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दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था

दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था

इतिहास इस बात का गवाह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में बहुत बड़ा बदलाव आया। एक नया वल्र्ड ऑर्डर जिसमें हम सब लोग जी रहे हैं, मैं साफ देख रहा हूं कि कोरोना काल के बाद विश्व एक नए वल्र्ड ऑर्डर की तरफ, नई व्यवस्थाओं की तरफ बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये एक ऐसा टर्निंग प्वाइंट है कि हमें एक भारत के रूप में इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए। मेन टेबल पर भारत की आवाज भी बुलंद रहनी चाहिए। भारत ने एक लीडरशिप रोल के लिए अपने-आप को कम नहीं आंकना चाहिए। और इस परिप्रेक्ष्य में आजादी का अमृत महोत्सव, आजादी के 75 साल अपने-आप में प्रेरक अवसर है। उस प्रेरक अवसर को ले करके, नए संकल्पों को ले करके देश जब आजादी के सौ साल मनाएगा तब तक हम पूरे सामर्थ्य से, पूरी शक्ति से, पूरे समर्पण से, पूरे संकल्प से देश को उस जगह पर ले करके पहुंचेंगे, ये संकल्प का समय है।

बीते वर्षों में देश ने कई क्षेत्रों में मूलभूत व्यवस्था में बहुत मजबूती का अनुभव किया है। और बहुत मजबूती के साथ हम आगे बढ़े हैं। प्रधान मंत्री आवास योजना- गरीबों को रहने के लिए घर हो, ये कार्यक्रम तो लंबे समय से चला है, लेकिन जो गति, जो व्यापकता, विशालता, विविधता, उसने उसमें स्थान पाया है उसके कारण आज गरीब का घर भी लाखों से भी ज्यादा कीमत का बन रहा है। और एक प्रकार से जो भी पक्का घर पाता है, वो गरीब आज लखपति की श्रेणी में भी आ जाता है। कौन हिन्दुस्तानी होगा जिसको इस बात को सुन करके गर्व न हो कि आज देश के गरीब से गरीब के घर में शौचालय बना है, आज खुले में शौच से देश के गांव भी मुक्त हुए हैं, कौन खुश नहीं होगा? मैं बैठने के लिए तैयार हूं। आपको धन्यवाद करके शुरू करूं? बहुत-बहुत धन्यवाद। आपका प्यार अजर-अमर रहे।

आजादी के इतने सालों के बाद गरीब के घर में भी जब रोशनी होती है, तो उसकी खुशियां देश की खुशियों को ताकत देती हैं। चूल्हे के धुंए से जलती हुई आंखों से काम करने वाली मां को, गरीब मां को, और जिस देश में घर में गैस कनेक्शन हो, ये स्टेटस सिंबल बन चुका था, उस देश में गरीब के घर में गैस का कनेक्शन हो, धुएं वाले चूल्हे से मुक्ति हो तो उसका आनंद कुछ और ही होता है।

आज गरीब का बैंक में अपना खाता हो, आज बैंक में जाए बिना गरीब भी अपने टेलीफोन से बैंक के खाते का उपयोग करता हो। सरकार के द्वारा दी गई राशि सीधी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के तहत उसके खाते में पहुंच रही हो, ये सब अगर आप जमीन से जुड़े हुए होते हैं, अगर आप जनता के बीच में रहते होते हैं तो जरूर ये चीजें नजऱ आती हैं, दिखाई देती हैं। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि आप में से बहुत लोग ऐसे हैं जिनके सुई-कांटा 2014 में अटका हुआ है और उससे वो बाहर ही निकल नहीं पाते हैं। और उसका नतीजा क्या आपको भुगतना पड़ा है, आपने जो अपने-आप को एक ऐसी मानसिक अवस्था में बांधकर रखा है; देश की जनता आपको पहचान गई है। कुछ लोग पहले पहचान गए हैं, कुछ लोग देर से पहचान रहे हैं और लोग आने वाले समय में पहचानने वाले हैं। आप देखिए, आप इतना सारा लंबा उपदेश देते हैं तब भूल जाते हैं 50 साल तक कभी आपने भी देश में यहां बैठने का सौभाग्य प्राप्त किया था और क्या कारण है ये आप सोच नहीं पाते हैं।

अब आप देखिए, नागालैंड के लोगों ने आखिरी बार 1998 में कांग्रेस के लिए वोट किया था, करीब 24 साल हो गए। ओडिशा ने 1955 में आपके लिए वोट किया था, सिर्फ 27 साल हो गए आपको वहां एंट्री नही मिली। गोवा में 1994 में पूर्ण बहुमत के साथ आप जीते थे, 28 साल हो गए गोवा ने आपको स्वीकार नहीं किया। पिछली बार 1988 में त्रिपुरा में वहां की जनता ने वोट दिया था, करीब 34 साल पहले त्रिपुरा में। कांग्रेस का हाल है यूपी, बिहार और गुजरात- आखिर में 1985 में, करीब 37 साल पहले आपके लिए वोट किया था। पिछली बार पश्चिम बंगाल ने, वहां के लोगों ने 1972 में करीब 50 साल पहले आपको पसंद किया था। तमिलनाडु के लोगों ने….मैं इसके लिए सहमत हूं, अगर आप उस मर्यादा का पालन करते हैं और इस जगह का उपयोग न करते हों, बड़ा दुर्भाग्य है देश का कि सदन जैसी जगह देश के लिए काम आनी चाहिए, उसको दल के लिए काम में लेने का जो प्रयास हो रहा है और उसके कारण जवाब देना हमारी मजबूरी बन जाती है।

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तमिलनाडु- आखिर में 1962 में यानी करीब 60 साल पहले आपको मौका मिला था। तेलंगना बनाने का श्रेय लेते हैं लेकिन तेलंगना बनने के बाद भी वहां की जनता ने आपको स्वीकार नहीं किया। झारखंड का जन्म हुआ, 20 साल हो गए, पूर्ण रूप से कांग्रेस को स्वीकार नहीं किया, पिछले दरवाजे से घुसने का प्रयास करते हैं।

सवाल चुनाव नतीजों का नहीं है। सवाल उन लोगों की नीयत का है, उनकी नेकदिली का है। इतने बड़े लोकतंत्र में इतने साल तक शासन में रहने के बाद देश की जनता हमेशा-हमेशा के लिए उनको क्यों नकार रही है? और जहां भी ठीक से लोगों ने राह पकड़ ली, दोबारा आपको प्रवेश करने नहीं दिया है। इतना सारा होने के बावजूद भी..हम तो एक चुनाव हार जाएं ना, महीनों तक न जाने इकोसिस्टम क्या-क्या करती है। इतना सारा पराजय होने के बावजूद भी न आपका अहंकार जाता है न आपकी इकोसिस्टम आपके अहंकार को जाने देती है। इस बार अभिनंदन जी बहुत सारे शेर सुना रहे थे..चलिए मौका मैं भी ले लूं- और जब अहंकार की बात मैं कर रहा हूं, तब तो उनको कहना ही पड़ेगा- वो जब दिन को रात कहें तो तुरंत मान जाओ, नहीं मानोगे तो दिन में नकाब ओढ़ लेंगे। जरूरत हुई तो हकीकत को थोड़ा-बहुत मरोड़ लेंगे।

वो मगरूर है खुद की समझ पर बेइन्तिहा, उन्हें आईना मत दिखाओ। वो आईने को भी तोड़ देंगे।

आजादी का अमृत महोत्सव, आजादी के 75 वर्ष में आज देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और देश अमृतकाल में प्रवेश कर रहा है। आजादी की इस लड़ाई में जिन-जिन लोगों ने योगदान किया है वो किसी दल के थे या नहीं थेज्इन सबसे परे उठ करके देश के लिए जीने-मरने वाले लोग, देश के लिए जवानी खपाने वाले लोग, तो हर किसी को स्मरण करने का, पुन: स्मरण करने का अवसर है और उनके सपनों को याद करते हुए कुछ संकल्प लेने का अवसर है।

हम सब संस्कार से, स्वभाव से, व्यवस्था से लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध लोग हैं और आज से नहीं, सदियों से हैं। लेकिन ये भी सही है कि आलोचना जीवंत लोकतंत्र का एक आभूषण है, लेकिन अंधविरोध, ये लोकतंत्र का अनादर है। सत्ता प्रयास, इस भावना से भारत ने जो कुछ हासिल किया है, अच्छा होता उसे खुले मन से स्वीकार किया गया होता, उसका स्वागत किया गया होता। उसका गौरव-गान करते।

बीते दो सालों में सौ साल का सबसे बड़ा वैश्विक महामारी का संकट पूरी दुनिया की मानव जाति झेल रही है। जिन्होंने भारत के अतीत के आधार पर ही भारत को समझने का प्रयास किया, उनको तो आशंका थी इतना बड़ा विशाल देश, इतनी बड़ी आबादी, इतनी विविधता, ये आदतें, ये स्वभाव…शायद ये भारत इतनी बड़ी लड़ाई नहीं लड़ पाएगा। भारत अपने-आपको बचा नहीं पाएगा…यही उनकी सोच थी। लेकिन आज स्थिति क्या है… मेड इंडिया कोवैक्सीन, कोविड टीके दुनिया में सबसे प्रभावी हैं। आज भारत शत-प्रतिशत पहली डोज, इस लक्ष्य के निकट करीब-करीब पहुंच रहा है। और लगभग 80 प्रतिशत सेंकेंड डोज- उसका पड़ाव भी पूरा कर लिया है।

कोरोना एक वैश्विक महामारी थी, लेकिन उसे भी दलगत राजनीति के लिए उपयोग में लाया जा रहा है, क्या ये मानवता के लिए अच्छा है? इस कोरोना काल में कांग्रेस ने तो हद कर दी

पहली लहर के दौरान देश जब लॉकडाउन का पालन कर रहा था जब विश्व स्वास्थ्य संगठन दुनियाभर के लोगों को सलाह देता था, सारे हेल्थ एक्सपर्ट कह रहे थे कि जो जहां है वहीं पर रुके, सारी दुनिया में ये संदेश दिया जाता था, क्योंकि मनुष्य जहां जाएगा अगर वो कोरोना से संक्रमित है तो कोरोना साथ ले जाएगा। तब, कांग्रेस के लोगों ने क्या किया, मुंबई के रेलवे स्टेशन पर खड़े रह करके, मुंबई छोडक़र जाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मुंबई में श्रमिकों को टिकट दिया गया, मुफ्त में टिकट दिया गया, लोगों को प्रेरित किया गया कि जाओ। महाराष्ट्र में हमारे पर जो बोझ है वो जरा कम हो, और जाओ तुम उत्तर प्रदेश के हो, तुम बिहार के हो। जाओ, वहां कोरोना फैलाओ। आपने ये बहुत बड़ा पाप किया है। महा अफरा-तफरी का माहौल खड़ा कर दिया। आपने हमारे श्रमिक भाइयों-बहनों को अनेक परेशानियों में धकेल दिया।

उस समय दिल्ली में ऐसी सरकार थी, जो है। उस सरकार ने तो जीप पर माईक बांध करके, दिल्ली की झुग्गी-झोंपड़ी में गाड़ी घुमा करके लोगों को कहा, संकट बड़ा है भागो, गांव जाओ, घर जाओ। और दिल्ली से जाने के लिए बसें दीं…आधे रास्ते छोड़ दिया और सभी लोगों के लिए अनेक मुश्किलें पैदा कीं। और उसका कारण हुआ कि यूपी में, उत्तराखंड में, पंजाब में जिस कोरोना की इतनी गति नहीं थी, इतनी तीव्रता नहीं थी, इस पाप के कारण कोरोना ने वहां भी अपनी लपेट में ले लिया। ये कैसी राजनीति है। मानव जाति पर संकट के समय ये कैसी राजनीति है? ये दलगत राजनीति कब तक चलेगी?

कांग्रेस के इस आचरण से सिर्फ मैं ही नहीं, पूरा देश अचंभित है। दो साल से देश सौ साल के सबसे बड़े संकट से मुकाबला कर रहा है। कुछ लोगों ने जिस प्रकार का व्यवहार किया देश जिससे इस सोच में पड़ गया है। क्या ये देश आपका नहीं है? क्या ये देश के लोग आपके नहीं हैं? क्या उनके सुख-दुख आपके नहीं हैं? इतना बड़ा संकट आया, कई राजनीतिक दल के नेता, जरा आप निरीक्षण करें, कितने राजनीतिक दल के नेता जो जनता के माने हुए नेता अपने-आपको मानते हैं, उन्होंने लोगों को रिक्वेस्ट की हो, अपील की हो…भई, कोरोना का एक ऐसा संकट है, वैश्विक महामारी है…आप मास्क पहनो, हाथ धोना रखो, दो गज की दूरी रखो। कितने नेता हैं…क्या ये बार-बार देश की जनता को अगर कहते तो उसमें बीजेपी की सरकार को क्या फायदा होने वाला था। मोदी को क् या फायदा होने वाला था। लेकिन इतने बड़े संकट में भी इतना सा पवित्र काम करने से भी चूक गए।

कुछ लोग हैं उनको ये इंतजार था कि कोरोना वायरस मोदी की छवि को चपेट में ले लेगा। बहुत इंतजार किया और कोरोना ने भी आपके धैर्य की बड़ी परीक्षा ली है। आए दिन आप लोग औरों को नीचा दिखाने के लिए महात्मा गांधी का नाम लेते हैं। महात्मा गांधी की स्वदेशी की बात इसको बार-बार दोहराने में हमें कौन रोकता है। अगर मोदी ‘वोकल फॉर लोकल’ कहता है, मोदी ने कहा इसलिए शब्दों को छोड़ दो भाई। लेकिन क्या आप नहीं चाहते हैं देश आत्मनिर्भर बने? जिस महात्मा गांधी के आदर्शों की बात करते हैं, तब भारत में इस अभियान को ताकत देने में, जुडऩे में आपका क्या जाता है? उसका नेतृत्व आप लीजिए। महात्मा गांधी जी के स्वदेशी के निर्णय को बढ़ाइए, देश का भला होगा। और हो सकता है आप महात्मा गांधी के सपनों को सच होते देखना नहीं चाहते हैं।

आज पूरी दुनिया योग के लिए, एक प्रकार से कोरोना में तो योग ने दुनियाभर में जगह बना ली। दुनियाभर में कौन हिन्दुस्तानी होगा जिसको योग के लिए गर्व न हो। आपने उसका भी मजाक उड़ाया, उसका भी विरोध किया। अच्छा होता आप लोगों को कहते, भई, संकट में घर में हैं, योगा कीजिए, आपको फायदा होगा…क्या नुकसान था। ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ चले, देश का नौजवान सशक्त हो, सामर्थ्यवान हो, आपको मोदी से विरोध हो सकता है…‘फिट इंडिया मूवमेंट’ आपके राजनीतिक दलों के छोटे-छोटे मंच होते हैं। अगर हम सबने मिल करके अगर ‘फिट इंडिया’ के द्वारा देश की युवा शक्ति को इस सामर्थ्य की तरफ आगे बढऩे के लिए कहते, लेकिन उसका भी विरोध, उसका भी उपहास। यानी क्या हो गया है आपको, मुझे समझ नहीं आ रहा है और इसलिए मैं आज इसलिए कहता हूं कि आपको ध्यान में आए कि आप कहां खड़े हैं। और मैंने इतिहास बताया, 60 साल से लेकर 15 साल तक, पूरा कालखंड, इतने राज्य, कोई आपको घुसने नहीं दे रहा है।

कभी-कभी मैं…ये विशेष बहुत प्यार से कह रहा हूं, नाराज मत हो जाना। मुझे कभी-कभी माननीय अध्यक्ष जी, एक विचार आता है…डनके बयानों से, उनके कार्यक्रमों से, उनकी करतूतों से…जिस प्रकार से आप बोलते हैं, जिस प्रकार से मुद्दों से जुड़ते हैं, ऐसा लगता है कि आपने मन बना लिया है कि सौ साल तक सत्ता में नहीं आना है। ऐसा नहीं करना जी, थोड़ी सी भी आशा होती, थोड़ा सा भी लगता कि हां देश की जनता फिर से फूलहार करेगी तो ऐसा नहीं करते जी। और इसलिए…खैर अब आपने ही तय कर लिया है 100 साल के लिए तो फिर मैंने भी तैयार कर लिया।

सदन इस बात का साक्षी है कि कोरोना वैश्विक महामारी से जो स्थितियां उत्पन्न हुईं, उसको निपटने के लिए भारत ने जो भी रणनीति बनाई, उसको ले करके डे वन से क्या-क्या नहीं कहा गया। किस-किसने क्या बोला, आज वो खुद देखेंगे तो उनको हैरानी हो जाएगी ऐसा कैसे बुलवा लिया, किसने बुलवा लिया। पता नहीं क्या बोल दिए हम लोग। दुनिया के और लोगों से बड़ी-बडी कांफ्रेंस करके ऐसी बातें बुलवाई गईं ताकि पूरे विश्व में भारत बदनाम हो। खुद को टिके रहने के लिए, आर्थिक आयोजन को भारत कैसे चल रहा है, माई गॉड क्या कुछ कहा गया। बड़े-बड़े पंडितों ने देखा था, पूरी आपकी इकोसिस्टम लग गई थी। हम जो भी समझते थे, भगवान ने जो भी समझ दी थी, लेकिन समझ से ज्यादा समर्पण बहुत बड़ा था जी। और जहां समझ से समर्पण ज्यादा होता है वहां देश और दुनिया को अर्पण करने की ताकत भी होती है। और वो हमने करके दिखाया है। और जिस रास्ते पर हम चले आज विश्व के अर्थ जगत के सभी ज्ञेता इस बात को मानते हैं भारत ने जिस आर्थिक नीतियों को लेकर इस कोरोना कालखंड में अपने-आपको आगे बढ़ाया वो अपने-आप में उदाहरणीय है। और अनुभव भी हम करते हैं, हमने देखा है। भारत आज दुनिया की जो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं उसमें सबसे तेजी से विकसित हो रही बड़ी अर्थव्यवस्था है।

इस कोरोना कालखंड में भी हमारे किसानों ने रिकॉर्ड पैदावार की, सरकार ने रिकॉर्ड खरीदी की। दुनिया के अनेक देशों में जहां खाने का संकट पैदा हुआ हो और आपको पता होगा सौ साल पहले जो आपदा आई थी, उसकी जो रिपोर्ट है, उसमें ये बात कही गई है कि बीमारी से मरने वालों की जैसी तादाद है वैसे ही भूख से मरने वालों की भी बड़ी तादाद है, उस समय की सौ साल पहले की रिपोर्ट में है। इस देश ने किसी को भूख से मरने नहीं दिया। 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया और आज भी करा रहे हैं।

हमारा टोटल एक्सपोर्ट हिस्टोरिकल हाईयेस्ट लेवल पर है। और ये कोरोना काल में है। कृषि एक्सपोर्ट ऐतिहासिक चीजों पर टॉप पर पहुंचा है। सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट नयी ऊंचाई की तरफ बढ़ रहा है। मोबाइल फोन एक्सपोर्ट, अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। डिफेंस एक्सपोर्ट, कईयों को परेशानी हो रही है। ये आत्मनिर्भर भारत का कमाल है कि आज देश डिफेंस एक्सपोर्ट में भी अपनी पहचान बना रहा है। एफडीआई और एफडीआई

सदन में थोड़ी बहुत टोका-टोकी तो आवश्यक होती है जरा गर्मी रहती है। लेकिन जब सीमा के बाहर भाग जाता है तो जरा लगता है कि हमारे साथी ऐसे हैं।

इनकी पार्टी के एक एमपी ने चर्चा की शुरुआत की थी और यहां से कुछ छोटा-मोटा नोक-झोंक चल रहा था। और मैं मेरे कमरे से स्क्रीन पर देख रहा था कि हमारे मंत्री पीछे गए, सबको रोका और वहां से चैलेंज आई कि अगर हमारे एक हो गए तो तुम्हारे नेता का ये हाल करेंगे। क्या इसी कारण ये हो रहा है क्या?

आप, आपने, आपको अब हर एक को अपना सीआर सुधारने की कोशिश तो करनी चाहिए। अब मैं मानता हूं कि जितना किया है उससे आपका सीआर ठीक हो गया है। जिन लोगों को रजिस्टर करना है आपके इस पराक्रम को कर लिया है जी, ज्यादा क्यों कर रहे हो? इस सत्र में से कोई आपको नहीं निकालेगा, विश्वास करो? इस सत्र में आपको कोई निकालने का नहीं, मैं आपको गारंटी देता हूं। इस जगह से अरे भई ऐसे ही बच गए हो।

एफडीआई और एफडीआई का रिकॉर्ड निवेश आज भारत में हो रहा है। रिन्यूएबल इनर्जी के क्षेत्र में आज हिन्दुस्तान दुनिया के टॉप फाइव कंट्रीज में है।

ये सब इसलिए संभव हुआ है कि कोरोना काल में इतना बड़ा संकट सामने होने के बावजूद, अपने कर्तव्यों को निभाते हुए, इस संकट के काल में देश को बचाना है तो रिफार्म जरूरी थीं। और हमने वो जो रिफार्म किये, उसके परिणाम है कि आज हम इस तरीके से इस स्थिति पर आ कर के पहुंचे हैं।

एमएसएमीज सहित हर उद्योग को जरूरी सपोर्ट दी। नियमों को, प्रक्रियाओं को सरल किया। आत्मनिर्भर भारत का जो मिशन है उसको हमने ये चरितार्थ करने के लिए भरपूर कोशिश की। ये सारी उपलब्धियां ऐसे हालात में देश ने हासिल की हैं जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, आर्थिक जगत में बहुत बड़ी उथल-पुथल आज भी चल रही है। सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है। लॉजीस्टीक में संकट पैदा हुए। दुनिया में सप्लाई चेन की वजह से केमिकल फर्टिलाइजर पर कितना बड़ा संकट आया है और भारत आयात करने पर डिपेन्डेंट है। कितना बड़ा आर्थिक बोझ देश पर आया है। पूरी विश्व में हालात पैदा हुए लेकिन भारत ने किसानों को इस पीड़ा को झेलने के लिए मजबूर नहीं किया। भारत ने, सारा बोझ देश ने अपने कंधों पर उठाया और किसान को ट्रांसफर नहीं होने दिया है। भारत ने फर्टिलाइजर की सप्लाई को भी निरंतर जारी रखा है। कोरोना के संकट काल में भारत ने अपनी खेती को अपने छोटे किसानों को संकट से बाहर निकालने के लिए बड़े फैसले लिये। मैं कभी-कभी सोचता हूं, जो लोग जड़ों से कटे हुए लोग हैं, दो-दो चार-चार पीढ़ी से महलों में बैठने की आदत हो गई है, वो देश के छोटे किसानों की क्या समस्या है, वो समझ ही नहीं पाए हैं। उनके अगल-बगल में जिन किसानों की उनकी पहुंच थी, उससे आगे देख नहीं पाए हैं। और कभी ऐसे लोगों को पूछना चाहता हूं कि छोटे किसानों की प्रति आपकी इतनी नफरत क्यों है? क्या आप छोटे किसानों के कल्याण के लिये, आप रोड़े अटकाते रहते हो। छोटे किसानों को इस संकट में डालते हो।

अगर गरीबी से मुक्ति चाहिए तो हमें हमारे छोटे किसानों को मजबूत बनाना होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है, तो हमारे छोटे किसानों को मजबूत बनाना होगा। अगर हमारा छोटा किसान मजबूत होता है, छोटी सी जमीन होगी दो हेक्टेयर की भूमि होती तो भी उसकी आधुनिक करने का वो प्रयास करेगा, नया सीखने का प्रयास करेगा और उसकी ताकत आएगी तो देश की अर्थ रचना को भी ताकत मिलेगी। और इसलिए आधुनिकता के लिये छोटे किसानों की तरफ ध्यान देने का मेरा प्रयास है। लेकिन छोटे किसानों के प्रति जिन लोगों के मन में नफरत है, जिन्होंने छोटे किसानों को दुख-दर्द नहीं जाना है, उनको किसानों के नाम पर अपनी राजनीति करने का कोई हक नहीं बनता है।

इस बात को हमें समझना होगा 100 करोड़ वर्षों का गुलामी कालखंड उसकी जो मानसिकता है, वो आजादी के 75 साल के बाद भी कुछ लोग बदल नहीं पाए हैं। वो गुलामी की मानसिकता किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिये बहुत बड़ा संकट होती है।

आज देश का मैं एक चित्र देखता हूं। एक ऐसा समुदाय, एक ऐसा वर्ग है आज भी वो गुलामी की वो मानसिकता में जीता है। आज भी 19वीं सदी के काम उस सोच, उनसे वो जकड़ा हुआ है और 20वीं सदी के जो कानून हैं वहीं कानून उसको कानून लगते हैं।

गुलामी की मानसिकता, इन 19वीं सदी का रहन-सहन, 20वीं सदी के कानून, 21वीं सदी की आकांक्षाएं पूरी नहीं कर सकते। 21वीं सदी के अनुकूल हमें बदलाव बहुत जरूरी है।

जिस बदलाव को हमने अस्वीकार किया उसका परिणाम क्या आया? फ्राइट कॉरीडोर इतने मनोमन चंद के बाद, कई वर्षों तक, उसके बाद योजना हुई। 2006 में प्लानिंग, 2006 से 2014 तक का उसका हाल देखिए। 2014 के बाद उसकी तेजी आई। यूपी में सरयू नहर परियोजना, 70 के दशक में शुरू हुई और उसकी लागत 100 गुना बढ़ गई। हमारे आने के बाद हमने उस काम को पूरा किया। ये कैसी सोच है? यूपी का अर्जुन डैम परियोजना 2009 में शुरू हुई। 2017 तक एक-तिहाई खर्चा हुआ। हमने इतने कम समय में इसको पूरा कर दिया। अगर कांग्रेस के पास इतनी सत्ता थी, इतने सालों तक सत्ता थी तो चार धाम को ऑल वेदर सडक़ों में परिवर्तित कर सकती थी, जोड़ सकते थे लेकिन नहीं किया। वॉटरवे, सारी दुनिया वॉटरवे को समझती है, हमारा ही एक देश था कि हमने वॉटरवे को नकार दिया। आज हमारी सरकार को वॉटरवे पर काम चल रहा है। पुरानी अप्रोच से गोरखपुर का कारखाना बंद होता था, हमारी अप्रोच से गोरखपुर का फर्टिलाइजर का कारखाना शुरू हुआ है।

ये लोग ऐसे हैं जो जमीन से कटे हुए हैं जिसके कारण उनके लिये फाईल की मूवमेंट, फाईल में सिग्नेचर कर दिये, कौन है, क्या मुलाकात के लिये आएगा उसी के इंतजार में वो रहते हैं। आपके लिये फाईल सब कुछ है, हमारे लिये 130 करोड़ देशवासियों का लाभ महत्वपूर्ण है। आप फाईल में खोए रहे, हम लाईफ बदलने के लिऐ जी-जान से जुटे हुए हैं। आज उसी का परिणाम है प्रधानमंत्री गति शक्ति मास्टर प्लान एक हॉलीस्टीक एप्रोच, टुकड़ों में नहीं, एक आधा काम वहां आ रहा है, रोड बन रहा है फिर बिजली वाला आकर के खुदाई करता है। वो चीज ठीक होता है फिर पानी वाला आकर के खुदाई करता है। उस सारी समस्याओं से बाहर आकर के हमने डिस्ट्रिक लेवल तक गति शक्ति मास्टर प्लान की दिशा में हम काम कर रहे हैं। उसी प्रकार से हमारा देश की विशेषता को देखते हुए मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट सिस्टम, उस पर हम बड़ा जोर दे रहे हैं और कनेक्टिवीटी पर इसके आधार पर हम जोर दे रहे हैं। आजादी के बाद सबसे तेज गति से ग्रामीण सडक़े कहीं बन रहीं हैं तो वो इस पांच साल के कालखंड में बनी हैं।

नेशनल हाईवे बन रहे हैं। रेलवे लाईनों का बिजलीकरण हो रहा है। आज देश नए एयरपोर्ट और हेलीपोर्टस का नेटवर्क खड़ा कर रहा है। देश के 6 लाख से अधिक गांव में ऑप्टीकल फाइबर नेटवर्क का काम चल रहा है।

ये सारे काम ऐसे हैं, जो रोजगार देते हैं। ज्यादा से ज्यादा रोजगार इन्हीं कामों से मिलता है। आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज देश की आवश्यकता है और अभूतपूर्व निवेश भी हो रहा है और उसी से रोजगार भी बन रहा है, विकास भी बन रहा है और विकास की गति भी बन रहा है। और इसलिए आज देश उस दिशा में काम कर रहा है।

जितनी ज्यादा अर्थव्यवस्था ग्रो करेगी, उतने ही रोजगार के अवसर पैदा होंगे। और इसी लक्ष्य को लेकर के पिछले सात साल से हमने इन चीजों पर फोकस किया है। और उसका परिणाम है हमारा आत्मनिर्भर भारत अभियान। मैन्युफैक्चरिंग हो या सर्विस सेक्टर हो, हर सेक्टर में हमारा उत्पाद बढ़ रहा है, उत्पादन बढ़ रहा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के द्वारा हम आज ग्लोबल वैल्यू चैन का हिस्सा बन रहे हैं। ये अपने आप में भारत के लिये एक अच्छी निशानी है। हमारा बड़ा फोकस एमएसएमीज और टेक्सटाइल जैसे लेबर सेक्टर में है। एमएसएमीज की बड़ी व्यवस्था में सुधार, एमएसएमीज की परिभाषा में हमने सुधार करके उसको भी नए अवसर दिये हैं। अपने छोटे उद्योगों को सुरक्षित करने के लिये एमएसएमीज के लिए सरकार ने इस कोरोना के विकट कालखंड में तीन लाख करोड़ रुपये की विशेष योजना भी शुरू की है और उसका लाभ हमारा एमएसएमीज सेक्टर को मिला है। और इसका बहुत बढिय़ा स्टडी एसबीआई ने किया है। एसबीआई का स्टडी कहता है कि साढ़े तेरह लाख एमएसएमीज इस योजना के कारण बर्बाद होने से बच गए हैं और एसबीआई का स्टडी कहता है डेढ़ करोड़ नौकरियां बची हैं और करीब 14 प्रतिशत एमएसएमीज लोन के कारण एनपीए होने की जो संभावना थी, उससे बच गए हैं।

जो सदस्य जमीन पर जाते हैं, वो इसको प्रभाव को देख सकते हैं। विपक्ष के भी कई साथी मुझे भेजते हैं, कहते हैं कि साहब ये योजना ने बहुत बड़ा लाभ किया है। एमएसएमीज सेक्टर को इस संकट की घड़ी में बहुत बड़ा सहारा दिया है।

उसी प्रकार से मुद्रा योजना कितनी सफल रही है, हमारी माताएं-बहनें कितनी इस क्षेत्र में आई हैं। लाखों लोग बिना गारंटी बैंक से लोन लेकर के आज अपना स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़े हैं और खुद तो करते हैं, एक-आद दो लोगों को रोजगार भी देते हैं। स्वनिधी योजना, स्ट्रीट वेंडर्स कभी हमने सोचा नहीं, पहली बार आजादी के बाद स्ट्रीट वेंडर्स को बैंक के अंदर से लोन मिल रहा है और आज स्ट्रीट वेंडर्स डिजिटल ट्रांजेक्शन कर रहे हैं और करोड़ों श्रमिकों को लाभ मिल रहा है। हमने गरीब श्रमिकों के लिये दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किये हैं। आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना के तहत हजारों लाभार्थियों के खातों में हमने सीधा पैसे ट्रांस्फर किये हैं।

इंडस्ट्री को गति देने के लिये बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की बहुत जरूरत होती है। पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान ये हमारे लॉजिस्टिक कॉस्ट को बहुत कम कर देगा। और इसके कारण देश में भी माल सस्ते में पहुंच पाएगा और एक्सपोर्ट करने वाले लोग भी दुनिया के साथ कॉम्पिटिशन कर पाएंगे। और इसलिये पीएम गति शक्ति प्लान आगे आने वाले दिनों में बहुत लाभकारक होने वाला है।

सरकार ने एक और बहुत बड़ा काम किया है, नये क्षेत्रों को, इंटरप्रेन्योर को उसके लिये हमने ओपन कर दिया है। आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत स्पेस, डिफेंस, ड्रोंस, माइनिंग को प्राइवेट सेक्टर को आज देश के विकास में भागीदार बनने के लिये हमने निमंत्रित किया है। देश में इंटरप्रेन्योर के लिये बेहतर माहौल बनाने के लिये सिम्पल टैक्स सिस्टम की शुरुआत हजारों कम्पलाइंसिस, हमारे देश में आधा देश तो हर डिपार्टमेंट, ये लाओ वो लाओ, ये कागज लाओ वो लाओ, वो सारा करीब 25 हजार कम्पलाइंसिस हमने खत्म किये हैं। आज मैं तो राज्य से भी आग्रह करूंगा कि वे भी ढूंढ-ढूंढ करके ऐसे कम्पलाइंसिस खत्म करें। देश के नागरिकों को परेशानी हो रही है, उसको समझिये आप लोग। आज देश में इस प्रकार के बैरियर्स हटाये जा रहे हैं। डोमेस्टिक इंडस्ट्री को लेवल देने के लिये एक के बाद एक कदम हम उठाते जा रहे हैं।

आज देश उस पुरानी अवधारणा से बाहर निकल रहा है, हमारे देश में ये सोच बन गई है कि सरकार ही भाग्य विधाता है, तुम्हें सरकार पर ही निर्भर रहना पड़ेगा, तुम्हारी आशा-आकांक्षाओं को कोई पूरा नहीं कर सकता है, सरकार ही करेंगी, सब कुछ सरकार ही देगी। ये हम लोग इतना इगो पाल करके रखा था और इसके कारण देश के सामर्थ्य को भी चोट पहुंची है। और इसलिये सामान्य युवा के सपने, युवा कौशल, उसके रास्ते, हमने नए सिरे से सोचना शुरू किया। सब कुछ सरकार करती है, ऐसा नहीं है। देशवासियों की ताकत अनेक गुना ज्यादा होती है। वो सामर्थ्य के साथ अगर संकट के साथ जुड़ जाते हैं, तो परिणाम मिलता है। आप देखिये 2014 के पहले, हमारे देश में सिर्फ 500 स्टार्ट अप थे, जब अवसर दिया जाता है देश के नौजवानों को तो क्या परिणाम आता है, इन सात साल में 2014 के पहले 500 स्टार्ट अप, इस सात साल में 7000 स्टार्ट अप इस देश में काम कर रहे हैं। ये मेरे देश के युवाओं की ताकत है। और इसमें यूनिकॉर्न बन रहे हैं और एक-एक यूनिकॉर्न यानी हजारों करोड़ की उसकी वैल्यू तय हो जाती है।

और बहुत ही कम समय में भारत के यूनिकॉर्न सेंचुरी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, ये बहुत बड़ा है। हजारों करोड़ की कंपनी बनने में पहले दशकों लग जाते थे। आज हमारे नौजवानों की ताकत है, सरकार की नीतियों के कारण साल दो साल के अंदर हजारों करोड़ को, कारोबार को उनके आस-पास वो देख पा रहे हैं।

हम स्टार्ट अपस यूनिकॉर्नस में इस मामले में, दुनिया में टॉप 3 में पहुंच गए हैं। कौन हिन्दुस्तानी होगा जिसको गर्व नहीं होगा? लेकिन ऐसे समय इस सरकार का अंतर्विरोध करने की इनको आदत लग गई है। सुबह-सुबह शुरू हो जाते हैं और यहां मैंने देखा हमारे आदरणीय जी बता रहे थे, क्या तुम मोदी, मोदी, मोदी, मोदी करते रहते हो, हां यही कह रहे थे ना! और सब लोग मोदी, मोदी, मोदी बोल रहे हैं, आप भी बोल रहे हैं। आप लोग सुबह होते ही शुरू हो जाते हैं। एक पल आप लोग पल मोदी के बगैर नहीं बिता सकते। अरे मोदी तो आपकी प्राणशक्ति है।

कुछ लोग देश के नौजवानों को, देश के इंटरप्रेन्योर को, देश के बेस्ट क्रियेटर्स को उनको डराने आनंद आता है। उनको भयभीत करने में भी आनंद आ जाता है। उनको पूर्वाग्रह करने में आनंद आता है। देश का नौजवान उनकी बातें सुन नहीं रहा है, इसके कारण देश आगे बढ़ रहा है।

आज जो यूनिकॉर्न हैं, यही उसमें से कुछ मल्टीनेशनल कंपनियां बनने का सामर्थ्य रखती है। लेकिन कांग्रेस में ऐसे लोग बैठे हैं जो कहते हैं जो हमारे उद्यमी हैं उनके लिये कहते हैं और आपको भी जानकर के आश्चर्य होगा, क्या कहते हैं, वो कहते हैं ये उद्यमी लोग कोरोना वायरस का वेरिएंट बताइए क्या हो गया है? हमारे देश के उद्योग ये कोरोना वायरस के वेरिएंट हैं क्या? हम क्या बोल रहे हैं, किसके लिये बोल रहे हैं? कोई जरा आपके अंदर बैठे तो जरा बोलो तो सही ये क्या हो रहा है? पार्टी का नुकसान हो रहा है, कांग्रेस पार्टी का नुकसान हो रहा है।

जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते हैं, वो इतिहास में खो जाते हैं।

ये मैं इसलिये कह रहा हूं, जरा 60 से 80 दशक का, उनके सभी प्रमुख लोग उसमें आ जाते हैं जो देश का नेतृत्व करते थे उस कालखंड की बात कर रहा हूं। 60 से 80 के दशक में कांग्रेस ही होता था, कांग्रेस के ही                     सत्ता साथी कांग्रेस के साथ रहकर के सुख भोगने वाले लोग ये वही लोग पंडित नेहरू जी की सरकार को और श्रीमती इंदिरा गांधी जी की सरकार को क्या कहते थे, ये तो टाटा-बिरला की सरकार है, ये सरकार को तो टाटा-बिरला चला रहे हैं। 60 से 80 दशक तक यही बातें बोली जाती थी, नेहरू जी के लिये बोली जाती थी, इंदिरा जी के लिये बोली जाती थी। और आपने उनके साथ भागीदारी की सत्ता में लेकिन उनकी आदतें भी ले ली। आप भी उसी भाषा को बोल रहे हो। मैं देख रहा हूं, आप इतने नीचे गए हो, इतने नीचे गए हो, हां मुझे लगता है कि आज पंचिंग बैग बदल गया है लेकिन आपकी आदत नहीं बदली है। मुझे विश्वास है कि यही लोग सदन में कहने की हिम्मत रखते थे, बाहर तो बोलते ही थे, जहां मौका मिले चुप नहीं रहते थे। वो कहते हैं मेक इन इंडिया हो ही नहीं सकता बट अब उसमें आनंद आ रहा है। कोई ऐसा हिन्दुस्तान के लिये सोच सकता है क्या? कि मेक इन इंडिया हो ही नहीं सकता। अरे भई, आपको तकलीफ होती थी हम आकर के करेंगे, ठीक है ऐसा बोलो। देश को क्यों गाली देते हो। देश के खिलाफ क्यों बोलते हो? मेक इन इंडिया हो नहीं सकता। मेक इन इंडिया का मजाक उड़ाया गया। और आज देश की युवा शक्ति ने, देश के इंटरप्रेन्योर ने करके दिखाया है, आप मजाक का विषय बन गये हो। और मेक इन इंडिया की सफलता आप लोगों को कितना दर्द दे रही है, ये मैं भली-भांति समझ पा रहा हूं।

मेक इन इंडिया से कुछ लोग को तकलीफ इसलिए है क्योंकि मेक इन इंडिया का मतलब है कमीशन के रास्ते बंद, मेक इन इंडिया का मतलब है भ्रष्टाचार के रास्ते बंद, मेक इन इंडिया का मतलब है तिजोरी भरने के रास्ते बंद। और इसलिए मेक इन इंडिया का ही विरोध करो। भारत के लोगों को सामर्थ्य का नजरअंदाज करने का पाप देश के लघु उद्यमियों के सामर्थ्य का अपमान, देश के युवाओं का अपमान, देश की इनोवेटिव क्षमता का अपमान।

देश के इस प्रकार का नकारात्मकता का, निराशा का वातावरण, खुद निराश हैं, खुद सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए देश को असफल करने के लिये जो खेल चल रहे हैं, उसके खिलाफ देश का नौजवान बहुत जाग चुका है, जागरूक हो चुका है।

पहले जो सरकार चलाते थे जिन्होंने 50 साल तक देश की सरकारें चलाई। मेक इन इंडिया को लेकर उनका क्या विवेक था, सिर्फ डिफेंस सेक्टर को हम देखें तो सारी बातें समझ आती थी कि वो क्या करते थे, कैसे करते थे, क्यों करते थी और किसके लिए करते थे। पहले सालों में क्या होता था नए इक्यूपमेंट खरीदने के लिए प्रोसेस चलती थी। सालों तक चलती थी। और जब फाइनल निर्णय होता था तो वो चीज पुरानी हो जाती थी। अब बताइए, देश का क्या भला? आउटडेटेड हो जाती थी और हम पैसे देते थे। हमने इन सारी प्रोसेस को सिंपलीफाई किया। सालों से पेंडिंग डिफेंस सेक्टर के जो इशू थे, उसको हमने निपटाने का प्रयास किया। पहले किसी भी आधुनिक प्लेटफार्म या इक्यूपमेंट के लिए हमें दूसरे देशों की तरफ देखना पड़ता था। जरूरत के समय आपाधापी में खरीदा जाता था, ये लाओ वो लाओ! कौन पूछता है भई, हो गया! यहां तक कि स्पेयर पार्टस के लिए भी हम अन्य देशों पर निर्भर रहे हैं। दूसरों पर निर्भर होकर इस देश की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं। हमारे पास यूनिक व्यवस्था होनी चाहिए, हमारी अपनी व्यवस्था होनी चाहिए। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना, ये राष्ट्र सेवा का भी एक बहुत बड़ा काम है और आज मैं देश के नौजवानों को भी आह्वान करता हूं कि आप अपने कैरियर में इस क्षेत्र को चुनिए। हम ताकत के साथ खड़े होंगे।

इस बजट में भी हमने ज्यादा से ज्यादा रक्षा उपकरण भारत में ही बनाएंगे। भारतीय कंपनियों से ही खरीदेंगे, ये बजट में प्रावधान किया है। बाहर से लाने के रास्ते बंद करने की दिशा में हमने किया है। हमारी सेनाओं की जरूरत पूरी होने के अलावा हम एक बड़े डिफेंस एक्सपर्ट भी बनने का सपना लेकर के चल रहे हैं और मुझे विश्वास है ये संकल्प पूरा होगा। मैं जानता हूं कि रक्षा सौदा में कितनी बड़ी ताकतें पहले अच्छे-अच्छों को खरीद लेती थी, ऐसी ताकतों को मोदी ने चुनौती दी है। और इसलिए मोदी पर उस दिन नाराजगी नहीं, गुस्सा होना भी बहुत स्वाभाविक है। और उनका गुस्सा प्रकट भी होता रहता है।

अगर कांग्रेस सरकार आज सत्ता में होती तो आज देश का नसीब है। देश बच गया, लेकिन आज अगर आप होते तो महंगाई कोरोना के खाते में जमाकर के झाड़ करके निकल जाते आप लोग। लेकिन हम बड़ी संवेदनशीलता के साथ इस समस्या को महत्वपूर्ण समझकर के उसके समाधान के लिए पूरी ताकत से काम कर रहे हैं। आज दुनिया में अमेरिका और ओईसीडी देशों में महंगाई सात प्रतिशत है, करीब-करीब सात प्रतिशत। लेकिन माननीय अध्यक्ष जी, हम किसी पर ठीकरा फोडक़र के भाग जाने वालों में से नहीं हैं। हम ईमानदारी से प्रयास करने वालों में हैं जिम्मेवारी के साथ देशवासियों के साथ खड़े रहने वाले लोगों में हैं।

इस सदन में गरीबी कम करने के भी बड़े-बड़े आंकड़े दिये गए लेकिन एक बात भूल गए। इस देश का गरीब इतना विश्वासघाती नहीं है। इस देश का गरीब इतना विश्वासघाती नहीं है कि कोई सरकार उसकी भलाई के काम करे और वो फिर उसको ही सत्ता से बाहर करे, ये देश के गरीब के स्वभाव में नहीं है। आपकी ये दुर्दशा इसलिए आई क्योंकि आपने मान लिया था नारे दे करके गरीबों को अपने चुंगल में फंसाए रखोगे, लेकिन गरीब जाग गया, गरीब आपको जान गया। इस देश का गरीब इतना जागरूक है कि आपको 44 सीटों पर समेट दिया। 44 सीट पर आ करके रोक दिया। कांग्रेस 1971 से गरीबी हटाओ के नारे पर चुनाव जीतती रही थी। 40 साल बाद गरीबी तो हटी नहीं, लेकिन कांग्रेस सरकार ने नई परिभाषा दे दी।

कांग्रेस पार्टी की सत्ता में आने की इच्छा खत्म हो चुकी है। लेकिन जब कुछ मिलने वाला नहीं है तो कम से कम बिगाड़ तो दो, ये फिलॉसफी पर आज निराशावादी है। लेकिन उस लोभ में बरबाद कर-करके छोड़ेंगे, इस मोह में देश में वो बीज बो रहे हैं जो अलगाव की जड़ों को मजबूत करने वाले हैं। सदन में ऐसी बातें हुईं के जिसमें देश के कुछ लोगों को उकसाने का भरपूर प्रयास किया गया। अगर पिछले सात साल से कांग्रेस के हर कारनामे, हर गतिविधि, उसको बारीकी से देखेंगे तो हर चीज को अगर धागे में बांध करके देखेंगे तो इनका गेम प्लान क्या है वो बिल्कुल समझ में आता है और वो ही मैं आज इनका खुल्ला कर रहा हूं।

आपका गेम प्लान कोई भी हो, माननीय अध्यक्ष जी, ऐसे बहुत लोग आए और चले गए। लाखों कोशिशें की गईं, अपने स्वार्थवश की गईं लेकिन ये देश अजर-अमर है, इस देश को कुछ नहीं हो सकता। आने वालों को, इस प्रकार की कोशिश करने वालों को हमेशा कुछ न कुछ गंवाना पड़ा है। ये देश एक था, श्रेष्ठ था, ये देश एक है, ये देश श्रेष्ठ रहेगा, इसी विश्वास के साथ हम आगे बढ़ रहे हैं।

यहां कर्तव्यों की बात करने पर भी एतराज जताया गया है। उससे भी कुछ लोगों को पीड़ा हुई है कि देश का प्रधानमंत्री कर्तव्य की बात क्यों करता है। कर्तव्य की चर्चा हो रही है। किसी बात को समझ के भाव से या बद-इरादे से, विकृति से घड़ देना, विवाद खड़ा कर देना ताकि खुद लाइमलाइट में रहें। मैं हैरान हूं अचानक कांग्रेस को अब कर्तव्य की बात चुभने लगी है।

आप लोग कहते रहते हैं कि मोदीजी, नेहरू जी का नाम नहीं लेते, तो आज मैं आपकी मुराद बराबर पूरी कर रहा हूं, आपकी प्यास बुझा रहा हूं। देखिए कर्तव्यों के संबंध में नेहरू जी ने क्या कहा था, जरा मैं आज कोट सुनाता हूं-

क्षणश: कणश: श्चैव विद्यामर्थं साधयेत्।

क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्।।

अर्थात विद्या ज्ञान के लिए एक-एक पल महत्वपूर्ण होता है। संपत्ति संसाधनों के लिए एक-एक कण जरूरी होता है। एक-एक क्षण बर्बाद करके ज्ञान हासिल नहीं किया जा सकता और एक-एक कण बर्बाद किया गया, छोटे-छोटे संसाधनों का समुचित प्रयोग नहीं किया गया तो संसाधन व्यर्थ हो जाते हैं। मैं कांग्रेस और उनके सहयोगियों से कहूंगा आप ये मंथन जरूर कीजिए कि कहीं आप इतिहास के इस महत्वपूर्ण क्षण को नष्ट तो नहीं कर रहे हैं। मुझे सुनाने के लिए, मेरी आलोचना करने के लिए, मेरी दल को कोसने के लिए बहुत कुछ है, कर सकते हैं आप। और आगे भी करते रहिए, मौकों की कमी नहीं है। लेकिन आजादी के अमृतकाल का ये समय, 75 वर्ष का ये समय भारत की विकास यात्रा में सकारात्मक योगदान का समय है। मैं विपक्ष को और यहां पर बैठे हुए भी सभी साथियों से और सदन के माध्यम से देशवासियों से भी आजादी के इस अमृत महोत्सव के इस पर्व पर आग्रह करता हूं, निवेदन करता हूं, अपेक्षा करता हूं कि आओ इस आजादी के इस अमृत महोत्सव को हम नए संकल्पों के साथ आत्मनिर्भर भारत के संकल्प के साथ एकजुट होकर हम लग जाए। कोशिश करें पिछले 75 साल में जहां-जहां हम कम पड़े हैं, उसको पूरा करें और आने वाले 2047 के शताब्दी वर्ष बनाने से पहले देश को कैसा बनाना है, उसका संकल्प लेकर के आगे बढ़े। देश के विकास के लिए मिलकर के काम करना है। राजनीति अपनी जगह पर है, हम दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर के देश की भावनाओं को लेकर के जीयें। चुनाव के मैदान में जो कुछ करना है, करते रहिए लेकिन हम देशहित में आगे आए। ऐसी अपेक्षा रखता हूं। आजादी के सौ वर्ष जब होंगे, ऐसे ही सदन में जो लोग बैठे होंगे, तो जरूर चर्चा करेंगे कि ऐसी मजबूत नींव पर ऐसी प्रगति पर पहुंचे हुई सौ साल की उस यात्रा के बाद देश ऐसे लोगों के हाथ में जाए ताकि उनको आगे ले जाने का मन कर जाए। हम यही सोचे कि जो समय मिला है उसका हम सदुपयोग करें। हमारे स्वर्णिम भारत के निर्माण में हम कोई कोताही न बरतें। पूरे सामर्थ्य के साथ हम उस काम में लगें।

 

 

नरेन्द्र मोदी

(यह लेख लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जवाब के सम्पादित अंशों पर आधारित है)

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