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चला बुलडोजर

चला बुलडोजर

चुनाव आयोग ने 10 मार्च  को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे जारी कर दिए हैं। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शानदार प्रदर्शन किया है। भाजपा ने इस बार उत्तर प्रदेश में एक नारा दिया था, साइकिल रखो नुमाइश में, बाबा ही रहेंगे बाइस में, फिर ट्राई करना सत्ताईस में। इस बार के चुनाव के नतीजों का सार भी कुल मिलाकर यही है। इस चुनाव में जीत ने भाजपा को नये सिरे से संजीवनी दी है। जो लोग ये मान रहे थे कि महंगाई, बेरोजगारी, और महामारी में अव्यवस्था से भाजपा की डबल इंजन की सरकारें अलोकप्रिय हो रही हैं, ऐसी अटकलों को अब विराम मिलेगा। और भाजपा,  जो  बंगाल चुनाव में करारी हार के बाद अनिश्चितता के समंदर में गोते लगा रही थी, अब निश्चिंत हो कर गुजरात और कर्नाटक के चुनाव की तैयारी कर पायेगी। साथ ही ज्यादा विश्वास के साथ सरकारों को चला पायेगी।

इस चुनाव में सबका ध्यान उत्तर प्रदेश की तरफ था। उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया था। सरकार के कामकाज को लेकर असंतोष साफ दीख रहा था। लोग अपना गुस्सा जाहिर भी कर रहे थे। इस गुस्से की गूंज पहले शाहीन बाग के आंदोलन में और बाद में किसान आंदोलन के रूप में बराबर देखने को मिली। छुट्टा पशुओं का भी एक बड़ा मामला था। गोवंश की हत्या पर प्रतिबंध लगने के बाद जानवर जिस तरह भूख से खेत के खेत चर रहे हैं, उसने किसानों की नींद हराम कर रखी है। लोग त्रस्त आ चुके हैं। और इसका समाधान खोज रहे हैं। सरकारी नौकरियों में भर्ती बंद होने से भी युवाओं में आक्रोश पनप रहा है। ये गुस्सा पिछले दिनों हिंसा के रूप में बिहार और इलाहाबाद में सड़कों पर भी फूटा। खुद भाजपा के नेता और मंत्री अपनी सरकार से नाराज दिखे। यही कारण था कि चुनाव के ठीक पहले पिछड़ी जाति के कई नेता बीजेपी छोड़ कर समाजवादी पार्टी में या तो शामिल हो गये या फिर सहयोग करने का ऐलान कर बैठे। इनके बीच योगी आदित्यनाथ को हटा कर किसी और को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की कभी अटकलें भी खूब लगीं। ऐसे में ये सवाल पैदा हो गया था कि क्या योगी आदित्यनाथ फिर से सरकार में वापस आयेंगे या नहीं।

लेकिन दस मार्च को योगी आदित्यनाथ या यूं कहे ‘बुलडोजर बाबा’ ने सबको गलत साबित करते हुए नतीजों पर अपने नाम का बुलडोज़र चला दिया। जो लोग योगी आदित्यनाथ के खिलाफ लहर होने की बात कह रहे थे, अब उन्हें समझ में आ गया होगा कि लहर उनके खिलाफ नहीं बल्कि उनके पक्ष में चल रही थी। 37 वर्षों के बाद ऐसा हुआ है, जब उत्तर प्रदेश में कोई पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने वाली है। इससे पहले ऐसा वर्ष 1985 में हुआ था, जब कांग्रेस पार्टी लगातार दूसरी बार चुनावों में जीती थी।  मार्च 10 को वही कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 2 सीटों पर सिमट कर रह गई।  यानी कांग्रेस उतनी सीटें भी नहीं जीत सकी, जितने चरणों में उत्तर प्रदेश के चुनाव हुए थे।  मतलब 7 सीटें भी नहीं जीत पाई।

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने इन नतीजों से कई नए रिकॉर्ड बनाए हैं। जैसे उत्तर प्रदेश के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा, जब कोई मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद, फिर से इस पद की जिम्मेदारी सम्भालेगा। वोट प्रतिशत के मामले में भी भाजपा ने अपना 2017 का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। 2017 में उसे 40 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन इस बार उसे 42 प्रतिशत वोट मिले हैं।  जबकि समाजवादी पार्टी को लगभग 32 प्रतिशत, बसपा को साढ़े 12 प्रतिशत और कांग्रेस को पूरे ढाई प्रतिशत वोट भी नहीं मिले। ऐसा भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस उप्र के चुनाव में ढाई कदम भी नहीं चल पाई। उत्तर प्रदेश में भाजपा को लगभग चार करोड़ वोट मिले हैं।  ये कनाडा जैसे देश की की पूरी आबादी से भी ज्यादा है।

इन नतीजों से ये बात साबित हो गई कि प्रो इंकम्बेंसी लहर भी होती है। पंजाब में कांग्रेस के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी लहर थी। तो बाकी के सभी चार राज्यों में बीजेपी को जिताने की लहर चल रही थी। इन चुनावों में उत्तराखंड के चुनावी नतीजों ने सबसे ज्यादा आश्चर्यचकित किया। उत्तराखंड की 70 सीटों में से बीजेपी को 48, कांग्रेस को 18, बीएसपी को 2 और अन्य को भी इतनी ही सीटें मिली है।  उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब कोई पार्टी दोबारा से सरकार बनाने में कामयाब हुई है। इससे पहले उत्तराखंड में एक बार कांग्रेस की सरकार आती थी और एक बार भाजपा की सरकार आती थी।

योगी का बढ़ता रुतबा

योगी आदित्यनाथ की मुख्यमंत्री के तौर पर वापसी और वो भी भारी बहुमत से, बुलडोजर बाबा  को मजबूत कर गई। साथ ही उन्हें मोदी के बाद दूसरे सबसे बड़े जनाधार वाले नेता का रुतबा भी हासिल हुआ। इसको इस चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। मोदी के बाद योगी ऐसे दूसरे नेता हैं जिन्हें न केवल मजबूत नेता माना जा रहा है बल्कि भाजपा  उनमें अपना भविष्य का नेता भी खोज सकती है। और ‘मोदी के बाद कौन’ की पहेली का उत्तर भी मान सकती है। योगी अभी उम्र में पचास के पार नहीं हैं। उनके सामने लंबा राजनैतिक जीवन है। वो भगवाधारी हिंदुत्व के नेता हैं। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर के तौर पर उन्हें भाजपा के दूसरे नेताओं की तरह खुद के हिंदुत्व को साबित करने के लिये सबूत देने की जरूरत नहीं है। अब उनके साथ कड़क और चुनावी रूप में बेहद फड़कते हुए प्रशासक का तमगा भी जुड़ गया है। यानी मोदी की तरह उनमें हिंदुत्व भी है और हिंदुत्व प्लस की दूसरे खूबियां भी। यही कारण है कि अभी से उन्हें मोदी का उत्तराधिकारी घोषित करने की होड़ भी टीवी चैनलों में शुरू हो गयी।

भाजपा को सबका प्यार

भाजपा के पिछले दो दशकों को ध्यान से देखा जाए तो भाजपा के लिए ये कहा जाता था कि वो सिर्फ ऊंची जाति वाले लोगों की पार्टी है और दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिलाएं उसे वोट नहीं देती। लेकिन 2014 के बाद ये ट्रेंड पूरी तरह बदल चुका है।  आज भाजपा को उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा पिछड़ी जातियों के वोट मिले हैं। राज्य की महिला वोटरों ने भाजपा पर सबसे ज्यादा भरोसा किया। इसका एक बड़ा कारण विकास ही है। इन महिलाओं को उज्जवला योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और तीन तलाक जैसे कानून का फायदा मिला। इसके अलावा युवा वोट बैंक भी भाजपा के साथ एकजुट रहा। उत्तर प्रदेश के कुल 15 करोड़ वोटर्स में लगभग सात करोड़ महिला वोटर्स हैं। जबकि 18 साल से 30 वर्ष के साढ़े तीन करोड़ युवा वोटर्स हैं। यानी महिला और युवा वोट बैंक उत्तर प्रदेश में काफी निर्णायक है। और चुनावों में भाजपा को महिलाओं और युवाओं का भरपूर समर्थन मिला है।

ब्रांड ‘मोदी’ का चला सिक्का

इन चुनावों को नए भारत का चुनाव कहना बेमानी नहीं होगा। ये चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे, उनकी ईमानदार छवि और उनके शानदार काम पर जीता गया है। इसीलिए कोई भी विपक्षी नेता उनके सामने ठहर नहीं पाया।  इस चुनाव से ये भी पता चलता है कि कोविड महामारी से दो साल के लम्बे संघर्ष, तमाम लॉकडाउन और आर्थिक मंदी के बावजूद मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है बल्कि ये और बढ़ गई है।

इन नतीजों से विपक्ष के नेताओं को एक नए वोट बैंक के बारे में भी पता चला है और वो है डबल – यानी विकास का वोट बैंक, जिसकी चाबी सिर्फ मोदी के पास है।

प्रधानमंत्री मोदी भारतीय राजनीति के एक ऐसे नेता बन कर उभरे हैं, जो चुनावी खेल को पूरी तरह समझते हैं। उन्होंने परम्परागत राजनीति के सभी बन्धनों और समीकरणों को तोड़ दिया है। ब्रैंड मोदी अब चुनाव में लगभग जीत की गारंटी बन चुका है।

इसमें कोई शक नहीं की भारत में लोग वोट नहीं देते बल्कि अपनी जाति पर मुहर लगाते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने इस जातिगत राजनीति की बेडिय़ों को भी तोड़ दिया है। शायद यही वजह है कि जो पार्टियां जातियों के नाम पर सोशल इंजीनियरिंग करके चुनाव जीतती थीं, उनकी आज स्थिति खराब है।

वर्ष 2007 में 206 सीटें जीत कर मायावती अपनी सोशल इंजीनियरिंग से बहुमत वाली सरकार बनायीं थी लेकिन आज वही मायावती इसी उत्तर प्रदेश में केवल एक सीट पर सिमट कर रह गई है। क्योंकि मायावती की बसपा की जातिगत राजनीति को भाजपा की विकास की राजनीति से मुकाबला मिल रहा है।

मायावती की तरह अखिलेश यादव की राजनीति भी जातियों की इसी सोशल इंजीनियरिंग पर निर्भर रही है। उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम प्लस यादव वोट बैंक पर कई चुनाव जीते।  लेकिन अब एम+वाई का मतलब बदल गया है। अब इसका मतलब मुस्लिम प्लस यादव नहीं, बल्कि मोदी प्लस योगी है। ये फैक्टर, किसी भी जाति और धर्म के फैक्टर से काफी प्रभावी है।

कांग्रेस मुक्त भारत

राहुल गांधी ने परफार्मेंस में जो निरंतरता दिखाई है वो विलक्षण है, पर इस बार की नाकामयाबी में प्रियंका गांधी भी बराबर की हिस्सेदार हैं। वो पार्टी में जान फूंकने आयी थी लेकिन परिणाम बता रहे हैं कि उन्होंने ने उत्तर प्रदेश में पार्टी ही फूंक दी। पार्टी अध्यक्ष अजय लल्लू तक चुनाव हार गए। सीधी बात ये है कि कांग्रेस की छवि एक एंटी हिन्दू पार्टी की बन गयी है और जब तक ये छवि रहेगी, परिणाम भी ऐसे रहेंगे। पंजाब में सिद्धू को भी प्लांट करने में प्रियंका गांधी ने बड़ी भूमिका निभाई थी और सिद्धू कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हुए।

पांच राजों के चुनावी नतीजों ने कई राजनीति दलों की बोलती बंद कर दी है।  चार राज्यों में एक बार फिर से धमाकेदार जीत दर्ज करने के बाद भाजपा ने अपनी राजनीतिक जमीन को और मजबूत कर लिया है। खास कर उत्तर प्रदेश में शानदार प्रदर्शन ने पार्टी के लिए अगले लोकसभा चुनाव में फिर से जीत की उम्मीदें जगा दी है। योगी आदित्यनाथ भाजपा में तेजी से उभरते एक नए ब्रांड है, जो बिल्कुल ब्रांड मोदी की तर्ज पर काम कर रहे हैं। जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने ‘चौकीदार चोर है’ के हमले को ही अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार ‘मैं भी चौकीदार’ बना दिया था वैसे ही योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव के ‘बुलडोजर बाबा’ के नाम से किये गए हमलों को ही अपनी ब्रांड वैल्यू से जोड़ दिया, यूपी की राजनीति में बुलडोजर का मतलब ये हो गया जैसे शोषित ने दबंग शोषक का रूतबा ढहा दिया।


नीलाभ
कृष्ण

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