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नव संवत्सर

नव संवत्सर

By श्रीकृष्ण मुदगल

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हम नव संवत्सर के रूप में मनाते हैं। ब्रह्म पुराण के निम्न श्लोक

चैत्र मासे जगद ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि।       
शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्यादय सति।।

के अनुसार चैत्र मास के प्रथम दिन प्रथम सूर्योदय होने पर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी। इस तथ्य की पुष्टि सुप्रसिद्ध ज्योतिषी भास्कराचार्य द्वारा रचित ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि’ बारहवीं शताब्दी से भी होती है। इसके अनुसार लंका नगर में सूर्यौदय के क्षण से साथ ही चैत्र मास शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन से मास, वर्ष, युग आरम्भ हुए।  अत: नववर्ष का आरम्भ  इसी दिन से होता है। भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि लगभग एक अरब, पचानवें करोड़, अठावन लाख, पचासी हजार, एक सौ सत्रह वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को इस सृष्टि का जन्म  हुआ था। भारतीय काल गणना के इस आंकड़े को अब पाश्चात्य खगोलशास्त्री भी सही मानते हैं।  सृष्टि के आरम्भ  से अब तक छ: मनु अर्थात छ: इन्द्र हो चुके हैं।  प्रत्येक मन्वन्तर या इन्द्र के समय में 71 बार सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग होते हैं। इस प्रकार 3,67,20,000 वर्षों में एक मनु या इन्द्र बदल जाता है और प्रलय होती है। इस समय सातवां मन्वन्तर या इन्द्र चल रहा है। इसमें सत्य, त्रेता, द्वापर 28 बार आ चुके हैं और 28वां कलियुग चल रहा है। जब 71 बार सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग व्यतीत हो जाएंगे तब प्रलय काल होगा, यह शास्त्र सम्मत मान्यता है। यह विश्वास काफी पुराना है। ब्रह्मगुप्त (सातवीं शाताब्दी) तथा भास्कराचार्य (बारहवीं शताब्दी) के ग्रन्थों में इसकी चर्चा है। ब्रह्मगुप्त काफी प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। उनके ग्रन्थों का अनुवाद अरबी भाषा में भी हुआ। इस अनुवाद ने पश्चिुमी देशों को नये सिरे से विचार करने के लिए विवश कर दिया था। उनकी पुस्तकों में इस विश्वास के उल्लेख से जान पड़ता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही वर्षारम्भ की तिथि है।

हमारे वैज्ञानिकों ने समय की सबसे बड़ी ईकाई कल्प को माना है। एक कल्प में 432 करोड़ वर्ष होते हैं। एक हजार महायुगों का एक कल्प होता है। इसी के आधार पर मन्वन्तर या चतुर्युग की समय सारिणी बनाई है।  इस समय स्वेत बाराह कल्प चल रहा है। इस कल्प का वर्तमान वैवस्वत्रम का सातवां मन्वन्तर है। अर्थात् 71 महायुगों में 28 सत्य, त्रेता, द्वापर व्यतीत हो चुके हैं और 28वां कलियुग का 5,240वां वर्ष चल रहा है।  अभी तक विश्व भर के वैज्ञानिक काल गणना के संबंध में जो भी अनुसंधान कर चुके हैं वे सभी हमारी भारतीय संस्कृति द्वारा निर्धारित काल गणना को मानने के लिए विवश हो चुके हैं और हमारी काल गणना की प्रामाणिकता को स्वीकार कर चुके हैं।

संवत्सर सृष्टि के प्रारम्भ होने के दिवस के अतिरिक्त अन्य पावन तिथियों, गौरवपूर्ण राष्ट्रीय सांस्कृतिक घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ है।  ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करते समय इस तिथि को प्रवर घोषित किया था। अत: महत्वपूर्ण कार्य इसी तिथि को आरम्भ  किए जाते हैं। इस तिथि का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व तो है ही, प्राकृतिक महत्व भी है। हमारे दशावतारों में प्रथम अवतार मत्स्यावतार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हुआ था। भगवान राम के पूर्वज सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था। इसी दिन उन्होंने रोहितिक (वर्तमान रोहतक हरियाण) को अपनी राजधानी बनाई थी और इसी दिन उन्होंने नागार्जुन नामक सम्वत आरम्भ किया था। दशरथनन्दन राम का राज्याभिषेक भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हो ही हुआ था। महाभारत युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था और इसी दिन उन्होंने युधिष्ठिर संवत आरम्भ किया था।  सातवाहन राजा शालिवाहन ने हुणों को परास्त कर राजधानी धारानगर में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शालिवाहन सम्वत आरम्भ किया था। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सम्राट विक्रमादित्य ने अपने शौर्य का परिचय देते हुए शकों को पराजित किया था, तब सभी राजाओं ने मिलकर उन्हें विक्रमादित्य की उपाधि से सम्मानित किया था और सम्राट विक्रमादित्य ने उस अवसर पर उस गौरवमयी विजय को चिरस्थायी बनाने के लिए विक्रम सम्वत आरम्भ किया था, जो भारतीय संस्कृति में सर्वाधिक प्रचलित है। सनातन धर्म को मानने वाले सभी इसी सम्वत के पंचांग को मानते हैं। तिथि, व्रत, त्यौहार, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य/ चन्द्रम ग्रहण, श्राद्ध की तिथियां, जन्म-मृत्यु एवं अन्य शुभ अवसरों के शुभ मुहुत्र्त, विवाह-शादियों के शुभ मुहुत्र्त आदि का विचार इसी पंचांग के आधार पर करते हैं।  सौर/चन्द्र मास की तिथियां, कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष, कब सूर्य उत्तरायण होगा, कब सूर्य दक्षिणायण होगा सभी का निर्णय इसी पंचांग के आधार पर होता है। विक्रम सम्वत के मासों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय अस्त से सम्बन्ध रखते हैं। यही बात तिथि अंश के सम्बन्ध में है। वे भी सूर्य चन्द्र की गति पर आधारित हैं।  विक्रम सम्वत अपने अंग-उपांगों के साथ पूर्णत: वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है।  विक्रम संवत सूर्य सिद्धांत पर चलता है।  भारतीय पंचांग और काल गणना का आधार विक्रम सम्वत है। प्रसिद्ध सन्त वरुणावतार भगवान झूलेलाल का जन्म चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सिन्ध प्रान्त में हुआ था। सिख परम्परा के द्वितीय गुरु अंगददेवजी का जन्म चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष से नवरात्र आरम्भ हो जाते हैं और चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवसम्वत आरम्भ होता है।

विभिन्न समय में विभिन्न नरेशों ने अपने शासनकाल में अपना विजयोत्सव मनाने के लिए तथा अपने राज्याभिषेक के अवसर पर अपने संवत्सर चलाए। वर्तमान में समस्त विश्व  में ग्रेगेरियन कैलेन्डर को मान्यता मिली हुई है, जिसे हम अंग्रेजी कैलेन्डर के नाम से जानते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारे देश में भारतीय संस्कृति के परिपे्रक्ष्य में कैलेन्डर बनाने के लिए प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय पंचांग बनाने के लिए एक समिति का गठन किया, जिसके अध्यक्ष सुप्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक मेघनाद साहा थे। समिति के अन्य सदस्यों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति गौरव प्रसाद, प्रसिद्ध वकील के. एल. दफ्तरी, मराठी दैनिक के सम्पादक जे. एस. करन्डीदकर, शिक्षाविद आर.बी. वैद्य थे। ये सभी भारतीय कालगणना सूर्य सिद्धांत के विरोधी थे। इस समिति का गठन नवम्बर 1952 में हुआ था। इस पंचांग सुधार समिति ने 1955 में अपनी रिर्पोट सरकार को सौंपी। रिर्पोट में विक्रम सम्वत को स्वीकार करने की सिफारिश की थी। इस समिति ने जो पंचांग बनाया वह ग्रेगेरियन कैलेन्डर के अनुरूप था। केवल महीनों के नाम जनवरी, फरवरी, मार्च आदि के नाम चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ … आदि रख दिए। इस समिति के सचिव एन.सी. लाहिड़ी ने औपचारिक रूप से यह पंचांग सरकार को सौंप दिया। सरकार ने ग्रेगेरियन कैलेन्डर को ही सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को इसे राष्ट्रीय कैलेन्डर के रूप में स्वीकार कर लिया। पाश्चात्य अंक ज्योतिष में मुख्यत: तीन मानक वर्ष, मास तथा तारीख होते हैं, जबकि भारतीय ज्योतिष में काल गणना के पांच मानक – तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण होते हैं। इसी कारण इसे पंचांग नाम दिया गया है। विक्रम संवत इसी पंचांग पर आधारित है। पंचांग द्वारा अध्ययन एवं विश्लेषण करके यह जाना जाता है कि किस कार्य को करने के लिए कौन-सा दिन सही है जिसे हम शुभ मुहुत्र्त कहते हैं। भारतीय संस्कृति में काल गणना मात्र गणितीय ही नहीं है, बल्कि यह भविष्य में होने वाली घटनाओं का भी संकेत करती है। प्रत्येक वर्ष अलग संवत्सर होता है और संवत्सर के अलग-अलग नाम होते हैं। संवत्सरों की संख्या साठ है। इनके नाम इस प्रकार हैं – विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्बा, विलम्ब, विकारी, शार्वरी, प्लाव, शुभकृत, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लेवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, नल, पिंगल, कालयुक्त, सिद्धार्थी, रौद्र, दुर्मति, दुन्दीभ, रूधिरोद्धारी, रक्तांश, क्रोधन, क्षय, प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजीत, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, रवर और नन्दन। संवत्सर का नामकरण प्रकृति सापेक्ष होने से हम संवत्सर को प्रकृति का दर्पण भी कहते हैं, क्योंकि संवत्सर के नाम से ही उस वर्ष में होने वाली घटनाओं का पता चल जाता है। वस्तुत: संवत्सर निरा अंकों का खेल नहीं है, वह ऐसा दर्पण है जिसमें प्रकृति का हर अंग साफ-साफ दिखाई देता है। पंचाग के माध्यम से प्रकृति का अति सूक्ष्म अध्ययन और विश्लेषण किया जाता है।

नवसंवत्सर का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व तो है ही, इसका प्राकृतिक महत्व भी है।  इस समय शीतकाल की शीतलता का अन्त तथा ग्रीष्मकाल का प्रारम्भ होता है। जलवायु समशीतोष्ण रहती है। वसन्त के आगमन के साथ ही पतझड़ की कटु स्मृति को भुलाकर नूतन किसलय एवं पुष्पों  से युक्त पादपवृन्द  इस समय प्रकृति का अद्भुत श्रृंगार करते हैं।  पशु-पक्षी, कीट, पतंग, स्थावर, जंगम सभी प्राणी नई आशा के साथ उत्साहपूर्वक अपने-अपने कार्यों में प्रवृत दिखाई देते हैं।  शीत ऋतु के कारण सुप्तावस्था में पड़े जड़-चेतन सभी जाग उठते हैं। पुष्प-पत्तियों को नई ऊर्जा मिलती है। सभी ओर नया सा दृष्टिगोचर होता है।

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