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हिन्दू होने का आरोप लगा कर सुनील जाखड़ किए पंजाब की राजनीति से बाहर

हिन्दू होने का आरोप लगा कर सुनील जाखड़ किए पंजाब की राजनीति से बाहर

यह सुविदित ही है कि लगभग चार महीना पहले जब पंजाब में सोनिया कांग्रेस अपने ही मुख्यमंत्री को अपदस्थ करने के षड्यंत्र में लगी हुई थी तो नया मुख्यमंत्री कौन हो, इस पर भी उत्तेजित बहस हो रही थी। मुख्यमंत्री के लिए सुनील जाखड़़़ का भी नाम कांग्रेस के भीतर से प्रमुखता से आने लगा था। वे पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे। राजनीति में लम्बे अरसे तक रहने के बावजूद उनका दामन पाक साफ माना जाता है। पंजाब में कुछ लोग कहते रहते हैं कि पंजाब का मुख्यमंत्री तो जाट ही बन सकता है। इस लिहाज से जाखड़़ भी जाट हैं। मुख्यमंत्री की दौड़ में नवजोत सिंह सिद्धु और सुखजिंदर रंधावा भी दावेदार थे। चरनजीत सिंह चन्नी का नाम भी कहीं कहीं चर्चा में आ जाता था। ऐसी हालत देख कर  सोनिया कांग्रेस ने अपने दल के 79 विधायकों से पूछा था कि मुख्यमंत्री किसको बनाया जाए? राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी ही इस काम में लगी हुई थी। इसलिए  पंजाब के कांग्रेसी विधायक दिल्ली जाकर उनसे मिल भी रहे थे। यह काम निपटा कर उन्होंने घोषणा कर दी कि कांग्रेस के अधिकांश विधायक चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में हैं। जाहिर है सुनील जाखड़ इस दौड़ से बाहर कर दिए गए और राहुल गांधी ने फोन पर चन्नी को बता दिया कि उनको मुख्यमंत्री बनाया गया है और कहा जाता है चन्नी इस अप्रत्याशित घोषणा से रोने लगे। अलबत्ता ये आंसू खुशी के थे। लेकिन जाखड़ को दरवाजे से बाहर क्यों किया गया, यह रहस्य बना रहा। आखिर उनकी सोनिया-राहुल-प्रियंका से क्या अदावत थी कि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया? क्या वे अपने चरित्र को लेकर या भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे थे? पंजाब के लोग इतना तो जानते थे कि सुनील जाखड़ पर ऐसा कोई दाग नहीं है। वैसे तो सोनिया कांग्रेस की एक तथाकथित वरिष्ठ नेत्री, अम्बिका सोनी ने इशारों इशारों में स्पष्ट कर दिया था। अलबत्ता स्पष्ट करने का ढंग उनका अपना था। उन्होंने कहा कि सोनिया कांग्रेस तो मुझे मुख्यमंत्री  बनाना चाहती थीं लेकिन मैंने साफ मना कर दिया कि मैं मुख्यमंत्री नहीं बन सकतीं क्योंकि पंजाब का मुख्यमंत्री कोई सिख ही बन सकता है। लेकिन तब किसी ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया था। वे जमीनी नेत्री नहीं हैं। अम्बिका गांधी पंजाब की मुख्यमंत्री बनेंगी, इसे चुटकुला तो माना जा सकता है, गंभीर बयान नहीं। उस समय सुनील जाखड़ लगभग चुप ही रहे थे। शायद पार्टी का अनुशासन उन्हें चुप रहने के लिए विवश कर रहा होगा। वैसे भी अब क्या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पहले से ही पाकिस्तान की गतिविधियों के चलते अस्थिर हो रहे पंजाब में हिन्दु-सिख के आधार पर राजनीति करेगी?

उसके बाद जल्दी ही विधानसभा चुनावों की घोषणा हो गई। तब सोनिया कांग्रेस ने घोषणा की कि सुनील जाखड़, नवजोत सिंह सिद्धु और चरनजीत सिंह चन्नी के संयुक्त नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा। सुनील जाखड़ को चुनाव समिति का अध्यक्ष भी बना दिया गया। लेकिन शुरु के एक दो पोस्टरों में जाखड़ की फोटो लगी, उसके बाद गायब हो गई। जैसे-जैसे मतदान का दिन नजदीक आने लगा कांग्रेस के भीतर फिर बहस उठने लगी कि पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, इसकी घोषणा करनी चाहिए। एक बार फिर से सुनील जाखड़, नवजोत सिंह सिद्धु और चरनजीत सिंह चन्नी के नाम की चर्चा पार्टी के भीतर और बाहर होने लगी। इस बार राहुल गांधी ने कहा कि वे यह घोषणा पंजाब की जनता से पूछ कर करेंगे। पूछने की प्रक्रिया चालू हो गई। जब राहुल गांधी पंजाब की जनता से पूछताछ का पाखंड कर रहे थे, तभी संकेत मिलने लगे थे कि सुनील जाखड़ को एक बार फिर मुख्यमंत्री के पाले से बाहर किया जा रहा था। धैर्य की भी हद होती है। उनके सब्र का बांध टूट चुका था।

राहुल गांधी अपने पूछताछ के परिणाम की घोषणा करें, उससे दो दिन पहले ही सुनील जाखड़ ने अबोहर की एक जनसभा में धमाका कर दिया। अबोहर की जनसभा में सुनील जाखड़ ने सार्वजनिक रूप से खुलासा किया की राहुल और उनकी बहन ने उन्हें मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनने दिया और अब भी क्यों नहीं बनने देंगे। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री का निर्णय करने के लिए विधायकों की राय पूछने की जो प्रकिया चलाई थी, उस प्रक्रिया में  उन्हें 42, रंधावा को 16, प्रणीत कौर को 12, नवजात सिंह सिद्धू को 6 और चरणजीत सिंह चन्नी को 2 विधायकों ने मत दिया था। जाखड़ का कहना है कि वे विधानसभा के सदस्य भी नहीं हैं, तब भी उन्हें 42 विधायकों ने मत दिया, लेकिन फिर भी उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। वैसे तो कांग्रेस के लिए यह कोई नई बात नहीं है। अंग्रेजों के इस देश से जाने के अवसर पर देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इसको लेकर कांग्रेस के भीतर राय मांगी गई थी। उस समय पन्द्रह प्रदेश कांग्रेस समितियां थीं। उनमें सरदार पटेल को 12 और पंडित जवाहरलाल नेहरु को केवल दो वोट मिले थे। लेकिन प्रधानमंत्री नेहरु ही बने। सरदार पटेल को रास्ते से हट जाने का आदेश महात्मा गांधी ने जय प्रकाश नारायण के हाथों गुप्त रूप से भिजवाया था। कांग्रेस के इस इतिहास को तो सुनील जाखड़ भी जानते होंगे। इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री न बनाए जाने में आश्चर्य की क्या बात थी? उस आश्चर्य की बात का खुलासा भी जाखड़ ने इस जनसभा में किया। महात्मा गांधी के निर्णय का आधार मजहब या जाति नहीं थी। लेकिन सोनिया कांग्रेस के निर्णय का आधार शुद्ध रूप से मजहब ही था। जाखड़ का कहना है कि उन्हें हिन्दु होने का आरोप लगा कर पंजाब के मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर कर दिया गया। सुनील जाखड़ का कहना है यदि सोनिया कांग्रेस उसे किसी आरोप के आधार पर मसलन भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, अनुशासनहीनता के कारण नकार देती तो मुझे कोई दुख न होता। लेकिन सोनिया गांधी के पास ऐसा कोई आरोप नहीं था। लेकिन उन्हें हिन्दु होने का आरोप लगा कर बार-बार इस दौड़ से बाहर किया जा रहा है, दुख इस बात का है। इतना ही नहीं, सोनिया कांग्रेस ने हिन्दु होने का आरोप और उसके आधार पर मुख्यमंत्री के लिए अयोग्य होने का सन्देश सार्वजनिक रूप से अम्बिका सोनी के माध्यम से पंजाब और देश के लोगों तक पहुंचाया।  सुनील जाखड़ का यह भी कहना है कि राहुल गांधी ने उसे बुलाकर यह भी कहा कि तुम उप मुख्यमंत्री बन जाओ। लेकिन मुख्यमंत्री क्यों नहीं, जब 42 विधायक ऐसा कह रहे हैं? उसका उत्तर शायद राहुल के पास एक ही था कि तुम हिन्दू हो। इसलिए राहुल गांधी ने उस पर हिन्दु होने का आरोप लगा कर उसे मुख्यमंत्री के लिए अयोग्य ठहरा दिया। सुनील जाखड़ का दर्द समझा जा सकता है। पंजाब में वे साफ-सुथरे आचरण के राजनीतिज्ञ माने जाते हैं। केवल हिन्दु होने के आरोप में किसी को खारिज कर दिया जाए तो कष्ट तो होगा ही। ताज्जुब है कि पंजाब के कांग्रेसी तो हिन्दु-सिख के आधार पर नहीं सोचते। यदि ऐसा होता तो 42 विधायक जाखड़ का समर्थन क्यों करते?

यदि सोनिया गांधी को लगता था कि सुनील जाखड़ उनको राजनैतिक नफा-नुकसान के आधार पर अनुकूल नहीं लगते तो उनको नकारने का अधिकार उनके पास था ही। लेकिन उसको नकारने के लिए सोनिया कांग्रेस ने जो रास्ता अपनाया, वह पंजाब के लिए बहुत खतरनाक है। उनको नकारने का कारण उनका हिन्दु होना बताया गया। इस काम के लिए अम्बिका सोनी को मैदान में उतारा गया। उस महिला ने सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस की ओर से घोषणा की कि पंजाब में कोई हिन्दू मुख्यमंत्री नहीं बन सकता यहां केवल सिख ही मुख्यमंत्री बन सकता है। सुनील जाखड़ को इस बयान के बिना भी मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर किया जा सकता था। लेकिन शायद कांग्रेस का मकसद जाखड़ को मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर करना इतना नहीं था जितना हिन्दु-सिखों के मनों में दरार पैदा करना। पंजाब के लोगों को सोनिया कांग्रेस का यह खतरनाक खेल इतना घटिया लगा कि अमृतसर स्थित अकाल तख़्त के जत्थेदार को भी कहना पड़ा कि मुख्यमंत्री के लिए योग्यता देखी जानी चाहिए मजहब कोई भी हो, वह महत्वपूर्ण नहीं है।

पंजाब में कांग्रेस जो खेल खेल रही है, वह सचमुच बहुत चिन्ताजनक है। पंजाब सीमान्त राज्य है और पाकिस्तान पिछले लम्बे अरसे से यहां हिन्दु-सिख में दरारें डालने की कोशिश कर रहा है। इतना ही नहीं वह यहां की आन्तरिक राजनीति में हस्तक्षेप कर अपने सैल बनाने के प्रयास में लगा हुआ है। पिछले दिनों कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने बहुत ही सधे हुए शब्दों में खुलासा किया था कि नवजोत सिंह सिद्धु को मंत्रिमंडल में लेने के लिए उन्हें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के नजदीकी मध्यस्थ का मैसेज आया था। मैसेज में यहां तक कहा गया था कि फिलहाल आप सिद्धु को मंत्री बना दें यदि बाद में वह आपके हिसाब से ठीक न रहे तो आप उसे हटा सकते हैं। कैप्टन का कहना है कि उन्होंने वे मैसेज सोनिया गांधी को अग्रेषित कर दिए थे। सोनिया गांधी ने रहस्यमय चुप्पी धारण किए रखी लेकिन उनकी बेटी ने जरुर उत्तर दिया कि सिद्धु पागल है, उसे ऐसे मैसेज नहीं करवाने चाहिए। इसके बाद मामला ठप्प हो गया।  लेकिन शायद इन मैसजों के आदान- प्रदान के बाद ही नवजोत सिंह सिद्धु पाकिस्तान गया था, जहां उसने एक सार्वजनिक सभा में इमरान खान की जम कर तारीफ ही नहीं की थी बल्कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा का आलिंगन भी किया था। कुछ पत्रकारों ने सिद्धु की इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी लेनी चाही तो उसका उत्तर था कि मरे को क्या मारना? यानि मैं कैप्टन की किसी बात का उत्तर नहीं दूंगा क्योंकि अब उसकी कोई औकात नहीं है। सिद्धु की नजर में कैप्टन की अब कोई औकात नहीं हो सकती लेकिन यह घटना उस समय की है जब कैप्टन की औकात थी और सिद्धु की कोई औकात नहीं थी। जाहिर है सिद्धु या तो उत्तर देने से बचना चाहते थे या फिर उनके पास उत्तर था ही नहीं।

लेकिन अब यह मामला सिद्धु से ज्यादा सोनिया गांधी के आसपास घूमना शुरु हो गया है क्योंकि कैप्टन ने यह भी बताया कि  सोनिया गांधी जब सिद्धु को कांग्रेस में लेना चाहती थी तो उन्होंने कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को ही उसका मूल्यांकन कर रिपोर्ट देने के लिए कहा था। कैप्टन की रिपोर्ट सिद्धु के पक्ष में नहीं थी। लेकिन उसके बावजूद सोनिया गांधी ने सिद्धु को पार्टी में शामिल कर लिया। तिथि क्रम से देखें तो सिद्धु के पक्ष में पाकिस्तान के दबाव की घटना इसके बाद हुई। उसके बाद सिद्धु ने पाकिस्तान में जाकर इमरान खान के पक्ष हमें भाषण दिया। इस भाषण के बाद कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने सार्वजनिक रूप से सिद्धु के इस कृत्य से अपनी असहमति जिताई। लेकिन उसके बाद से ही सोनिया गांधी का दबाब कैप्टन अमरेन्द्र सिंह पर बढऩे लगा कि नवजोत सिंह सिद्धु को पंजाब कांग्रेस का प्रधान बनाया जाए। जाहिर है कि पाकिस्तान को लेकर उक्त घटनाक्रम के रहते कैप्टन इस बात से कैसे सहमत हो सकते थे। उन्होंने परोक्ष रूप से एक दो बार सार्वजनिक ब्यान भी दिए कि पंजाब सीमान्त प्रदेश है और पाकिस्तान पंजाब में कुछ न कुछ शरारत करता रहता है, वह हिन्दू-सिख में विवाद करवाने के प्रयास भी करता रहता है। इसलिए पंजाब में कोई ऐसा राजनैतिक प्रयोग नहीं करना चाहिए जिससे यहां अस्थिरता फैले और पाकिस्तान अपनी चाल में सफल हो सके। लेकिन सोनिया गांधी का दबाब बराबर बना रहा और कैप्टन को सिद्धू को पंजाब कांग्रेस के रूप में स्वीकार करना पड़ा। मामला यहां तक होता तब भी गनीमत थी। कैप्टन पाकिस्तान के विरोध में बयानबाजी बन्द नहीं कर रहे थे। जाहिर है नवजोत सिंह सिद्धू और उसके यार इमरान खान के बीच कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ही रोड़ा था। इसलिए उसको हटाना जरुरी था। सोनिया गांधी ने अन्तत: वह भी कर दिया। लेकिन रणनीति तो इससे भी आगे की थी। कैप्टन कह चुके थे कि पाकिस्तान पंजाब में हिन्दु-सिख के बीच दरारें डालने का काम कर रहा है। लेकिन उस काम को कैप्टन को हटाने के बाद सोनिया कांग्रेस ने या तो जानबूझकर कर या फिर अपने संकीर्ण राजनैतिक हितों के लिए सम्पन्न किया।

ताज्जुब है सोनिया गांधी भी पाकिस्तान से आए मैसेजों की बात पर चुप्पी लगाकर बैठ गई हैं, जबकि कैप्टन का कहना है कि उन्होंने  इस सारे घटनाक्रम की सूचना उन्हें दे दी थी। सोनिया गांधी को स्पष्ट करना चाहिए, यह सूचना मिलने के बाद भी वे नवजोत सिंह सिद्धु के पक्ष हमें मोर्चा क्यों संभाले रही?  टेकनॉलोजी के लोग कहते हैं कि सारे मैसेज पुन: निकाले जा सकते हैं। लगता है धीरे-धीरे शिकंजा कसता जा रहा है।

पंजाब में हिन्दु-सिख में दरारें डालने का काम पाकिस्तान पिछले लम्बे अरसे से कर रहा है, इसमें कोई संशय नहीं है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से तो लगता है कि यह काम सोनिया कांग्रेस भी उसी गंभीरता से कर रही है। वह पंजाब में अपनी पूरी राजनीति ही हिन्दु सिख को बांट कर चलाना चाहती है। कांग्रेस के पास इसका समुचित अनुभव भी है और उद्देष्य भी। दिल्ली में 1984 में हुआ नरसंहार इसका प्रमाण है। 1984 में दिल्ली में सिखों का कतले आम करके वह पंजाब के हिन्दुओं की वोट लेना चाहती थी और अब सुनील जाखड़ को हिन्दु होने के आरोप में दौड़ से बाहर कर सिखों का धु्रवीकरण करना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में हिन्दु सिख में अलगाव पैदा करने वाली इस रणनीति से सोनिया कांग्रेस को नुक़सान होने की भी संभावना है। राजनीतिक नुक़सान उठा कर भी सोनिया कांग्रेस पंजाब में हिन्दु सिख की चौसर क्यों बिछा रही है? यह रहस्य अभी तक बरकरार है।

आखिर कांग्रेस पंजाब को हिन्दु और सिख के आधार पर विभाजित करने का राष्ट्र विरोधी कार्य क्यों कर रही है? इसका उत्तर राहुल गांधी ने लोकसभा में दिया। उन्होंने कहा कि भारत राज्यों का संघ है, भारत एक राष्ट्र है ही नहीं। भारत को लेकर यह दुविधा नेहरु-गांधी परिवार में नई नहीं है। दुविधा पुरानी है, अलबत्ता इसमें इटली का छौंक लग जाने कारण यह दुविधा बढ़ गई है। पंडित जवाहरलाल नेहरू भी अपने जमाने में भारत को समझने और पहचानने के प्रयास में लगे हुए थे। इस प्रयास में उन्होंने अंग्रेजी भाषा में एक मोटी किताब डिस्कवरी आफ इंडिया भी लिख दी थी। वे भारत को कितना समझ पाए और कितना नहीं समझ पाए, ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन वे जिस रास्ते पर चल पड़े थे उसका निष्कर्ष उन्होंने यह निकाला कि भारत में एक राष्ट्र बनने की प्रक्रिया शुरु हो गई है। नेहरु की एक और दिक्कत थी। वे भारत को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से समझने का प्रयास कर रहे थे। अंग्रेजी भाषा में भारत को समझाने के लिए अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने कई पाठ्य पुस्तकें लिख दी थीं। अंत: इस रास्ते से भारत को समझना मुश्किल था। भारत को भारतीय भाषाओं और भारतीय संस्कारों से ही समझा जा सकता था। लेकिन नेहरु के दुर्भाग्य से भारतीय भाषाएं उनके लिए ग्रीक थीं। अपनी मातृभाषा कश्मीरी तो वे न समझते थे न बोलते थे। जिस उत्तर प्रदेश में जाकर वे बस गए थे, वहां की भाषा वे बोल तो लेते थे लेकिन सहजता से लिख-पढ़ नहीं सकते थे। अब इतने अन्तराल में कांग्रेस ने भी लम्बी यात्रा तय कर ली है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से शुरु हुई यह यात्रा सोनिया कांग्रेस तक पहुंच गई है। जाहिर है अब तो इसके लिए भारत को समझना और भी मुश्किल हो गया है। नेहरु कम से कम इतना तो मानते थे कि भारत राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है, राहुल गांधी तो उससे भी मुनकिर हो रहे हैं। भारत में राज्य और शासन व्यवस्थाएं तो अनेक रहीं लेकिन वह एक राष्ट्र है, इस में किसी को कभी संशय नहीं रहा। कांग्रेस भारत के एक राष्ट्र होने पर प्रश्न चिन्ह लगाती रही। राष्ट्र के प्रतीकों को नकारती ही नहीं रही बल्कि प्रत्यक्ष परोक्ष उन्हें नष्ट करने में भागीदार भी बनी रही। यही कारण है कि सोनिया कांग्रेस आज इस मुकाम पर पहुंच गई है। राहुल गांधी को सुन कर तो ऐसा लगता है मानों वह भारत राष्ट्र के खिलाफ कोई जंग लड़ रही हो। इस जंग को तेज करने के लिए ही उसने कन्हैया कुमार जैसे टुकड़े-टुकड़े गैंग को पार्टी में भर्ती किया लगता है। उसकी इस लड़ाई में साम्यवादी ताकतें तो साथ दे सकती हैं क्योंकि उनकी लड़ाई भी भारतीय राष्ट्रीयता के खिलाफ ही है, लेकिन भारत का आम आदमी उसका साथ नहीं दे सकता। पहले मैं समझता था, सोनिया कांग्रेस के भीतर जो जी 23 के नाम से विद्रोही ग्रुप पनपा है, वह केवल सत्ता की रेवडिय़ों की असंतुलित बांट के कारण पनपा है, लेकिन राहुल गांधी के इस भाषण के बाद मुझे लगता है कि इसमें एक कारण सोनिया कांग्रेस का भारत के प्रति यह दृष्टिकोण भी हो सकता है, जिसकी नुमांयदगी राहुल गांधी ने लोकसभा में की।

 

 

प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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