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विश्व मातृभाषा दिवस, 21 फरवरी 2022 पर विशेष : नये भारत के निर्माण में मातृभाषाओं को प्रोत्साहन मिले

विश्व मातृभाषा दिवस, 21 फरवरी 2022 पर विशेष : नये भारत के निर्माण में मातृभाषाओं को प्रोत्साहन मिले

यूनेस्को द्वारा हर वर्ष 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देना। यूनेस्को द्वारा अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा से बांग्लादेश के भाषा आन्दोलन दिवस को अन्तरराष्ट्रीय स्वीकृति मिली, जो बांग्लादेश में सन् 1952 से मनाया जाता रहा है। बांग्लादेश में इस दिन एक राष्ट्रीय अवकाश होता है। 2008 को अन्तरराष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित करते हुए, संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्व को फिर दोहराया है। 2022 के अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का विषय (थीम), “बहुभाषी शिक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोगः चुनौतियां और अवसर” है।
मातृभाषा एक ऐसी भाषा होती है जिसे सीखने के लिए उसे किसी कक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं, वही व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। लेकिन मानव समाज में कई दफा हमें मानवाधिकारों के हनन के साथ-साथ मातृभाषा के उपयोग को गलत भी बताया जाता रहा है। ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी 21 फरवरी 1952 को बांग्लादेश में जब 1947 में भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उर्दू को राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया था। लेकिन इस क्षेत्र में बांग्ला और बंगाली बोलने वालों की अधिकता ज्यादा थी और 1952 में जब अन्य भाषाओं को पूर्वी पाकिस्तान में अमान्य घोषित किया गया तो ढ़ाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया। आंदोलन को रोकने के लिए पुलिस ने छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलानी शुरु कर दी जिसमें कई छात्रों की मौत हो गई। अपनी मातृभाषा के हक में लड़ते हुए मारे गए शहीदों की ही याद में मातृभाषो दिवस मनाया जाता है।
आज विश्व में ऐसी कई भाषाएं और बोलियां हैं जिनका संरक्षण आवश्यक है। लोकभाषाओं की चिंता इसलिए जरूरी है कि ये हमारी विरासत का एक भाग हैं और हमारी थाती हैं और इनमें जो भी कुछ सुंदर और श्रेष्ठ रचा जा रहा है, उसे सहेजकर रखा जाना चाहिए। यूनेस्को के अनुसार भाषा केवल संपर्क, शिक्षा या विकास का माध्यम न होकर व्यक्ति की विशिष्ट पहचान है, उसकी संस्कृति, परम्परा एवं इतिहास का कोष है। किसी भी राष्ट्र या समाज के लिए अपनी मातृभाषा अपनी पहचान की तरह होती है। अगर हम भारत की बात करें तो यहां हर कुछ कदम पर हमें बोलियां बदलती नजर आएंगी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा जरूर है लेकिन इसके साथ ही हर क्षेत्र की अपनी कुछ भाषाएं भी है जिन्हें प्रोत्साहन दिया जाना जरूरी है।
85 संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के तीन हजार विशेषज्ञों के पीपुल्स लिंग्युस्टिक सर्वे आफ इंडिया (पीएलएसआई) के अध्ययन के अनुसार पिछले 50 वर्षों के दौरान 780 विभिन्न बोलियों वाले देश की 250 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। इनमें से 22 अधिसूचित भाषाएं हैं। जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार 10 हजार से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली 122 भाषाएं हैं। बाकी 10 हजार से कम लोगों द्वारा बोली जाती है। आयरिश भाषाई विद्वान जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन के बाद पहली बार 1898-1928 के बीच भाषाई सर्वे किया गया है। आजाद भारत में पहली बार किए गए इस पहले सर्वें में चार वर्ष लगे। इस रिपोर्ट के अनुसार भाषाई विविधता की दृष्टि से भारत में अरुणाचल प्रदेश सबसे समृद्ध राज्य है, वहाँ 90 से अधिक भाषाएँ बोली जाती है। इसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात का स्थान है, जहाँ 50 से अधिक भाषाएँ बोली जाती है। 47 भाषाओं के साथ ओडिशा चौथे स्थान पर है। इसके विपरीत गोवा में सिर्फ तीन भाषाएं बोली जाती हैं तो दादर और नगर हवेली में एक भाषा ’गोरपा’ है, जिसका अब तक कोई रिकार्ड नहीं है।
करीब 400 से अधिक भाषाएं आदिवासी और घुमंतू व गैर-अधिसूचित जनजातियाँ बोलती हैं। यदि भारत में हिंदी बोलने वालों की तादाद लगभग 40 करोड़ है तो सिक्किम में माझी बोलने वालों की तादाद सिर्फ 4 है। पूर्वाेत्तर के पाँच राज्यों में बोली जाने वाली करीब 130 भाषाओं का अस्तित्व खतरे में हैं। असम की 55, मेघालय की 31, मणिपुर की 28, नागालैंड की 17 और त्रिपुरा की 10 भाषाएं खतरे में हैं। हाल ही में भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तकरीबन हजारों साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा ‘बो‘ हमेशा के लिए विलुप्त हो गई । वस्तुतः कुछ समय पहले अंडमान में रहने वाले बो कबीले की आखिरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर के निधन के साथ ही इस आदिवासी समुदाय द्वारा बोली जाने वाली ‘बो‘ भाषा भी लुप्त हो गई।
भारत में मातृभाषाओं को प्रोत्साहन देने के लिये नरेन्द्र मोदी सरकार प्रयासरत है। उन्होंने उच्च शिक्षा के स्तर पर भी बहुभाषिकता को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्वीकार किया है। हमारे देश में मातृभाषाओं के प्रति अनेक प्रकार के भ्रम फैले हैं, जिनमें एक भ्रम है कि अंग्रेजी विकास और ज्ञान की भाषा है। जबकि इस बात से यूनेस्को सहित अनेक संस्थानों के अनुसंधान यह सिद्ध कर चुके हैं कि अपनी भाषा में शिक्षा से ही बच्चे का सही एवं सर्वांगीण मायने में विकास हो पाता है। इस दृष्टि से मातृभाषा में शिक्षा पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। इसी मत को भारत के राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र तथा शिक्षा संबंधित सभी आयोगों आदि ने भी माना है। भारतीय वैज्ञानिक सी.वी.श्रीनाथ शास्त्री के अनुभव के अनुसार अंग्रेजी माध्यम से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने वाले की तुलना में भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़े छात्र, अधिक उत्तम वैज्ञानिक अनुसंधान करते हैं। महात्मा गाँधी ने कहा था, “विदेशी माध्यम ने बच्चों की तंत्रिकाओं पर भार डाला है, उन्हें रट्टू बनाया है, वह सृजन के लायक नहीं रहे। विदेशी भाषा ने देशी भाषाओं के विकास को बाधित किया है।“ इसी संदर्भ में भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कलाम के शब्दों का यहां उल्लेख आवश्यक हो जाता है कि “मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की।’’
सशक्त भारत-निर्माण एवं प्रभावी शिक्षा के लिए मातृभाषा में शिक्षा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। क्योंकि शिक्षा को अपने समाज एवं राष्ट्र के अनुरूप संचालित करने और अपनी भाषाओं में शिक्षण करने से ज्ञान के नए क्षितिज खुलेंगे, नवाचार के नए-नए आयाम उभरेंगे। मातृभाषा में चिंतन एवं शिक्षण से सृजनात्मक एवं स्व-पहचान की दिशाएं उद्घाटित होगी। वास्तव में स्व-भाषाएं विचारों, विचारधाराओं, कल्पनाओं और अपने व्यापक सामाजिक-राष्ट्रीय दर्शन की स्पष्टता का माध्यम बनती हैं। इसीलिये नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा को प्रतिष्ठापित करने का अनूठा उपक्रम किया जा रहा है। इसको लेकर देश में मातृभाषा एवं क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने एवं इन्हीं भाषाओं में उच्च शिक्षा दिये जाने की स्थितियां निर्मित होने लगी है। ऐसा ही निर्णय अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने अपने से संबद्ध इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिये 2021-22 के शैक्षणिक सत्र के लिये लिया है, जिसके अन्तर्गत क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति दी जा रही है। नवंबर 2020 में, शिक्षा मंत्रालय ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिसमें कॉलेजों को मातृभाषा में इंजीनियरिंग की शिक्षा देने की अनुमति दी गई थी।
एआईसीटीई के अध्यक्ष अनिल सहस्रबुद्धे के अनुसार क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की शिक्षा दिये जाने के लिए बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, तमिल और तेलुगु सहित आठ क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्य-सामग्री के अनुवाद पर काम शुरू कर दिया है। परिषद ने अपने संबद्ध कॉलेजों में 83 हजार छात्रों पर एक सर्वेक्षण किया था जिसमें लगभग 44 प्रतिशत छात्रों ने मातृभाषा में शिक्षा लेने के लिये अपनी रुचि दिखाई थी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में क्षेत्रीय भाषा के विकल्प की पेशकश पर भी यथासमय निर्णय लिया जाएगा। स्वभाषा एवं मातृभाषा में शिक्षा अधिक प्रभावी एवं उपयोगी है, क्योंकि विद्यार्थी मातृभाषा में शिक्षा को आसानी से ग्रहण करता है, इसमें विद्यार्थी की ग्रहण क्षमता ज्यादा होती है।
भारत सुपर पावर बनने के अपने सपने को साकार कर सकता है। इस महान उद्देश्य को पाने की दिशा में विज्ञान, तकनीक और अकादमिक क्षेत्रों में नवाचार और अनुसंधान करने के अभियान को तीव्रता प्रदान करने के साथ मातृभाषा में शिक्षण को प्राथमिकता देना होगा। मातृभाषा जब शिक्षा का माध्यम बनेगी तो मौलिकता समाज में रचनात्मकता का अभियान छेड़ेगी। भाषा और गणित को नई नीति में प्राथमिकता मिलना बच्चों में लेखन के कौशल और नवाचार का संचार करेगा। सृजनात्मक गतिविधियों का वातावरण पैदा करेगा। मातृभाषा सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है। भारत का परिपक्व लोकतंत्र, प्राचीन सभ्यता, समृद्ध संस्कृति तथा अनूठा संविधान विश्व भर में एक उच्च स्थान रखता है, उसी तरह भारत की गरिमा एवं गौरव की प्रतीक मातृ भाषाओं को हर कीमत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए।

 

 

 

By ललित गर्ग

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