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योगी का हठ योग बना जीत का जोग

योगी का हठ योग बना जीत का जोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की डबल इंजन सरकार ने उत्तर प्रदेश में 1991 में बहुमत हासिल करने के 26 साल बाद एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी को लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए सत्ता में वापसी कर सिद्ध कर दिया मोदी और योगी है तो मुमकिन है। उप्र में चतुष्कोणीय मुकाबले को दो दलीय बनकर भाजपा ने अपनी रणनीति से समाजवादी पार्टी को मात दे दी। अखिलेश  यादव पूरे जोर शोर से महगाई, कानून व्यवस्था, रोजी रोटी और बुनियादी विकास योजनाओं को लेकर खूब हमला बोला तथा मतदाताओं के सामने पुरानी पेंशन लागू करने फ्री बिजली  जैसे प्रलोभन देते रह गय लेकिन कमजोर रणनीति और पार्ट टाइम राजनीति के कारण अखिलेश का 400 सीटों का नारा उपहास का बिंदु बन कर रह गया। जीत का ताज भाजपा ने पहन लिया। गौरतलब है कि उदय इंडिया में चुनाव की घोषणा के तुरन्त बाद किस में कितनी है दम आलेख में आकंलन कर दिया था भाजपा की वापसी हो रही है लेकिन बीस से तीस प्रतिशत के बीच सीटे कम होगी जो पूरी तरह सच साबित हुआ।

2022 की जीत 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम के मायने के बाद बड़ी अहम है इससे उत्तर प्रदेश में और बीजेपी के भीतर योगी आदित्यनाथ का कद और भी मजबूत हुआ है। 403 विधानसभा सीटों और 80 लोकसभा सीटों के साथ यूपी दिल्ली के सिंहासन पर कौन बैठेगा यह तय करने वाला राज्य है बीजेपी ने चुनाव उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से कानून व्यवस्था के मुद्दे को लेकर लड़ा और योगी के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह,  शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर, प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने यूपी में अपने चुनाव प्रचार के दौरान समाजवादी पार्टी पर गुंडाराज और कानून व्यवस्था को लेकर निशाना साधा। यह रणनीति कामयाब हुई। 39 साल बाद योगी पहले ऐसे सीएम हैं, जिन्होंने अपनी पार्टी को लगातार दूसरी बार जीत दिलाई है। योगी आदित्यनाथ, यूपी के लिए बहुत उपयोगी साबित होने की कहानी इतनी आसान नहीं थी। योगी अर्जुन की भूमिका में उपस्थित थे। व्यूह दर व्यूह रच रहे थे। मतलब पूरा चक्रव्यूह। जयंत चौधरी, ओमप्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे जातीय मोहरों से मुकाबले के लिए। चुनावी रण परवान चढते ही एम वाई फैक्टर, किसान आंदोलन की आग की हवा बनाने के लिए समाजवादी पार्टी ने एनजीओ, यू ट्यूबर और मीडिया को फंडिंग कर के नकली माहौल बना कर, भाड़े की भीड़ की दम पर अखिलेश के आगमन का उदघोष कर दिया। निरंतरता के अभाव में सपा का दाव रंग लाता नहीं दिखा और जमीन पर दिखने लगा-

इन दिनों खेत बदल रहे हैं

उसकी मिट्टी का रंग नया है

उससे उड़ती धूल हवा को रंगीन बना देती है

-शंकरानंद की कविता के भाव बता रहे है कि सब कुछ बदला-बदला सा है। अध्यापक, लेखक, कवि, राजनेता, डॉक्टर, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, व्यापारी, सरकार कर्मचारी, अधिकारी, छात्रा, कलाकार, वकील, घरेलु एवं कामकाजी महिलाएं  किसान, मजदूर आदि भाजपा का राग अलाप रहे है। राजनीति गतिशील है, हर क्षण, हर समय, उसके पहिए घूम रहे हो, या घूमने लग सकते हो, एक संकेत मात्रा से सिवाय इतना कहकर चुनावी दैनंदिन कामकाज कर जीत हासिल हो जायेगी, जनता आपसे सम्मोहित हो कर वोट दे देगी इस मुगालता को भाजपा ने दूर किया है। 90 के दशक में ‘बसपा’ एवं ‘मंडल कमीशन’ के कारण इसकी सामाजिक स्तर पर स्वीकृति-अस्वीकृति की जो  प्रक्रियाएं शरू हुईं, वह आज भी जारी है। भारतीय समाज की मानसिकता को बदलने का यह सवाल, सफलता-असफलता का नहीं है; भारतीय समाज की मानसिकता को बदलने का है। दलितों और पिछड़े वर्ग के सामाजिक आंदोलन एक जाति विशेष तक सिमट कर रह जाने के कारण ही संगठन मंत्री सुनील बंसल के मार्गदर्शन में  भाजपा को अपनी नीति और रणनीति पर काम करने का अवसर मिला। सिर्फ ‘जातीय  के आधार पर कोई भी दल सत्ता की सीढ़ी पर नहीं पहुच सकता है।  पिछड़े वर्ग के कुछ नेताओं ने ‘आरक्षण’ को खत्म करने का प्रपंच कर भाजपा की गति को कम करने की कोशिश में अपनी ही गति अवरूद्ध कर ली न घर के रहे न घाट के रहे। साहित्य परिषद के राष्टीय महामंत्री डा.  पवनपुत्र बादल कहते है कि वामपंथीयों के  सनातन ‘धर्म’ के प्रति प्रति्िरक्रयावादी विचारों से सामाजिक मुक्ति के अभियान ने जनमानस के मानस को बदलने में सार्थक भूमिका अदा की। जीवनशैली के रूप में ही नहीं। अपितु ‘सत्ता’ का नियंत्राणकारी तत्व बनकर सामाजिक संरचना का हिस्सा बनाया है। सामाजिक न्याय के सवाल तथा राजनीतिक हिस्सेदारी में भागीदारी देकर समाजवादी पार्टी,बसपा तथा कांग्रेस रूपी विकल्प के सारे रास्ते एक-एक कर समाप्त कर लोगों के मन में अपना भविष्य भाजपा में ही देखने की चाहत जगा दी। आर्थिक, राजनीतिक समानता का सपना दिखाने वाले दल बेमानी  हो गये है। आने वाले एक-दो दशकों तक के लिए अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी है। जनोन्मुख आंदोलन धीरे-धीर राष्ट्रीय महत्व  के आधार पर अपना प्रभाव समाज का समग्र कायापलट करता है। प्रतियोगी दलों के राष्ट और धर्म के प्रति घोर उदासीनता एवं उपेक्षा का भाव रहा है। नि:संकोच कह सकते है कि भारतीय जीवन शैली, धर्म, कला, संस्कृति, भाषा, साहित्य, शिक्षा, अध्यात्म, तथा समाज के रीती-रिवाज, परस्पर सरोकार, राजनीति, विज्ञान, भारत के बारे में दृष्टि, बहुआयामीय होने के कारण आत्मावलोकन के बाद युवा पीढ़ी ने अत्यंत साहस एवं बेलौसपन के साथ स्वयं को भूमंडलीकरण, निजीकरण और संचार साधनों के अत्यधिक उत्कर्ष के समय में अपने आपको राष्ट्रवाद से जोड़ा है। भाजपा ने अपने अंाकलन मे सावधानी एवं सतर्कता बरती उसकी रूप-संरचना में कई तरह के प्रयोग किए हैं। राजनीतिक, सामाजिक और जातिगत सरोकार, अनेक घटनाक्रम, गतिविधियों के साथ कई निजी घरेलू पारिवारिक प्रसंगों, मानसिक उधेड़बुनों, अंतद्र्वंद्वों का अत्यंत मार्मिक एवं यथार्थपरक अंाकलन कर तीन तलाक की तत्कालिक परम्परा पर रोक के लिए बिल लाये। राम मंदिर का निर्माण और काशी के संदेशों को भी पार्टी बहुसंख्यक मतदाताओं तक पहुंचाने में कामयाब रही। प्रतिपक्षीयों ने अयोध्या में डीएम आवास के संकेतक बोर्ड के साथ, भगवा, हरा और फिर लाल रंगों में परिवर्तित कर सातवे चरण को प्रभावित किया गया।  मोदी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से ही नीति, नीयत तथा निष्ठा पर काम करने वाली पार्टी है। भाजपा ने सबका साथ लेकर सभी का विकास किया। भाजपा की नीयत है – सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास। भाजपा की नीति है – जो भी योजनाएं बने, वो हर लाभार्थी तक पहुंचे और बिना बिचौलिए के पहुंचे। भाजपा का हर काम निष्ठा वाला होता है। हम बिना किसी भी भेदभाव के योजनाओं को सभी तक पहुंचाते हैं। यही हमारी निष्ठा है।

भाजपा ने कानून व्यवस्था और विकास व रोजगार के मुद्दों पर विपक्ष को करारा जवाब दिया। एक ओर जहां विकास दुबे, मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद के खिलाफ भाजपा की आक्रामकता को पार्टी की ओर से सुदृढ़ कानून व्यवस्था का प्रतीक बनाया गया तो योगी को बुलडोजर बाबा का तमगा देकर उन्हें एक अलग और सशक्त छवि के रूप में प्रस्तुत किया। यहां तक कि चुनावी सभाओं तक में योगी के बुलडोजर दिखाये गए। योगी को एक बाबा जरुर निरुपित किया गया, लेकिन ऐसा बाबा, जो किंवदंतियों, रुढिय़ों और मिथकों को तोडऩे का साहस रखता है। उनके नोएडा के दौरों को भी नाटकीय तौर पर साहसिक कदमों के रुप में पेश किया गया। उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तड़के और डबल इंजन की सरकार के नारे ने जनता को लुभाया है। 10 मार्च को मतपेटियों से निकले नतीजों से भी परिलक्षित हुआ है। भाजपा की एक और बड़ी सफलता मायावती की बहुजन समाज पार्टी के दलित वोटों में सेंध लगाने के साथ समाजवादी पार्टी की ओर जाने से रोका। बहुसंख्यक मतदाताओं के मन में राष्ट्रवाद और उग्र हिंदुत्व की लालसा का ज्वर पैदा किया। दूसरी ओर लाभार्थी वर्ग का नया प्रयोग किया जिसमें सस्ते घर, सस्ते राशन और एक्सप्रेस वे और डिफेंस कारीडोर जैसे कदमों के सामने विपक्ष के बेरोजगारी, कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों की धार को कुंद कर दिया।

अगर राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो एक बात सामने आ रही है कि अखिलेश इस बार अल्पसंख्यकों के वोटों का ध्रुवीकरण कराने में सफल रहे हैं तो कांग्रेस की प्रियंका गंाधी राष्ट्रवाद के नारों के आगे अपना आधार खोती नजर आयी। राम स्नेही यायावर के शब्दो में-

कुरूक्षेत्र प्रश्नों का लगता हर पल जीवन का

स्वयं पार्थ को चिंता करनी होगी उत्तर की।

 

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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