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कश्मीरी वाजवान का क्या कहना!

कश्मीरी वाजवान का क्या कहना!

कश्मीरी वाजवान असल में मध्य एशिया में लगभग 600 साल पहले कश्मीर उस वक्त आया, जब वहां के मुक्तलीफ सूफी लोग अपने साथ वहां का आर्ट, कल्चर, वास्तुशिल्प से संबंध रखने वाले कारीगरों को साथ लाए। इन कारीगरों के साथ कुछ मुक्तलीफ बाबर्ची भी कश्मीर आये, जिन्होंने कश्मीरी रसोइयों के साथ मिलकर नए पकवान बनाने का अनुभव हासिल किया। इस तरह शादी-ब्याह और दूसरे अवसरों के लिए कश्मीरी वाजवान के नाम पर एक दर्जन के करीब पकवानों को बना कर सबसे पहले उस वक्त के बादशाह और धनी लोगों के सामने पेश किया। क्योंकि, कश्मीरी वाजवाज बनाने के लिए काफी समय और पैसे की अवश्यकता पड़ती है इसलिए इसे सबसे पहले रहीसों, राजे-रजवाड़ों और धनी लोगों ने ही बनाना शुरू किया। आज-कल तो कश्मीरी वाजवान खाने का रिवाज आम हो गया है शादी-ब्याह और दूसरे मौकों पर भी आमतौर पर कश्मीर में हर जगह मिल जाता है।

वाजवान का मतलब अगर जाने तो वाज बाबर्ची को कहते हैं और वान दुकान को, क्योंकि जब कश्मीर में शादी और दूसरे अवसरों पर पकवान बनाए जाते हैं, तो इसे पकाने के लिए कम-से-कम 500 फुट स्कवायर का स्थान चाहिए होता है। जहां मुख्य बाबर्ची के साथ उसके साथी बैठ कर गोश्त को कूटने का काम करते हैं। अलग-अलग पकवान के लिए अलग-अलग गोश्त को चुनते हैं और मसाले मिलाते हैं। वहीं एक तरफ गोश्त को पकाने के लिए दस से बीस फुट लंबी लकड़ी की भट्टी बनाते हैं और इस भट्टी के ऊपर बड़े-बड़े कॉपर के बर्तन रख कर गोश्त पकाये जाते हैं। कश्मीरी वाजवान के लिए बकरी या भेड़ का ताजा गोश्त ही होना चाहिए । इसके अलावा बकरी या भेड़ का वजन 15 से 20 किलों से ज्यादा नहीं होना चाहिए। क्योंकि ज्यादा वजन के जानवर के गोश्त का स्वाद अच्छा नहीं होता है।

कश्मीरी वाजवान की असल में एक दर्जन से कम किस्म हैं। जिनमें कबाब, तबकामाज, मीठीमाज, रिश्ता, मिर्च कोरमा, धनिया कोरमा, यख्नी और गुश्ताब शामिल है। मगर वक्त के साथ-साथ कश्मीर के रहीस लोगों और वाजवान तैयार करने वाले कारीगरों ने कई और किस्मों का इजाफा करके वाजवान को और अधिक स्वादिष्ट बना दिया है।

वाजवान को कश्मीर में ही नहीं मुल्क के बाहर भी काफी पसंद किया जाता है। मगर इसको सरकारी और गैर-सरकारी तौर पर बढ़ावा देने की कोई कोशिश नहीं की गई। जबकि दिल्ली और दूसरे कई शहरों में सालाना फूड फेस्टिवल के मौके पर कश्मीरी वाजवान के स्टॉल भी लगाए जाते हैं। दिल्ली के सिवाय दूसरे मेट्रो पोलिटन सिटी कलकता, चेन्नई में कश्मीरी वाजवान उपलब्ध ही नहीं है। किसी कश्मीरी व्यापारी या रेस्तरां चलाने वालों ने कभी भी वाजवान को बढ़ावा देने की कोशिश नहीं की। मगर इसके शौकीन हर जगह पाए जाते हैं। पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में 2 और हजरत निजामुद्दीन इलाके में 1 कश्मीरी रेस्तरां मौजूद है। मगर यहां भी कश्मीरी वाजवान के एक या दो व्यंजनों से ज्यादा उपलब्ध नहीं होते हैं।

पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में कश्मीरी खानों का रेस्तेरा चलाने वाले गुलाम हसन सरकार जो कि कश्मीरी हैं उन्होंने बताया कि उनके रेस्तरां में ज्यादातर कश्मीरी लोग ही खाना खाने आते हैं। जबकि निजामुद्दीन इलाके में रेस्तेरां चलाने वाले मिस्टर.बेल का कहना है कि वो दिल्ली में कश्मीरी लोगों के खास मौकों पर कश्मीरी खाने की व्यवस्था भी करते हैं।

यहां ये बताना जरूरी है कि कश्मीरी वाजवान खाने में बढ़ा स्वादिष्ट होता है अगर इसे खाने का एक बार किसी को चस्का लग जाए तो बार-बार खाने का मन करता है। मगर इसका ज्यादा इस्तेमाल सेहत के नजरिए से लोगों के लिए नुकसानदेह है, क्योंकि इसमें काफी मात्रा में मिर्च-मसालों का इस्तेमाल किया जाता है। ये काफी गरिष्ठ होता है। इसको लकड़ी की भट्टी पर रख कर तैयार करने में 5-6 घंटे लगते हैं। कश्मीरी वाजवान तैयार करने वाले काफी कारीगरों ने कश्मीर घाटी में फैक्ट्रीयां खोली हुई हैं। जहां पर कश्मीरी वाजवान की कई किस्में डिब्बों में बंद करके बाहर सप्लाई करते हैं। मगर आम लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है, कि ये डिब्बों में पैक भी मिलते हैं। दिल्ली में वाजवान खाने के शौकीन जम्मू-कश्मीर हाउस जाते रहते हैं। मगर वहां भी एक या दो किस्म की वाजवान ही उपलब्ध होती हैं।

जरूरत इस बात की है कि कश्मीरी वाजवान को प्रमोट करने के लिए जम्मू-कश्मीर की सरकार का महकमा टूरिजम और उससे संबंधित महकमे कश्मीरी वाजवान को मुल्क के शहरों में उपलब्ध कराने के लिए रेस्तरां की एक ऐसी चेन बनाई जाए जहां वाजवान खाने के शौकीन आ कर इसका लुत्फ ले सकें।


कश्मीरी मिर्च कोरमा


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सामग्री

सूखी लाल मिर्च- 10, प्याज- 3 पीस, दालचीनी-2, अदरक लहसुन पेस्ट-1 चम्मच, जीरा-1 चम्मच, मीट मसाला-1 चम्मच, सौंफ पावडर-1 चम्मच, इमली पेस्ट-2 चम्मच, नमक स्वादअनुसार, मीट-1 किलो।

विधि

पैन में थोड़ा सा तेल गरम करें, उसमें कटी हुई प्याज फ्राई करें। जब प्याज गोल्डन ब्राउन हो जाए तब उसमें मीट फ्राई करें। उसके बाद उसमें दालचीनी, सौंफ पावडर, जीरा और मीट मसाला पाउडर डालें। अब इसमें थोड़ा सा पानी डाल कर 15 मिनट तक पकाएं। एक अलग पैन में सूखी लाल मिर्च, जिसके बीज निकले हुए हों डाल कर पानी मिलाएं और उसे मुलायम होने तक उबाल लें। जब मिर्च मुलायम हो जाए तब उसमें से पानी अलग करें और मिक्सी में पीसें। इस मिर्च के पेस्ट में इमली का पेस्ट डालें और मिक्स करें। अब इस मिर्च और इमली के पेस्ट को मीट के साथ तब तक पकाएं जब तक कि ग्रेवी गाढ़ी ना हो जाए। अब ताजी धनिया से इसे गार्निश करके गरमा गरम सर्व करें।

नोट- (स्वाद के नजरिए से ये काफी अच्छा होता है। इसमें प्रोटीन, और विटामिन भी काफी मात्रा में पाये जाते हैं। लेकिन, ज्यादा मिर्च-मासाले के कारण नियमित प्रयोग करने से बचना चाहिए। क्योंकि सेहत पर इसका बुरा प्रभाव भी पड़ सकता है। )


कश्मीरी गुश्ताबा


Gushtaba

सामग्री

कीमा- 1/2 किलो, बोनलेस मटन- 100 ग्राम, दही-200 ग्राम, इलायची- 2 टेबल स्पून, पुदीना के पते -3, तेल- अवयश्कता अनुसार, प्याज-2 (कटा हुआ), केसर-1 पिंच,नमक-स्वादानुसार, अदरक, लहसुन का पेस्ट-3 टेबल स्पून, गरम मसाला -1/2 टेबल स्पून, धनिया पता – (बारीक कटा हुआ), मटन स्टॉक -200 मि.लि, कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर-2 टेबल स्पून

विधि

  • सबसे पहले मटन को मिक्सी में अंडे डाल कर (एक बार घुमा कर) पीस लीजिये, अब पिसे हुआ मिश्रण में नमक, इलायची पाउडर, कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर, अदरक, लहसुन का पेस्ट डाल कर मिला लीजिये।
  • अब एक कड़ाई में तेल डालकर गरम कीजिये, उसमे गरम मसाला, बचा हुआ अदरक, लहसुन का पेस्ट डाल कर भुने, अब मटन स्टॉक, पुदीना के पते और धनिया पता डाल कर मिलाये, पिसे हुए मिश्रण को छोटे-छोटे गोल बनाकर उसमे डाल कर पकायें, मटन की गोलियां पूरी तरह पकने के बाद दही को फेट कर डाले, अब नमक, केसर डाल कर धीमी आंच पर 3 मिनट तक पकाये, गरमा-गरम गुश्ताबा तैयार है।

नोट- (गुश्ताबा के लिए भेड़ या बकरी की बोन लेश रांझ का गोशत होना चाहिए। यख्नी बनाने का भी वहीं फॉर्मूला है जो गोश्ताबा बनाने का है। फर्क ये है कि यख्नी में हड्डियों वाले गोश्त का प्रोयग होता है और अंडे का प्रयोग नहीं होता है)


 

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