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परम्परा या कुरीति : हिजाब

परम्परा या कुरीति : हिजाब

आज पुरे भारत में एक अजीब सी बहस छिड़ी हुई है हिजाब को लेकर हालांकि इसमें बहस जैसे कुछ नहीं है फिर भी यह बहस इसलिए हो रही क्योंकि इस घटना का सम्बन्ध भारत में एक ऐसे वर्ग से है जो हमेशा अपने धर्म का आधार बनाकर चुनावी राजनीति का लाभ लेने में लगा रहता है, और एक ही अलाप जपता रहता है की इस्लाम खतरे में!

कोई भी धर्म हमेशा परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को परिवर्तित करता है क्योंकि कई मान्यताएं या परम्पराए समय के अनुसार पुरानी हो जाती है, यह परम्पराओं में परिवर्तन धर्म को कमजोर नही बल्कि सभी के लिए आदर्श बनाता है किन्तु इसके विपरीत विश्व में इस्लाम एकमात्र ऐसा धर्म है जिसे लगता है की उसकी हर मान्यता और परम्परा सही है जैसे (तीन तलाक, हलाला, और हिजाब/बुर्का) लेकिन जब हम इन परम्पराओं को धरातल पर देखते है तो यह परम्पराएं किसी कुरीति के समान लगती है जिसके कारण ही भारतीय मुस्लिम महिलाएं अन्य महिलाओं से पिछड़ी हुई लगती है! ऐसी ही विपनताओं को दूर करने के लिए ही आज पुरे भारत में यूनिफार्म सिविल कोड की बात की जा रही है।

यूनिफार्म सिविल कोड आज इसलिए भी अधिक जरुरी बन जाता है क्योंकि आज स्कूल-कॉलेज की छात्राएं हिजाब/बुर्का पहन कर आने की आजादी मांग रही है जो समझ से परे, क्योंकि एक ओर जहां आज महिलाएं परम्परा रूपी दीवारों को तोड़कर आसमान में उड़ान भर रही हैं वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम महिलाएं अभी भी जड़ता रूपी कुरीतियों में फंसी हुई है जो सोचनीय है।

भारत विविधताओं का देश है जिसे भारत की शक्ति कहा गया है! कहावत भी है। विविधता में एकता भारत की विशेषता लेकिन यही विविधता कभी-कभी भारत की एकता के लिए खतरा बन जाती है।

जैसे कभी विविधता के कारण ही भारत का बटवारा हो जाता है तो कभी एनआरसी का बहाना बनाकर समाज के सौहार्द खराब करने की कोशिश की जाती है।

आज भी यही विविधता के कारण ही भारत में बुर्का/हिजाब को लेकर एक नई बहस छिड़ी दी गई। मसलन बहस होनी चाहिए तीन तलाक को लेकर, बहस होनी चाहिए बुर्का की आजादी को लेकर, बहस होनी चाहिए अमानवीय हलाला जैसी कुरीति को लेकर।

लेकिन तमाम मुस्लिम मंचों पर ऐसे मुद्दे नदारद है। परंपरा अगर भविष्य का मार्गदर्शन ना बनकर वर्तमान को धरातल पर लेकर जाएं तो ऐसी परम्पओं को बदलना या फिर उन्हें समाप्त करना जरुरी बन जाता है।

डॉ. आंबेडकर और बुर्का प्रथा

दरअसल, ये तो हम सभी को बचपन से पढ़ाया गया है कि डॉ. आंबेडकर हिंदू धर्म की कुरीतियों जैसे ऊंच-नीच और छुआ-छूत के घनघोर विरोधी थे और इसके खिलाफ उन्होंने कई आंदोलन भी चलाए। लेकिन ये कम ही लोग बताते हैं कि बाबा साहेब सिर्फ हिंदू धर्म की कुरीतियों के ही नहीं बल्कि हर धर्म की कुरीतियों के विरोधी थे।

डॉ. आंबेडकर हर धर्म की महिला के अधिकारों और सशक्तिकरण के समर्थक थे और इसी वजह से उन्हें इस्लाम की पर्दाप्रथा नागवार गुजरती थी। उन्होंने 40 के दशक में लिखी अपनी मशहूर पुस्तक ‘पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन’ में इस विषय पर गंभीरता और पूरी स्पष्टता से प्रकाश डाला है।

पुस्तक के दसवें अध्याय के पेज नंबर 231 पर वो लिखते हैं-

‘पर्दा प्रथा की वजह से मुस्लिम महिलाएं अन्य जातियों की महिलाओं से पिछड़ जाती हैं। वो किसी भी तरह की बाहरी गतिविधियों में भाग नहीं ले पातीं हैं जिसके चलते उनमें एक प्रकार की दासता और हीनता की मनोवृत्ति बनी रहती है। उनमें ज्ञान प्राप्ति की इच्छा भी नहीं रहती क्योंकि उन्हें यही सिखाया जाता है कि वो घर की चारदीवारी के बाहर वे अन्य किसी बात में रुचि न लें।

अपनी किताब के पेज नंबर 231 पर ही वो आगे लिखते हैं कि –

‘पर्दा प्रथा ने मुस्लिम पुरुषों की नैतिकता पर विपरीत प्रभाव डाला है। पर्दा प्रथा के कारण कोई मुसलमान अपने घर-परिवार से बाहर की महिलाओं से कोई परिचय नहीं कर पाता। घर की महिलाओं से भी उसका संपर्क यदा-कदा बातचीत तक ही सीमित रहता है। बच्चों और वृद्धों के अलावा पुरुष अन्य महिलाओं से हिल-मिल नहीं सकता, अपने अंतरंग साथी से भी नहीं मिल पाता। महिलाओं से पुरुषों की ये पृथकता निश्चित रूप से पुरुष के नैतिक बल पर विकृत प्रभाव डालती है। ये कहने के लिए किसी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं कि ऐसी सामाजिक प्रणाली से जो पुरुषों और महिलाओं के बीच के संपर्क को काट दे उससे यौनाचार के प्रति ऐसी अस्वस्थ प्रवृत्ति का सृजन होता है जो आप्राकृतिक और अन्य गंदी आदतों और साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है।’

‘ऐसा नहीं है कि पर्दा और ऐसी ही अन्य बुराइयां देश के कुछ भागों में हिंदुओं के कई वर्गों में प्रचलित नहीं है। परंतु अंतर केवल यही है कि मुसलमानों में पर्दा-प्रथा को एक धार्मिक आधार पर मान्यता दी गई है, लेकिन हिंदुओं में ऐसा नहीं है। हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों में पर्दा-प्रथा की जड़े गहरी हैं। मुसलमानों में पर्दाप्रथा एक वास्तविक समस्या है और जबकि हिंदुओं में ऐसा नहीं है। मुसलमानों ने इसे समाप्त करने का कभी प्रयास किया हो इसका भी कोई साक्ष्य नहीं मिलता है।’

पर्दाप्रथा ही नहीं डॉ. आंबेडकर इस्लाम के अंदर मौजूद बहुपत्नी प्रथा यानि चार शादियां करने के भी प्रचंड विरोधी थे। उनका मानना था कि चार शादियों से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन और उनका दमन होता है। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि इस्लाम धर्म का जन्म समानता के सिद्धांत पर हुआ था लेकिन भारत तक पहुंचते-पहुंचते इस्लाम के अंदर भी जातिगत भेदभाव और ऊंच-नीच की बुराई शामिल हो गई। लेकिन बाबासाहेब को सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से थी कि भारत के मुसलमान समाज सुधार के विरोधी हैं।

‘मुसलमानों ने समाज में मौजूद बुराइयों के खिलाफ कभी कोई आंदोलन नहीं किया। हिंदुओं में भी सामाजिक बुराइयां मौजूद हैं, लेकिन अच्छी बात ये है कि वो अपनी इस गलती को मानते हैं और उसके खिलाफ आंदोलन भी चला रहे हैं। लेकिन मुसलमान तो ये मानते ही नहीं हैं कि उनके समाज में कोई बुराई है। दरअसल मुसलमान समाज सुधार के प्रबल विरोधी हैं।’

ऐसे में कर्नाटक के शैक्षणिक संस्थानों से उठी बुर्के की मांग उस गंभीर समस्या की ओर भी ईशारा करती है जिसका शिकार अब ज्ञान के केंद्र भी बन गए है।

 


डॉ. प्रीती

(लेखिका असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

 

 

 

 

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