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कानून ने दिखाया जन्नत का रास्ता

कानून ने दिखाया जन्नत का रास्ता

लगभग 14 साल के लम्बे इंतजार के बाद आखिर वो घड़ी आ ही गयी जब अहमदाबाद में 26 जुलाई 2008 को हुए सीरियल ब्लास्ट मामले के दोषियों को सजा सुनाई गई। बीते 18 फरवरी को स्पेशल कोर्ट ने अबतक के इतिहास में सबसे बड़ी सजा सुनाते हुए 49 दोषियों में से एक साथ 38 दोषियों को फांसी की सजा और 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इन दोषियों के जुर्म की कहानी भी उतनी ही दर्दनाक है जितनी इनकी मौत होनी है। इनका जुर्म सिर्फ किसी की मौत नहीं है बल्कि इस कहानी में वो कितने घर हैं जो इनके जुर्म की वजह से उजड़ गए, कितने बच्चों के सर से उनके अभिभावकों का साया उठ गया, सम्पति के नुकसान की तो बात छोड़ ही दीजिये। स्वाभाविक है कि इनके जुर्म को जानकर किसी का भी खून खौल उठेगा। विगत 8 फरवरी को कोर्ट ने इस केस के 78 में से 49 आरोपियों को यूएपीए के तहत दोषी करार दिया गया था, जिनकी सजा का 18 को ऐलान किया गया है।

26 जुलाई 2008 का वो काला दिन था जब अहमदाबाद में 70 मिनट के दौरान 21 बम धमाके हुए थे जिसकी गूंज आज भी लोगों के मनोमस्तिष्क में बसी हुई है। शहरभर में हुए इन धमाकों में कम-से-कम 56 लोगों की जान चली गई थी और लोगों की चीख-पुकार से पूरा देश दहल गया था। इस सीरियल ब्लास्ट में करीब 200 लोग घायल हुए थे। इस मामले में अहमदाबाद में 20 प्राथमिकी दर्ज की गई थीं, जबकि सूरत में 15 केस दर्ज हुए थे।

अहमदाबाद में इस सीरियल ब्लास्ट के बाद गुजरात पुलिस ने सूरत जिले में 28 जुलाई और 31 जुलाई 2008 के बीच अलग-अलग इलाकों से 29 जिंदा बम बरामद किए थे, जो गलत सर्किट और डेटोनेटर की वजह से फटे नहीं थे। अगर ये बम फट जाते तो बड़ी तबाही मचती। इस बड़े सीरियल बलास्ट का मास्टर माइंड यासीन भटकल दिल्ली की जेल में बंद है, जबकि अब्दुल सुभान उर्फ तौकीर कोचीन की जेल में सजा काट रहा है। पुलिस की जांच में ये बात पता चली की ये सीरियल ब्लास्ट आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) और बैन किए गए स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (आईएम) से जुड़े लोगों ने किए थे। इस सीरियल ब्लास्ट से कुछ मिनट पहले, टेलीविजन चैनलों और मीडिया में कई जगह एक ई-मेल भेजा गया था, जिसमें कथित तौर पर ‘इंडियन मुजाहिदीन’ ने इन बम धमाकों की चेतावनी दी थी।  पुलिस का मानना था कि इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के आतंकियों ने 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के जवाब में ये धमाके किए थे।

मुकाम तक पहुंचाने वाली टीम

कहते है जब सदइच्छा और जूनून मन में हो तो कोई भी लक्ष्य भेदा जा सकता है। इसी जूनून और सदइच्छा की वजह से गुजरात पुलिस के इतिहास में सबसे लम्बी चलने वाले केस का इतना बढिय़ा परिणाम आया है। टीवी 9 डॉट कॉम की एक रपट के मुताबिक ‘इस ब्लास्ट की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन के संगठन हरकत उल जिहाद अल इस्लामी ने ली। भटकल बंधु यानी रियाज, इकबाल और यासीन भटकल उस ब्लास्ट के मुख्य सूत्रधार थे। इससे पहले केरल के वाघमोर के जंगलों में आतंकियों ने ब्लास्ट की ट्रेनिंग ली।  आतंकियों की एक टीम ट्रेन से अहमदाबाद आई। मुंबई से कार में विस्फोटक लाए गए। कार से ही अहमदाबाद और सूरत में विस्फोटक पहुंचाए गए। 13 साइकिल खरीदी गईं और स्लीपर सेल का इस्तेमाल किया गया।

26 जुलाई, 2008 को अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट के वक्त अहमदाबाद के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर आर वी अंसारी गोधरा में ड्यूटी कर रहे थे। तभी इन्हें इनके सीनियर ने सबूत जुटाने का ऑर्डर दिया।  आतंकवादियों ने ब्लास्ट में इस्तेमाल सामग्री कहां तैयार की और बम कहां बनाए गए, सबकुछ पता लगाने को कहा गया। इस बीच कई पुलिस अफसर जांच टीम में शामिल हो गए। बाद में इनकी संख्या 350 तक पहुंच गई। सीरियल ब्लास्ट के इन्वेस्टिगेशन के दौरान इन्हें एक लिंक मिला। इससे पता चला कि आतंकवादियों ने दाणीलीमड़ा इलाके के एक घर में बम रखा था। यहां पहुंचकर जांच टीम को आतंकवादी गतिविधि के पक्के सबूत हासिल हुए। उस वक्त टीम के ऊपर जल्द से जल्द पूरा केस खोलने का दबाव था।  लिहाजा पूरी इन्वेस्टिगेटिव टीम सुबह के नाश्ते के बाद रात तक भूखे प्यासे काम करती थी।

चार महीने तक जांच टीम के लोग घर तक नहीं गए थे। पूरे देश में छिपे धमाके से जुड़े आतंकियों का पता लगाया और उन्हें अहमदाबाद क्राइम ब्रांच लाया गया।  कर्नाटक से आतंकियों को लेकर टीम चली तो 1163 किलोमीटर दूर आकर सीधा अहमदाबाद में ही रुकी। इसी तरह उज्जैन से भी आतंकवादियों को लाया गया। इस पूरे इन्वेस्टिगेशन के बाद इस बात पर मुहर लग गई कि ये गुजरात पुलिस की सबसे बेस्ट इंवेस्टिगेशन टीम में से एक है क्योंकि इस टीम ने गुजरात पुलिस के एक बहुत बड़े चैलेंज को सॉल्व किया। कोर्ट में सबूत पेश किए, तब जाकर 13 साल 7 महीने बाद दोषियों को कोर्ट से सजा मिल सकी।’

अहमदाबाद के लोगों के लिए तो यह फैसला भावुक क्षणों का सबब तो है ही लेकिन सबसे खास भावुक तो वह कुछ लोग हैं जो इस ब्लास्ट से सीधा प्रभावित हुए थे।  लल्लनटॉप की एक रपट बताती है ‘उस काले दिन कोई शाम के साढ़े 6 बज रहे होंगे। एक 10 साल का बच्चा। जिसका नाम यश ब्यास है। वो अपने पापा से साइकिल चलाने की जिद करता है। उसके पापा दुष्यंत ब्यास अहमदाबाद के सिविल अस्पताल के कैंपस में ही रहते थे। वो वहां कैंसर मेडिकल फैसलिटी में बतौर लैब टेक्नीशियन काम किया करते थे। पिता ने एकाध बार तो मना किया, मगर बच्चे की बात माननी पड़ी। यश के साथ उसका बड़ा भाई 12 साल रोहन भी साइकिल चलाने जाता है। वो इस बात से बिलकुल बेखबर थे कि अहमदाबाद शहर के कई हिस्से बारूद के ढेर पर खड़े थे। यश और उसके पिता और भाई को बिलकुल भी नहीं पता नहीं था कि आज कुछ ऐसा होगा जो सबकुछ बदलकर रख देगा।

शाम के करीब 7.30 बजे सिविल अस्पताल में हुए धमाके में यश ने अपने पिता और भाई को खो दिया। यश इतनी बुरी तरह घायल हुआ कि वो पूरे 4 महीने आईसीयू में भर्ती रहा। आज यश 24 साल का हो गया, साइंस से ग्रेजुएशन कर रहा है। मगर ब्लास्ट से मिले जख्म आज भी नहीं भरे हैं। धमाका से बदन पर पड़े जले के निशान आज भी हैं। धमाके की गूंज ऐसी थी कि यश को आंशिक रुप से कम सुनाई देता है। ‘इस कहानी को पढऩे के बाद उन लोगों की बात बेमानी लगने लगती है जो यह कहते हैं की अन्याय के प्रतिकार में वह आतंक जैसे जघन्य कृत्य का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। उन्हें यश से सीखना चाहिए की इतने अन्याय के बाद भी वह देश के विकास में अपना योगदान देने को तैयार बैठा है। यही इस देश की ताकत है और  इसलिए ही यह कहते हैं की

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जमां हमारा।’

 

नीलाभ कृष्ण

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