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धर्म का जुनूनी चेहरा

धर्म का जुनूनी चेहरा

भारत में धर्म परिवर्तन कोई आज की समस्या नहीं है। सदियों की सभ्यता है भारत और इसमें भांति-भांति के लोग, अपनी अलग अलग विचारधारा और सर्वधर्म समभाव से रहते आये हैं। धर्म परिवर्तन पहले एक स्वैच्छिक निर्णय हुआ करता था लेकिन आज की परिस्थितियों में धर्म का एक अलग ही जुनूनी चेहरा सामने आ रहा है। तमिलनाडु के तंजावुर में कक्षा 12 की छात्रा लावण्या ने ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किये जाने के बाद खुदकुशी कर ली। खुदकुशी के प्रयास के बाद उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया लेकिन उस पर इलाज का कोई असर नहीं हुआ। 19 जनवरी को तंजावुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। 17 वर्षीय लावण्या तंजावुर में सेंट माइकल्स गल्र्स होम नामक एक बोर्डिंग हाउस में थी। एक वीडियो सामने आया है जिसमें लावण्या ने कबूल किया कि उसे लगातार डांटा जाता था और हॉस्टल वार्डन द्वारा हॉस्टल के सभी कमरों को साफ करने के लिए भी कहा जाता था। लडक़ी ने आरोप लगाया कि उसे लगातार ईसाई धर्म अपनाने के लिए भी मजबूर किया गया। इन घटनाओं से परेशान होकर युवती ने खुदकुशी के प्रयास में कीटनाशक दवा खा ली। अरियालुर के रहने वाले लावण्या के पिता मुरुगनंदम को 10 जनवरी को सूचित किया गया था कि उनकी बेटी को 9 जनवरी को उल्टी होने और पेट में तेज दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मुरुगनंदम ने लावण्या को तंजौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में शिफ्ट कर दिया। जब उसे होश आया तो उसने डॉक्टरों को अपनी पीड़ा और आत्महत्या के प्रयास के बारे में बताया। इसके बाद, डॉक्टरों ने तिरुकट्टुपल्ली पुलिस को सूचित किया। पुलिस लावण्या से पूछताछ करने आई। पूछताछ के आधार पर पुलिस को पता चला कि बोर्डिंग स्कूल की वार्डन ने लावण्या को प्रताडि़त किया और उसे ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने 62 वर्षीय वार्डन सकायामारी को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन आखिरकार 19 जनवरी की रात लावण्या धर्म के इस जुनूनीपन का शिकार हो इस दुनिया को अलविदा कह गयी।

एक बहुत पुराना व्यंग्य है- एक बार एक मांसाहारी व्यक्ति ऐसे ईसाई सामाज के बीच रहने लगा जहां सभ्य और शुद्ध शाकाहारी लोग रहा करते थे। वह व्यक्ति हर रोज मांस पकाया करता था जिसकी गंध से सारे पड़ोसी परेशान होकर पादरी के पास गए और उनसे विनती की, कि या तो वह व्यक्ति यहां से कहीं और चला जाए या अपना धर्म बदल कर ईसाई बन जाए और मांसाहार छोड़ दे।

उस व्यक्ति को जब बुला कर पूछा गया तो वह धर्म बदलने को तैयार हो गया। तत्काल उसके उपर जल छिडक़ कर बोल दिया गया कि आज से तुम ईसाई धर्म के नियम व तौर-तरीकों को अपनाओगे, मांसाहार नहीं करोगे आदि-आदि। समाज के सभी लोगों ने चैन की सांस ली। लेकिन अगले ही दिन सुबह फिर से उसके घर से मांस की गंध आ रही थी। जब सबने उस व्यक्ति के घर में खिडक़ी से झांका तो दंग रह गया। वह आदमी हाथ में जल लिए सारे मांसाहारी पकवानों पर छिडक़-छिडक़ कर बोल रहा था कि तुम आज से आलू हो, बैगन हो, तुम आज से मांस नहीं हो। जब उससे पूछा गया तो उसने तुरंत जवाब दिया कि जैसे जल छिडक़वा लेने से मेरा धर्म परिवर्तन हो गया है वैसे ही मैं भी इनका धर्म परिवर्तन कर रहा हूं। यह व्यंग्य अपने-आप में ही बहुत सारी बातों को साफ कर देता है। आज के दौर में धर्म परिवत्र्तन केवल और केवल राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने का जरिया भर माना जा सकता है।

धर्म परिवर्तन कराने के लिए पैसे का इस्तेमाल तो आजादी से पहले से भी होता था, परंतु आजादी के बाद और भी बहुत तरह के प्रयोग किए जाने लगे। मिशनरियों ने अपने अनुभवों से पाया कि भारतीय धर्मों के लोग अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं से भावनात्मक तौर पर इतने गहरे जुड़े हैं कि तमाम प्रयासों के बावजूद भारत में करोड़ों की संख्या में धर्म परिवर्तन संभव नहीं हो पा रहा है। इस कठिनाई से पार पाने के लिए नए हथकंडों का प्रयोग शुरू किया गया, जैसे मदर मैरी की गोद में ईसा मसीह की जगह गणेश या कृष्ण को चित्रांकित कर ईसाइयत का प्रचार शुरू किया गया, ताकि यहां के लोगों को लगे कि वे तो हिंदू धर्म के ही किसी संप्रदाय की सभा में जा रहे हैं। भगवा वस्त्र पहने हरिद्वार, ऋषिकेश से लेकर तिरुपति बालाजी तक ईसाई मिशनरियों को धर्म का प्रचार करते देखा जा सकता है। यही हाल पंजाब में है, जहां बड़े पैमाने पर सिखों को ईसाई बनाया जा रहा है। पंजाब में चर्च का दावा है कि प्रदेश में ईसाइयों की संख्या सात से दस प्रतिशत हो चुकी है।

ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार या फिर कहें धर्मान्तरण के प्रति प्रेम देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए बड़ी चुनौतियों को जन्म भी दे रहा है। विकसित पाश्चात्य ईसाई देशों की सरकारें धर्मांध कट्टरपंथी ईसाई मिशनरी तत्वों को धर्म परिवर्तन के नाम पर एशिया और अफ्रीका जैसे देशों को निर्यात करती रहती हैं। इससे दो तरह के फायदे होते हैं। एक तो इन कट्टरपंथी तत्वों का ध्यान गैर ईसाई देशों की तरफ लगा रहता है, जिस कारण वे अपनी सरकारों के लिए कम दिक्कतें पैदा करते हैं और दूसरे, जब भारत जैसे देशों में विदेशी चंदे से धर्मांतरण होता है, तो धर्मांतरित लोगों के जरिये विभिन्न प्रकार की सूचनाएं इक_ा करने और साथ ही सरकारी नीतियों पर प्रभाव डालने में आसानी होती है।

उदाहरण के लिए भारत- रूस के सहयोग से स्थापित कुडनकुलम परमाणु संयंत्र से नाखुश कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को अटकाने के लिए वर्षों तक मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर धरने-प्रदर्शन करवाए। तत्कालीन संप्रग सरकार में मंत्री वी नारायणस्वामी ने यह आरोप लगाया था कि कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को बंद कराने के लिए धरने-प्रदर्शन कराने के लिए तमिलनाडु के एक बिशप को 54 करोड़ रुपये दिए थे। इस मामले में विदेशी चंदा प्राप्त कर रहे चार एनजीओ पर कार्रवाई भी की गई थी।

इसी तरह का मामला वेदांता द्वारा तूतीकोरीन में लगाए गए स्टरलाइट कॉपर प्लांट का है। इस प्लांट को बंद कराने में भी चर्च का हाथ माना जाता है। आठ लाख टन सालाना तांबे का उत्पादन करने में सक्षम यह प्लांट अगर बंद न होता, तो भारत तांबे के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया होता। यह कुछ देशों को पसंद नहीं आ रहा था और इसलिए उन्होंने मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर पादरियों द्वारा यह दुष्प्रचार कराया कि यह प्लांट पूरे शहर की हर चीज को जहरीला बना देगा। इस दुष्प्रचार के बाद हिंसा भडक़ी और पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हो गई। नतीजा यह हुआ कि यह प्लांट बंद कर दिया गया। यह अभी भी बंद है और इसकी वजह से एक लंबे समय के बाद भारत को एक बार फिर तांबे का आयात करना पड़ रहा है।

तमिलनाडु कई कारणों से हिंदुत्व का वह गढ़ है जिसकी हिन्दुओं को सबसे अधिक रक्षा करने की आवश्यकता है, और हिन्दू-विरोधियों की सबसे गिद्ध-दृष्टि भी इस पर है। पहला कारण तो यह कि हिन्दू आध्यात्मिक परम्पराएं अपने विशुद्ध, मूल रूप में दक्षिण भारत में, विशेषत: तमिलनाडु में सर्वाधिक सुरक्षित हैं। उत्तर भारत और उत्तरी दक्षिण भारत में इस्लामी आक्रमण और इस्लाम के राजनीतिक रूप से थोपे जाने से कई हिन्दू परम्पराएं (जैसे वाराह मूर्ति, नरसिंह आदि का पूजन) केवल तमिलनाडु में आज भी जीवंत हैं।

ऐसे में तमिलनाडु में हिन्दू धर्म के खिलाफ बन रहे इस चक्रव्यूह के बारे में अगर राजनीतिक रूप से ज्यादा कुछ न भी हो सके तो कम-से-कम एक सांस्कृतिक वार्तालाप शुरू किए जाने की तत्काल आवश्यकता है। यह धर्म और संस्कृति की भी जरूरत है, और इस देश की राजनीति की भी। और अगर किसी को लगता है कि कृत्रिम रूप से बदली जा रही धार्मिक पहचान अगर इस देश के राजनीतिक भविष्य और स्थिरता को खतरे में नहीं डालेगी, तो यह उनकी ऑस्ट्रिच के समान बालू में सर घुसा लेने के समकक्ष होगा।

 

नीलाभ कृष्ण

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