कांग्रेस विधायक शेख राशिद के नेतृत्व में, मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने अखबार के कई कार्यालयों पर हमला किया, सिर्फ इसलिए कि अखबार ने एक गुल्लक में विभिन्न मुद्रा प्रतीकों को दिखाते हुए एक कार्टून दिखाया था, जिसके थूथन पर जिहादी समूह के झंडे से एक छवि थी –जिसमें  एक सफेद मुहर पत्र पर काली अरबी में लिखा था, ‘मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं। अखबार को इस ‘अपराध’के लिए माफी मांगनी पड़ी।

मशहूर टीवी एंकरों और उदार बुद्धिजीवियों, जो आज प्रेस की आजादी के लिए छाती पीट रहे हैं, उन्होंने भी अपनी आंखे मूंद ली थी जब उर्दू अखबार ‘अवधनामा’ के संपादक शिरीन दलवी को चार्ली हेब्दो के  कार्टूनों को फिर से छापने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। दलवी ने बाद में अपनी नौकरी खो दी और अखबार को बंद करना पड़ा।

कुछ समय पहले प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु कांतापुरम ए. पी. अबूबकर मुसलियार के मामले में भी इन ‘सहनशीलता के पक्षधरों’ की इसी तरह की चुप्पी भी उलझाने वाली थी। कोझिकोड में छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने पिछले हफ्ते कहा था कि लैंगिक समानता ‘इस्लाम के खिलाफ’ थी, और कहा, ‘दुनिया पुरुषों द्वारा नियंत्रित है। महिलाओं के पास ताकत अन्य क्षेत्रों में है – उनका कर्तव्य बच्चों को पालना और पति को खिलाना है।

वही मानसिकता अब कर्नाटक के शिक्षा परिसरों में प्रदर्शित की जा रही है, जब (मौलवियों और इस्लामवादियों द्वारा) कुछ बरगलाई मुस्लिम लड़कियां हिजाब पहनने की मांग करती हैं–कुछ ऐसा जो उन्होंने पहले नहीं किया था।

जो लोग ‘शैतानी हिंदुत्व’ के खिलाफ मामूली से बहाने पर शोर मचाते है, वे मुसलमानों से जुड़ी बातों पर अपनी आंखें और मुंह बंद रखना पसंद करते हैं। अगर भारत में तसलीमा नसरीन (बांग्लादेशी लेखिका) को परेशान किया जाता है या सलमान रुश्दी को जयपुर में एक साहित्यिक उत्सव में ‘धर्मनिरपेक्ष-इस्लामी गुंडों’ द्वारा बोलने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो उन्हें कोई परवाह नहीं है। वे हर मंदिर में हिंदू महिलाओं के प्रवेश की पुरजोर मांग करते हैं लेकिन साथ ही मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश न करने का समर्थन करते हैं।

उपरोक्त उदाहरण केवल यह साबित करते हैं कि जो लोग सहिष्णुता के महत्व पर हमें बौद्धिक प्रवचन देते हैं, वे वास्तव में स्वयं सबसे अधिक असहिष्णु हैं। जब वे आलोचना करते हैं, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है; लेकिन जब उनकी आलोचना की जाती है तो यह असहिष्णुता बन जाती है। जब वे हिंदुत्व पर सवाल उठाते हैं, तो वे धर्मनिरपेक्ष हो जाते है, लेकिन जब कुछ लोग इस्लामी प्रथाओं पर सवाल उठाते हैं, तो वे सांप्रदायिक हो जाते हैं। ऐसे हैं उनके दोहरे मापदंड!

जैसा कि मैंने हमेशा तर्क दिया है, भारत के धारणा-निर्माताओं पर शिक्षाविदों, कलाकारों, पत्रकारों और योगदानकर्ताओं का भारी वर्चस्व है, जिन्हें नेहरूवादी ढांचे या इस्टैब्लिशमेंट – ‘वाम/उदार/धर्मनिरपेक्ष’–में ढाला जाता है और जो मोदी, भाजपा या हर उससे जिसके पास वैकल्पिक विश्वदृष्टि हो, उससे  नफरत करता है। कोई आश्चर्य नहीं कि वे जानबूझकर यह धारणा बना रहे हैं कि भारत में कुछ नहीं हो रहा है और देश सचमुच जातीय और धार्मिक फॉल्ट-लाइन  के साथ जल रहा है।

विशेष रूप से भारत में शिक्षा के क्षेत्र में, वामपंथी विचारधारा का एक अपरिहार्य प्रभाव रहा है। भारतीय वामपंथ न केवल राज्य के संरक्षण और शिक्षा पर व्यापक पकड़ का आनंद लेना जारी रखता है, बल्कि इसका विपरीत दृष्टिकोणों के प्रति शातिर रूप से असहिष्णु होने का एक लंबा इतिहास रहा है। यह सर्वविदित है कि कैसे प्रसिद्ध कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री जगदीश भगवती को 1950 के दशक में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बाहर कर दिया गया था। वास्तव में, सभी गैर-वाम विचारकों की,  सामान्य रूप से देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में और विशेष रूप से जेएनयू में सामाजिक विज्ञान में, एक व्यवस्थित ‘जातीय सफाई’हुई है।

जेएनयू में वाम दलों की असहिष्णुता कोई नई बात नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए विलाप करने वालों का ऐसा पाखंड है कि जहां जेएनयू के कई शिक्षक और छात्र सहिष्णुता की मांग करते हैं, जब वे हर घर से दोषी आतंकवादी मोहम्मद अफजल जैसे और व्यक्तियों को उभरने के लिए कहते हैं, वहीं वे योग गुरु बाबा रामदेव के खिलाफ जेएनयू कैंपस में रैली करते हैं और उन्हें वहां सभा संबोधित करने से रोकते हैं।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जेएनयू को विचारों की अनेकता की आवश्यकता है। इसलिए वीसी पंडित को इन तथाकथित वामपंथी उदारवादियों को कोई स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें  इन तत्वों के दबाव के आगे नहीं झुकना चाहिए, जो मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी सदस्यों को खुश करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन को स्वीकार करते हैं, लेकिन भारत के विघटन की वकालत करने वालों पर किसी भी कार्यवाही को अस्वीकार करते हैं। इसके बजाय, उन्हें जेएनयू को एक ऐसी संस्था बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए जो न केवल सम्मान करती है बल्कि विभिन्न विचारों और बहसों को भी बढ़ावा देती है। जेएनयू में सौ फूल खिलने दो।

 

प्रकाश नंदा

(prakash.nanda@hotmail.com)

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