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अमृत काल का बजट : आधारहीन आलोचना का जवाब

अमृत काल का बजट : आधारहीन आलोचना का जवाब

भारत के अमृत काल का बजट वित्त मंत्री ने पिछले दिनों संसद में पेश किया। यह वास्तव में भारत के अमृत काल का बजट है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो विश्व की सबसे अधिक गतिमान अर्थव्यवस्था के रूप में स्वीकृत हुई है और आईएमएफ से लेकर वल्र्ड बैंक ने उसके मेट्रो फंडामेंटल्स को बेहतरीन बताया है यह आवश्यक था कि ऐसी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता से आधुनिकता की ओर ले जाने वाला एक नीति पत्रक प्रस्तुत किया जाए। वर्तमान बजट इसी नीति पत्र को प्रस्तुत करता है। आलोचना तो स्वाभाविक है। सार्थक आलोचना सदैव लाभप्रद होती है। किंतु बजट की कुछ आलोचनाएं इतनी आधारहीन और अजीबोगरीब हुई कि उनका यहां उत्तर देना आवश्यक है। कई आलोचनाएं राजनीति से प्रेरित होती है उन्हें समझा जा सकता है। कई आलोचनाएं नवीन सिनिकल शब्द रचने की भावना से प्रेरित होती है उन पर दया की जा सकती है। पर कई आलोचनाएं जानबूझकर भ्रम फैलाने की नीयत से की जाती है जिससे जनसाधारण गुमराह हो ऐसी आलोचनाओं का उत्तर देना और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि किसी भी सजग प्रजातंत्र में नागरिकों को आर्थिक नीति के विषय में सामान्य जानकारी होना आवश्यक है। सरकार की रीति नीति एक घर की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करेगी समाज को क्या देगी और उसका राष्ट्रीय महत्व क्या है यह जानकारी एक आम जन तक पहुंचना आवश्यक होता है। गहराई में जाकर बजट का राजनीतिक अर्थशास्त्र समझना भी आवश्यक है इसलिए यह बजट एक आम व्यक्ति की जिंदगी को कैसे प्रभावित करता है राष्ट्रीय महत्व के विषयों को कैसे समझता है और अपने में समाहित करता है और साथ ही साथ किस प्रकार से यह समाज के सभी वर्गों में उद्यमिता आर्थिक न्याय और जीने की सुगमता जिसे इज ऑफ लिविंग भी कहते हैं को प्रतिस्थापित करता है इस विषय में सही जानकारी उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

बजट की सबसे प्रभावित करने वाली बात थी उसकी लक्ष्य रचना व सुस्पष्टता। अगले दो दशकों का विजन सामने रखते हुए विकास एवं समावेशी कल्याण की बात, निजी निवेश व सार्वजनिक पूंजी निवेश की साझेदारी, प्रौद्यौगिकी जनित विकास, ऊर्जा संक्रमित व जलवायु परक विकास यह सब लक्ष्य एक दूसरे पर कैसे आधारित है यह खाका पेश किया गया। पीएम गतिशक्ति, उत्पादकता बढ़ाना, समेकित विकास व निवेश को वित पोषित कर पाना इस बजट की प्राथमिकता बन कर उभरे। आर्थिक सर्वे में ही स्पष्ट हो गया था कि भारत की अर्थव्यवस्था अब कोविड की त्रासदी के झटकों के बात लगभग बहाल हो चली है। सर्वे में जब 9.2 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान सामने आया, जिसे चंद दिन पूर्व अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान भी समर्थन देता दिख रहा था तो यह आत्मविश्वास दुगना हो चला था कि भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल ही नहीं बल्कि कुछ मामलों में आगे निकल गया है। वित्तीय क्षेत्र के शानदार प्रदर्शन, मैक्रो फंडामेंटल्स ही मजबूती और बेहतरीन जीएसटी के आंकड़े यह इंगित कर रहे थे कि सरकार कैपेन्स व आधारभूत ढ़ांचे पर खर्च करने में परहेज नहीं करेगी।

और यही हुआ। पीएम गतिशक्ति सात रंजन तथा, सडक़, रेल, एयरपोर्ट, सार्वजनिक परिवहन जलमार्ग हो या लोजी स्टीक संरचना इस सभी पर एक बड़ा मास्टर प्लान घोषित हुआ। यह आत्मनिर्भर भारत को ‘अति आधुनिक’ विश्व स्तरीय व्यवस्था में बदलने का रोड मैप है। और इसमें असंख्य रोजगार की संभावनाएं भी हैं।

उदाहरणार्थ 2022-23 राष्ट्रीय राजमर्ग अगर सचमुच 25,000 तक बन सके तो रोजगार संबंधित क्षेत्रों सीमेंट, इस्पात, से लेकर तो अनौपचारिक क्षेत्र तक बढ़ेगें।

एक जबरदस्त नया कानसेप्ट जो विदेश में देखने को मिलता है- यात्री निर्बाध एकीकृत सुविधा। इसमें ईज ऑफ लिविंग व रोजगार छिपे हैं। एकीकृत पोस्टल व रेल, वन स्टेशन बन प्रोडक्ट में कल्पना शक्ति से नयी अर्थव्यवाचा रचना का प्रयत्न किया गया है।

इस बजट में अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण बिंदु की समझ दिखाई दी कि जब मौद्रिक नीति अपना प्रभाव खोने लगती है, और मुद्रास्फीति बाहरी कारणों से हो तो एक समझदार राजकोषीय नीति पर जोर देना अर्थव्यवस्था भी गति को बनाये रखेगा। इस दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा स्फीति के दबाब, बढ़ती ऊर्जा की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय सप्लाई चेन का अवयवस्था को एक अर्थव्यवस्था कितनी त्वरित गति और सततता से रेस्पौंड कर सकती है, भारत का इसका उदाहरण है।

4.39 ट्रिनियन से बढक़र कैपैक्स या पूंजीगत व्यय 5.54 ट्रिलियन होना, यानि एक साथ एक ही वर्ष (स्नङ्घ2 यार्स 22) में 26 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कोई छोटी बात नहीं है। अगर प्रभावी रूप से देखे तो यह 10.26 लाख करोड़ तक आता है। इसलिए इसे मैं ‘बोल्ड’ बजट भी कहूंगी। यह सीधा पूंजीगत व्यय से रोजगार सृजन धमाका था। और यह भी कि इस व्यय की उत्पादकता को सुधारों के साथ लाया जाए और भी अधिक विश्वसनीयता देता है। क्योंकि 6.9 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे के साथ एक बड़े कैनवास पर सार्वजनिक व्यय का रचा गया है जिसमें मुद्रास्फीति पर ध्यान तो है पर उसके अनावश्यक भय से विकास पर उत्पादक खर्च को कम नहीं किया गया।

प्रमुख योजनाओं  में सेहत पर 37,800  जल जीवन मिशन में 60,000 करोड़, शिक्षा मिशन पर 39553, प्रधानमंत्री ग्राम सडक़  योजना पर 19000, पीएम किसान 68000 करोड़, आत्मनिर्भर भारत राजगार योजना 6400 करोड़, प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा 1000 करोड़ एक बड़े कैनवास पर सार्वजनिक व्यय के माध्यम से निजि निवेश व विकास को स्थापित करने की भारतीय नीति विश्व में बहुत जिसासा व प्रशंसा से देखी जा रही है। यही कारण है कि आई. एम. एफ. ने भारतीय बजट को संगत व विकास पर बताया है। बाजार का उत्साह में अलग ही था।

पर तब भी मजेदार आलोचनाएं सामने आयी। मैं यहां कुछ तथ्यहीन आलोचनाओं का उत्तर देना आवश्यक समझती हूं।

पहली आलोचना गरीब का बजट नहीं, लोक कल्याण का उल्लेख नहीं

पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम जिनकी आंकड़ों से खिलवाड़ की आदत से सारा विश्व वाकिफ है उन्होंने कहा कि बजट में गरीब शब्द का उल्लेख केवल दो बार हुआ है इसलिए गरीब का बजट नहीं है। एक तो गरीब का रट्टा लगाने से गरीबी नहीं हटेगी। यह 70 साल में स्पष्ट हो गया। पर तब भी मैं उनका ध्यान समावेशी कल्याण की सभी योजनाओं की ओर दिलाना चाहूंगी जिन्हें वे सुविधापूर्वक भूल गये हैं। हर घर से नल में जल जीवन मिशन में 60,000 करोड़ का व्यय केवल गरीब परिवार नहीं गरीब महिला को राहत देगा जो अपना 30 प्रतिशत उत्पादक समय पानी इकट्टा करने पर लगाती है। 3.8 करोड़ परिवारों का लाभ अनदेखा नहीं किया जा सकता।

80 लाख घर जो पीएम आवास योजना में है वे गरीबों के लिए हैं। सारी महत्वाकांक्षी जिले योजना को ब्लॉक तक ले जाना, यह गरीबी हटाने का पिछड़ापन हटाने का लक्ष्यवेधी मार्ग है।

75 जिलों में डिजिटल बैंकिंग, पीएम वाइब्रेंट सीमावर्ती गांवों की गरीबी हटाने का यत्न है तो पीएम उत्तर पूर्व में पीएम डिवाइन वहां वी साधन हीनता को समाप्त करने का प्रयत्न है।

सारा अपसंरचना का खर्च जो ऊपर बताया है, वह रोजगार पैदा करेगा और गरीबी हटाने में मदद करेगा। इसके अतिरिक्त शिक्षा का स्वास्थ का डिजिटाइजेशन उसके सुगम समानेशी बनायेगा जो निश्चित तौर पर जन कल्याणकारी बड़े कदम हैं। पीएम ग्राम सडक़ योजना में 27 प्रतिशत का इजाफा रोजगार व गरीबी उन्मूलन का अलग प्रकार है। मैं इस लेख में कृषि के सुधार व आधुनिकीकरण को कवर नहीं कर रही वह अपने आप में कल्याणकारी विषय है। राज्यों को खर्च की  सुविधा के लिए जीएसडीपी का एक प्रतिशत अधिक ऋण व 1000 करोड़ का अधिक निवेश सुविधा यह राज्यों में साधन उपलब्ध करायेगा आखिरकार राज्य ही जनकल्याण योजनाएं रचेंगे। यह सब जनकल्याण व गरीबी उन्मूलन के कदम नहीं तो और क्या है? क्या गरीब को दोयम दर्जे का नागरिक मानकर केवल अनुदान सब्सिडी देना ही आधुनिक भारत की नीति होगी? या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, जलवायु, रोजगार व सुरक्षा इस से उसका उन्नयन होगा? यह विचार के विषय हैं। बिना बजट को समझे आलोचना करने के नहीं।

दूसरी आलोचना- यह नेहरूवादी बजट है 

संजय बारू ने प्रतिक्रिया दी कि यह राज्य पूंजीवाद भाग 2 और नेहरू की संरक्षणवाद का बजट है। यह प्रतिक्रिया ‘सिनिकल’ आलोचनाओं के कोष्ठक में रख कर देखी जानी चाहिए। आत्मनिर्भर भारत में भारत के कुटीर उद्योगों को संरक्षित करने की राजकोषीय नीति नेहरू संरक्षणवाद के विपरीत है। उदाहरणार्थ रत्न व जूलरी क्षेत्र में सीमा शुल्क 7.5 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करनेे मात्र से अंतर्राष्ट्रीय निर्यात की केवल राजस्थान की 5000 करोड़ की मार्केट में 800 करोड़ का रोजगार बढ़ेगा और 20,000 संभावित रोजगार यह तो केवल एक अग्रणी राज्य का हाल है। अत: उपयुक्त लक्ष्यवेधी राजकोषीय नीति का अनुकूलतम प्रयोग और राज्य की ‘ओनरशिप’  में उद्योग धंधे लगाना इसमें आधारभूत अंतर है। नेहरू का राज्य पूंजीवाद तो ‘महलो नो विस’ मॉडल पर आधारित राज्य निवेश पर खड़ा था। आत्मनिर्भर भारत ‘कम सरकार’ अधिक गवर्नेंस की बात करता है। दोनों दर्शन के स्तर पर ही अलग हैं। ‘हर हाथ को काम’ का उपाय पंडित दीन दयाल उपाध्याय के दर्शन पर आधारित है जो आत्मनिर्भर भारत का आधार तो है ही साथ ही भारत के ‘नीति निदेशक’ तत्वों के सामाजिक न्याय पर भी आधारित हैं, जिनके विषय में बात ही नहीं होती। चक्रीय अर्थव्यवस्था की बात जो प्रधानमंत्री जी ने वल्र्ड इकोनामिक फोरम में की वह वास्तव में भारतीय दर्शन उपयोग नहीं उपयोग पर आधारित हैं। इसी दर्शन की झलक इस बजट में साफ दिखाई देती है। अत: इसकी नेहरू के विकास मॉडल से तुलना करना केवल भ्रम और तथ्यहीनता की बात है।

तीसरी आलोचना – महिलाओं के लिए बजट में शून्य है

बजट आते ही साम्यवादी लेफ्ट महिला समूह और उनके पैरोकारों का शोर गूंजने लगा कि बजट महिला विरोधी हैं। इससे आधारहीन आलोचना और हो ही नहीं सकती थी। आंकड़ों के आधार पर बात करना वैसे भी लेफ्ट की आदत नहीं है। पर कुछ आंकड़ें देखने चाहिए थे। इस बार ‘जेंडर बजट’ पहली बार पिछले 17 वर्षों में 11 फीसदी बढ़ा है। मैं पहले जेंडर बजट ग्रुप जो तब की महिला बाल विकास मंत्री सुमित्रा महाजन की अगुवाई में तब वित्त मंत्री श्री यशवंत सिन्हा से मिला था उसमें शामिल थी। हम महिला अर्थशास्त्रियों की मांग बाद में श्री अरूण जेटली जी ने भी समझी और आज इस यात्रा में 11 प्रतिशत का इजाफा बहुत संतोष देने वाला है। 1,71,006 करोड़ का महिला परक बजट कोई छोटी बात नहीं है। 2017-2018 में यह हिस्सेदारी 4.34 प्रतिशत थी जो अब- 5 प्रतिशत है। महिला संबंधी उज्जवला योजना, बेटी बचाओ, शुभम, सुकन्या, शक्ति केंद्र ये सभी कुछ हमने पिछले 7 वर्षों में प्राप्त किये है। इन योजनओं में शक्ति, पोषण, वात्सल्य और 2 लाख आंगनबाडिय़ों का उन्नयन महिला दृष्टि से बड़ा कदम है। साथ ही स्टैंड अप, डिजिटल इंडिया, शिक्षा, स्वास्थ व सबसे बड़ी योजना ‘हर घर में नल’ महिलाओं को का राहत देनी वाली योजनाएं नहीं तो और क्या है? पर वामपंथ को प्रधामंत्री के हर कदम पर आक्षेप है। शोर मचाने की और भ्रम फैलाने की आदत छूटती नहीं है। भले ही देश की महिला और गरीब अब वंचित वर्ग के हित की शहनाई को बेसुरा पाते हैं, पर ‘लेफ्ट’ की शहनाई अब ‘लाफ्टर शो’ बन गयी है।

इस पर में कृषि क्षेत्र होने वाली आधारहीन आलोचनाओं की पिटारा अलग से खोलूंगी अभी इतना ही कहना काफी है। कृषि के आधुनिकीकरण और लागत कटौती का बड़ा मानचित्र इस बजट में है। सुधार से लागत कमी और आय वृद्धि का यह गुणात्मक सुधार समझना होगा।

संक्षेप में यह अमृत काल का बजट न केवल आधुनिक बजट न केवल मार्ग प्रशस्त करते है बल्कि भारत को वैश्विक मानदंडों तक लाकर, उत्पादन इन्नोवेशन, उत्पादक निवेश, स्किल और गति का अद्भुत समावेश भी देता है।

यह सुरक्षा दृष्टि, सामरिक दृष्टि और सीमावर्ती गांव व उत्तर-पूर्व पर भी ध्यान देता है और रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भी देता है। और सर्कुलर इकोनॉमी का विषय भी उठाता है। डिजिटल भी है लोकल भी।

आलोचनाएं सार्थक हो तो सुधार लाती है हैं। और विमर्श से सहमति और विश्वास जन्म लेता है। मगर अगर भारत विरोधी विमर्श के ठेकेदार ‘मिथ फैक्टरी’ में भ्रम रचकर जनता के हित को आहत करना चाहे तो उसका तथ्यों के साथ पुरजोर विरोध होना चाहिए। क्योंकि सबका विश्वास सहमति और प्रयास से ही आधुनिक भारत की विकास यात्रा को सच्ची ऊर्जा मिलेगी।

 

 

डॉ. ज्योति किरण शुक्ल

(लेखिका पूर्व अध्यक्ष, वित्त आयोग, राजस्थान, हैं।)

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