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शहीद भगत सिंह और उनका हिंदी प्रेम

शहीद भगत सिंह और उनका हिंदी प्रेम

भगत सिंह प्रत्येक भारतीय के हृदय में निवास  करते हैं। वह क्रांतिकारी, दूरदर्शी, विचारक, दार्शनिक, अद्भुत राजनीतिवेत्ता और राष्ट्रवादी थे। राष्ट्रवाद और देशभक्ति की जन्म घुट्टी उन्हें अपने इंकलाबी परिवार से ही मिली। उनकी कई पीढय़िां भारत माता की बेडिय़ों को काटने में सदैव तत्पर रही।

बचपन में ही अपने घर में उन्होंने अनेकों पुस्तकों का अध्ययन कर लिया था।

उनका यह समस्त अध्ययन मनोरंजन अथवा ज्ञान वर्धन के लिए नहीं था इसका सदुपयोग उन्होंने भारत की जनता को जगाने के लिए किया।

देश में अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध तो आवाज उठ ही रही थी, इसके साथ-साथ अपनी राष्ट्रीयता और संस्कृति को बचाने के लिए, अपनी भाषाओं को बचाने और सम्मान देने की बात भी जोरों से चल रही थी। इसी भाव को लेकर यह विचार भारत में सुदृढ़ हो रहा था- ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल’

भगत सिंह, भारतेंदु हरिश्चंद्र के इस कथन के प्रबल समर्थक थे। वह प्रत्येक भारतीय भाषा का सम्मान करते थे। उन्होंने भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के वर्चस्व को कभी स्वीकार नहीं किया। उनका विश्वास था कि प्रांतीय भाषाओं का प्रांत में सर्वोच्च स्थान हो और समस्त देश को एक साथ जोडऩे का काम हिंदी कर सकती है।

देशवासी शहीद भगत सिंह के कार्यों और शहादत से भलीभांति परिचित हैं पर उनके जीवन का एक पक्ष यह भी है कि वह हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक थे। इस पक्ष से लोग कम ही परिचित हैं। उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही इसका परिचय दे दिया था। उन दिनों में उन्होंने  हिंदी में एक लंबा लेख लिखा था जो पंजाब की भाषा और लिपि से संबंधित था। यह लेख उन्होंने पंजाब के हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में भेजा था और इस पर उन्हें पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। यह भारतीय भाषाओं के प्रति उनके उद्गार, गहन अध्ययन, विश्लेषण और दूरदर्शिता का परिचायक है। इस अल्प आयु में भाषा और लिपि के जटिल विषयों पर इतनी पैठ और समझ आज भी पाठकों को अचंभे में डाल देती है।

भगत सिंह के विद्यार्थी जीवन के दौरान ही देश में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जोरदार आवाज उठने लगी थी। इसी आवाज में  अपनी आवाज को मिलाते हुए भगत सिंह  सरकारी शिक्षा संस्था को छोड़ नेशनल यूनिवर्सिटी में दाखिल हो गए। इस यूनिवर्सिटी के चांसलर थे- भाई परमानंद। उन्होंने यहां पढ़ाई करते हुए अन्य गतिविधियों के साथ-साथ तीन हिंदी नाटक मंचित किए। इन सभी नाटकों में भगतसिंह नायक की भूमिका में थे। उनमें से प्रथम नाटक था- भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखित ‘भारत दुर्दशा’। इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें यह़ी दर्शाया गया था कि अंग्रेजों के आधिपत्य में भारत की कितनी दुर्दशा हो गई है। दूसरा नाटक था ‘राणा  प्रताप’,जिसमें भगत सिंह ने महाराणा प्रताप की भूमिका को निभाया। यहां यह उल्लेख करना असंगत न होगा कि वह चित्र जिसमें भगत सिंह लड़टांग कर पगड़ी बांधे हुए हैं, इसी नाटक मंडली के एक सामूहिक चित्र से निकाला हुआ है। तीसरा नाटक था ‘चंद्रगुप्त’ जिसमें उन्होंने शक्तिगुप्त का रोल किया था। इसमें उनके जबरदस्त अभिनय को देखकर भाई परमानंद जी ने उन्हें आलिंगन में लेकर यह भविष्यवाणी की थी कि एक दिन भगत सिंह सचमुच देश के शक्तिगुप्त गुप्त बन जाएंगे।

उन्हीं दिनों को याद करके प्रसिद्ध उपन्यासकार यशपाल, जो भगत सिंह के साथ ही थे, ने अपनी पुस्तक सिंहावलोकन में लिखा है, ‘कुछ दिन हम लोगों को नाटक खेलने का खूब शौक रहा। दो नाटक हमने   लाहौर में खेले, फिर गुजरावाला में ….। नाटकों का आरंभ किया था देहरादून में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के मौके पर….।’

इन नाटकों की देशभर में चर्चा होने लगी। इन नाटकों द्वारा लोगों को जागृत करने का प्रयास किया जा रहा था। इससे अंग्रेजी हुकूमत के हाथ-पैर फूल गए और उसने तुरंत इन नाटकों और इस नाटक मंडली पर प्रतिबंध लगा दिया। मगर भगत सिंह भिन्न-भिन्न नाटकों द्वारा आजादी का संदेश घर-घर पहुंचाते रहे। वह लोगों तक पहुंचने का नाटक को एक सशक्त माध्यम मानते थे। भगत सिंह को हिंदी की क्रांतिकारी  कविताओं, गीतों से भी बड़ा लगाव जो। उनका ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ के लिए प्रेम तो  जगजाहिर है। वह धुन में गुनगुनाया करते थे-

इसी रंग में रंग के शिवा ने मन का बंधन खोला

मेरा रंग दे बसंती चोला,माए मेरा रंग दे बसंती चोला

यही रंग हल्दीघाटी में खुलकर था खेला

मेरा रंग दे बसंती चोला, माए मेरा रंग दे बसंती चोला

यह गीत और भगत सिंह तो एक दूसरे से अभिन्न हो गए। इस गीत के बोलों को सुनते ही भगत सिंह का नाम जुबान पर आ जाता है।

भगत सिंह जब मियांवाली जेल में थे तब उन्होंने अपनी कोठरी में एक दीवार पर लिख लिया था –

अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें

सरफरोशी की अदा होती हैं यूं ही  रस्मे।

भगत सिंह को अपने विप्लवी जीवन नेटिक् कर लिखने का समय ही नहीं दिया। उन्होंने देश के लिए जब अपने घर का परित्याग किया तो वह कानपुर में क्रांतिकारियों की टोली में सक्रिय हो गये। उन्हीं दिनों में वहां से एक पत्रिका प्रकाशित  होती थी जिसका नाम था ‘प्रताप’। इस लोकप्रिय पत्रिका के संपादक यशस्वी गणेश शंकर विद्यार्थी थे वह भी क्रांतिकारी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। पत्रिका के संपादक मंडल में भगत सिंह को भी शामिल कर लिया गया। वह इसमें बलवंत नाम से बराबर लिखते रहे। यही नाम उनका पार्टी में भी था। कुछ समय के पश्चात भगत सिंह ने ‘वीर अर्जुन’ में भी काम किया। पंजाब में उन दिनों अंग्रेजों के विरुद्ध और सिख गुरुद्वारा सुधार का अहिंसक आंदोलन चल रहा था। इस आंदोलन के सिलसिले में उन्होंने कई लेख लिखे। इसी अहिंसक आंदोलन के समानांतर हिंसक आंदोलन भी उसी  प्रयोजनार्थ चल रहा था। इन्हीं दिनों इस लहर के बारे अखबारों में यह खबर छपी की इसके 6 नेताओं को 27 फरवरी 1926 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया। भगत सिंह ने इस पर बहुत ही प्रभावशाली लेख लिखा  जिसका शीर्षक  ही रोंगटे खड़े कर देने वाला था-  ‘होली के दिन खून के छींटे’। इसका उल्लेख पत्रकारिता के इतिहास में उपलब्ध है।

भगत सिंह अन्य पत्रिकाओं में भी अपने लेख भेजते रहते थे। उन दिनों में एक पत्रिका छपती थी- ‘महारथी’। अपनी सतनामी कुटिया, सुलर मंडी, लाहौर से महारथी के संपादक को पत्र संख्या 2889, तिथि 3. 4. 28 को लिखा, ‘आपने गुरु राम सिंह के तिरंगे चित्र का ब्लॉक बनवाया अथवा नहीं, यही मैं नहीं जान पाया। कम से कम चित्र तो आपने अभी तक प्रकाशित नहीं किया। मैं समझता हूं कि चित्र के बिना इन लेखों का बहुत कुछ  सौंदर्य कम हो जाता है। शेष लेख भी जो कि मैं शीघ्र ही आपकी सेवा में भेजूंगा, सचित्र ही छपने चाहिए। बहुत से ब्लॉक बने हुए मिल सकेंगे। उनका डाक व्यय तथा कुछ किराया भी देना होगा….। लेख तो

लिख रखे थे परंतु यहां पर राष्ट्रीय सप्ताह में शहीदी दिवस मनाने का प्रबंध किया जा रहा है, इसलिए तब तक लेख न भेज सकूंगा। कृपया क्षमा कीजिएगा…। उत्तर शीघ्र देकर अनुग्रहित कीजिएगा ।

इन्हीं दिनों हिंदी पत्रिका चांद का फांसी अंक छपा। इसके संपादक थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री। इस पत्रिका का एक प्रभाग् था- विप्लव यज्ञ की आहुतियां। इसके लगभग 80 पृष्ठ की समस्त सामग्री भगत सिंह की लिखी बतलाई जाती है। बहुत से लेख छद्म नामों से लिखे गए थे। इसके अंतर्गत चापेकर बंध, कन्हाई लाल दत्त, कूका विद्रोह के नेता सतगुरु राम सिंह, करतार सिंह सराभा, मदन लाल ढींगराअमीरचंद, अवध बिहारी, भाई बालमुकंद  इत्यादि  कई गदरीबाबाओं की शहादत के बारे में लिखा गया था। भगत सिंह ने अपने प्रेरणास्रोत  करतार सिंह सराभा के बारे में लिखा है, ‘आज दुनिया में फिर

प्रश्न उठता है, उनके (सराभा) मरने का लाभ किसे हुआ? वह किस लिए मरे? उत्तर स्पष्ट है-  मरने के लिए मरे। उनका आदर्श ही देश सेवा में मरना था। इससे अधिक वे कुछ नहीं चाहते थे।’

चमन जारे मोहब्बत में उसी ने बागवानी की

कि जिसने अपनी मेहनत को ही मेहनत का

समर जाना

नहीं होता है मोहताज नुमाइश फैज़ शबनम का

अंधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में

शहीद भगत सिंह के लिए हिंदी भाषा एक ऐसा माध्यम था जिस द्वारा उन्होंने अपने  विप्लवी विचारों का भारत में भरपूर प्रसारण किया।

 

डॉ. प्रतिभा गोयल
(लेखिका प्रोफेसर,  पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, हैं)

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