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रूस और यूक्रेन के विवाद की जड़

रूस और यूक्रेन के विवाद की जड़

रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया है। माना जा रहा है कि यह तीसरे विश्वयुद्ध की आहट है। रूस और यूक्रेन का विवाद आज दुनिया भर में चर्चा का विषय बना है। दरअसल यूक्रेन की आड़ में सारी लड़ाई गैस के लिए हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि रूस यूक्रेन पर फरवरी में हमला कर सकता है। माना जा रहा था कि रूस सर्दी के कारण यूक्रेन के चारों ओर जमी बर्फ पिघलने का इंतजार कर रहा था, ताकि युद्ध का भारी सामान वहां तक पहुंचाया जा सके। दरअसल रूस और यूक्रेन की इस जंग के पीछे की वजह है गैस। रूस के पास दुनिया का सबसे ज्यादा नेचुरल गैस का भंडार है, यानी इस मामले में रूस पूरी दुनिया में नंबर 1 देश है, दूसरे नंबर पर ईरान और तीसरे नंबर पर कतर है। रूस की एक सरकारी कंपनी गैजप्रॉम है, इस कंपनी से होने वाला मुनाफा, रूस के सालाना बजट का लगभग 40 फीसदी है। यूरोप इस कंपनी का एक बड़ा बाजार है और गैज़प्रॉम यूरोप में पाइपलाइन के जरिए सीधे गैस सप्लाई करती है। 2014 तक सब ठीक-ठाक चल रहा था।

2014 में यूक्रेन में पहली बार सत्ता बदली। लोगों के विरोध प्रदर्शन के कारण उस समय के राष्ट्रपति को अपनी कुर्सी छोड़कर जान बचाने के लिए देश से भागना पड़ा। उसके बाद देश में एक नई सरकार बनी। 1991 में सोवियत संघ से अलग होने के बाद यूक्रेन में पहली बार रूस विरोधी सरकार बनी थी। 2014 में नाराज रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया और ‘क्रीमिया’ पर कब्जा कर लिया। 2014 के बाद हालात बिगडऩे शुरू हो गए। दरअसल 2014 तक रूस पाइपलाइन के जरिए यूरोप तक सीधे गैस पहुंचाता था। जिन-जिन देशों से ये पाइपलाइन गुजरती है, उन देशों को रूस को ट्रांजिट फीस देनी पड़ती है और इन्हीं में से एक देश है यूक्रेन। इसलिए रूस को हर वर्ष करीब 33 बिलियन डॉलर ट्रांजिट फीस यूक्रेन को देनी पड़ती थी। ये यूक्रेन के सालाना बजट का करीब 4 फीसदी थी। मगर 2014 के बाद यूक्रेन के साथ रिश्ते में खटास आते ही यूक्रेन को सबक सिखाने के लिए रूस ने एक नया तरीका निकाला। उसने यूरोप तक एक नई पाइपलाइन बिछाने का निश्चय किया, लेकिन उसने तय किया कि अबकी बार ये पाइपलाइन यूक्रेन से होकर नहीं गुजरेगी। इससे यूक्रेन आर्थिक तौर पर कमजोर हो जाएगा। इसके बाद रूस ने अपनी बेहद महत्वाकांक्षी और खर्चीली परियोजना ‘नार्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइपलाइन’ पर काम करना शुरू किया।

इस परियोजना के तहत वेस्टर्न रूस से नार्थ ईस्ट और जर्मनी तक बाल्टिक सागर के रास्ते 12 सौ किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन बिछाई गई। इसमें 10 बिलियन डालर खर्च हुए। इस पाइपलाइन के जरिए रूस अब यूक्रेन को बाईपास कर सीधे जर्मनी तक अपनी गैस भेज सकता है। जर्मनी में नेचुरल गैस की सख्त जरूरत है और रूस ने उसे सस्ते दामों में गैस देने का समझौता किया है। रूस की ये नई पाइपलाइन बन कर पूरी तरह से तैयार हो चुकी है। इस नई पाइपलाइन के जरिए रूस हर साल जर्मनी को 55 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस की सप्लाई करेगा। अब रूसी सरकारी कंपनी गैजप्रॉम को केवल यूरोपी रेगुलेटर्स की मंजूरी का इंतजार है। मंजूरी मिलते ही गैस की सप्लाई शुरू हो जाएगी। जर्मनी रूस का सबसे बड़ा तेल और गैस का खरीददार है। हालांकि जर्मनी के अलावा पूरे यूरोप में रूसी गैस और तेल की सप्लाई होती है। वहीं जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लगभग पूरा यूरोप तेल और गैस के लिए रूस पर निर्भर है।

अभी तक रूस की पाइपलाइन यूक्रेन से होकर गुजरती थी। 2 साल पहले हुए एक समझौते के मुताबिक यूक्रेन को इसके एवज में 2024 तक हर साल करीब 7 अरब डॉलर रूस से मिलने थे। रूस यूरोप और खासकर जर्मनी को होने वाली सप्लाई का करीब 40 फ़ीसदी हिस्सा इसी पाइपलाइन से भेजता था। रूस की गैस पाइपलाइन करीब 53 हजार किलोमीटर लंबी है। रूस की सबसे बड़ी समस्या ये थी कि ये पुरानी पाइपलाइनें काफी जर्जर हो चुकी थीं और इनसे आए दिन गैस और तेल रिसाव की घटनाएं सामने आती थीं। अपनी इस समस्या से निजात पाने के लिए भी रूस ने नार्ड स्ट्रीम-2 पाइपलाइन बनाई। रूस और यूक्रेन के विवाद की जड़ भी दरअसल यही पाइपलाइन है।

रूस द्वारा बाईपास किए जाने से यूक्रेन नाराज हो गया, उसका कहना है कि रूस ने उसे आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए जान-बूझकर ऐसा किया है और इसलिए वह इस नई पाइपलाइन के शुरू किए जाने का विरोध कर रहा है। पोलैंड को भी बाईपास किया गया है और पोलैंड भी इसका विरोध कर रहा है। यूक्रेन चाहता है कि इस नई पाइपलाइन पर रोक लगाई जाए। अब सवाल यह है कि अमेरिका को इससे क्या दिक्कत है? अमेरिका की परेशानी की वजह ये है कि पहले अमेरिका जर्मनी समेत यूरोप के कई देशों को ज्यादा कीमत पर गैस की सप्लाई किया करता था। रूस के द्वारा सप्लाई की गई गैस की कीमत अमेरिका से कहीं कम है। रूस की गैस सप्लाई की वजह से अमेरिका की कंपनियों को नुकसान हो रहा है। दूसरी वजह यह है कि रूस की नई गैस पाइपलाइन के जरिए पूरा यूरोप ऊर्जा के लिए रूस पर पूरी तरह से निर्भर हो जाएगा। जिससे रूस और अधिक ताकतवर बन जाएगा। इसीलिए अमेरिका भी रूस की इस नई पाइपलाइन का लगातार विरोध करता रहा है। नॉर्ड स्ट्रीम-2 पाइपलाइन रूस और जर्मनी के बीच समंदर के नीचे से सीधे जाती है, जिससे रूस अपने गैस और तेल की ज्यादा तेजी और अधिक मात्रा में आपूर्ति कर सकेगा। यह पाइपलाइन बाल्टिक सागर से होकर गुजरेगी। इस पाइपलाइन को लेकर जहां एक ओर रूस और जर्मनी बहुत उत्साहित हैं, वहीं यूक्रेन और अमेरिका इसका जमकर विरोध कर रहे हैं। यूक्रेन को डर है कि इस पाइपलाइन के बन जाने से उसकी कमाई बंद हो जाएगी, जिससे उसे काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। वहीं अमेरिका की मंशा जर्मनी सहित यूरोप को अपने गैस और तेल बेचने की है और उसे डर है कि रूस की नई पाइपलाइन उसकी मंशा पर पानी फेर देगी। इसीलिए अमेरिका यूरोप पर इसका विरोध करने को लेकर दबाव बना रहा है और जर्मनी के लिए भी इसे एक खराब सौदा बता रहा है। जर्मनी रूस द्वारा यूक्रेन पर किए जाने वाले संभावित हमले के तो विरोध में था, लेकिन वह रूस के साथ हुई गैस की डील से भी पीछे नहीं हटना चाहता था।

अमेरिका और यूरोप भली-भांति जानते हैं कि इस नई पाइपलाइन की परियोजना रूस के लिए कितनी अहम है, इसीलिए यूक्रेन पर हमला करने से रोकने के लिए अमेरिका और यूरोप के देश व्लादिमीर पुतिन को ये धमकी दे रहे थे, कि यदि उन्होंने ऐसा कुछ किया तो इस नई गैस पाइपलाइन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। यूरोप और पश्चिमी देश यहां तक कि जर्मनी भी रूस से गैस नहीं खरीदेंगे। ऐसे में जर्मनी ने कहा था कि प्रतिबंध लगने से उसे आर्थिक नुकसान तो उठाना पड़ेगा, लेकिन इसके बावजूद वह नाटो के फैसले के साथ ही जाएगा। पश्चिमी देशों का मानना है कि रूस और यूक्रेन के बीच हुई जंग की आग पूरे यूरोप में फैल सकती है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस यूक्रेन तनाव के मुद्दे पर चर्चा की मांग वाली वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव लाया गया था, इसमें यूक्रेन के सीमा हालात पर चर्चा करने की मांग की गई थी। इस प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 10 देशों ने यूक्रेन के मुद्दे को उठाने के पक्ष में मतदान किया, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, मैक्सिको, आयरलैंड आदि देश शामिल हैं। रूस और चीन ने इसके खिलाफ मतदान किया तो वहीं तीन सदस्य भारत, गेबान और केन्या ने वोटिंग से दूरी बनाए रखी। वैसे सुरक्षा परिषद की चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए केवल 9 मतों की जरूरत थी। माना जा रहा है कि भारत इस मुद्दे पर किसी भी पक्ष का समर्थन करना नहीं चाहता था। अगर भारत रूस के पक्ष में वोट देता तो इससे अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश नाराज हो सकते थे तो वहीं दूसरी तरफ अगर भारत यूक्रेन का समर्थन करता तो इससे रूस के साथ रिश्तों पर गंभीर असर पड़ सकता था। ऐसे में भारत ने बीच का रास्ता चुना और मतदान से दूरी बनाए रखी।

रूस और यूक्रेन के बीच विवाद यह भी है कि यूक्रेन उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो का सदस्य देश बनना चाहता है और रूस इसका विरोध कर रहा है। नाटो अमेरिका और पश्चिमी देशों के बीच एक सैन्य गठबंधन है, इसलिए रूस नहीं चाहता कि उसका पड़ोसी देश नाटो का मित्र बने। यूक्रेन भी अमेरिका और बाकी नाटो देशों के हथियारों को रूसी सीमा पर भेज रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि रूस को यूक्रेन पर किए गए हमले के लिए गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा। यूक्रेन और रूस के रिश्ते को समझना बहुत मुश्किल है। यूक्रेन के लोग स्वतंत्र रहना चाहते हैं, लेकिन पूर्वी यूक्रेन के लोगों की मांग है कि यूक्रेन को रूस के प्रति वफादार रहना चाहिए। यूक्रेन की राजनीति में नेता दो गुटों में बंटे हुए हैं। एक दल खुले तौर पर रूस का समर्थन करता है और दूसरा दल पश्चिमी देशों का समर्थन करता है। यही वजह है कि आज यूक्रेन दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच फंसा हुआ है।

 

 

रंजना मिश्रा

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