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जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ

जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ

यह सर्वविदित है कि पुण्यभूमि भारतवर्ष के चार धाम के अंदर पुरषोत्तमधाम या पुरीधाम सर्वश्रेष्ठ है।  इस धाम को जगन्नाथ धाम भी कहते हैं। अखिल ब्रह्मांडनाथ श्रीजगन्नाथ की उत्पत्ति, रीति, नीति तथा जीवनचर्या रहस्यमय है और उससे भी ज्यादा रहस्यमय है उनके अनुपम तथा विभिन्न महाप्रसाद। महाप्रसाद को बनाने की शैली पारंपरिक है, जो प्राचीन काल से आज तक चली आ रही है। जो मिट्टी के बने हुए पात्र में बनाया जाता है।
महाप्रसाद का अर्थ है- रहस्यमय श्रीजगन्नाथजी को समर्पित नैवेद्य। श्री जगन्नाथ को समर्पित अन्न इत्यादि घृतपक्व , पिष्ठकादि प्रसाद को भी महाप्रसाद कहा जाता है। श्री जगन्नाथ को समर्पित पुष्पहार, वस्त्र, तुलसी इत्यादि भी महाप्रसाद कहलाते हैं, जो की अन्यत्र दुर्लभ है। सारे भारत में जितने भी विष्णु मन्दिर हैं वहां पर प्रसाद को महाप्रसाद ही कहते हैं। श्रीजगन्नाथ धाम में श्रीजगन्नाथ को अर्पित प्रसाद को जगदम्बा बिमलादेवी को पुन: समर्पित किया जाता है। इसे ही महाप्रसाद कहा जाता है। जब भगवान श्रीजगन्नाथ जी को नैवेद्य अर्पित किया जाता है तब छ: संस्कार के द्वारा उसका अन्नतव लोप करके ब्रह्मत्व आरोप किया जाता है। जहां पर प्रसाद निर्माण होता है उसे चूला कहते हैं। जो कि षट्कोणत्मक अग्नि यन्त्राकृति का होता है। महाप्रभु श्री जगन्नाथ को 56 प्रकार के भोग समर्पित किये जाते हैं। जैसे-प्रत्यह गोपालवल्लभ भोग, सकालधूप, भोगमण्डप, मध्याह्रधूप, सन्ध्याधूप और बड़सिग्डारधूप। विशेषोत्सव दिनों में विशेषभोग का भी आयोजन किया जाता है। पिष्टकादि नैवेद्य में राविडि़, खुआमण्डा, वड़कान्ति, सानकान्ति, खजा, लुणखुरूमा, जगन्नाथ वल्लभ, मगजलडु, सरपुलि, अमालु, सुआरपिठा, आरिसा, चढ़ेइलदा, माण्डुअ, हंसकेली, मोहनभोग, गजा प्रभृति द्रव्य आते हैं। वैसे ही अन्नादि नैवेद्य में खेचड़ी, कानिका, अन्नरसावली, अन्न, पखाल, घिअन्न, दहिपखाल, मिष्ठान्न, मिठा डालि, साधा डालि, डालमा, वेसर, महुर, शाग, गोटामुग, गोटासुला, रसा, मधुरूचि, छेनारसा, दहिवाइगण, राइता, पिता, पोटलकुरूमा, सुजिवढिखिरि, दहिवरा, पालसोला, अटकालि, भजाशाग प्रभृति नैवेद्य आते हैं। इस प्रकार सारे जगत के रहस्यमय प्रभू श्रीजगन्नाथ मानवीय लीला को परिप्रकाश करके उपरोक्त नैवेद्य को ग्रहण करते हैं सारे संसार के सभी जीवों के दुखों को ध्वंस्त करके अखण्ड आनन्द को वितरित करते हैं।

पुरी से डॉ. हरेकृष्ण सतपथी

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