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विधानसभा चुनावों के राजनीतिक संकेत

विधानसभा चुनावों के राजनीतिक संकेत

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों और उनके नतीजों को लेकर तरह-तरह से व्याख्याएं की जा रही हैं। हर चुनाव और उनके नतीजों की तरह-तरह से व्याख्या और विश्लेषण कोई नई बात नहीं है। यह बात और है कि आज के दौर में हर व्याख्या और विश्लेषण के पीछे अति प्रचलित नैरेटिव और वैचारिक मान्यताएं ज्यादा प्रभावी होती गई हैं। इसीलिए पांच राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की जीत को अपने ढंग से व्याख्यायित किए जाने की कोशिश की जा रही है। जिसमें भारतीय जनता पार्टी को जीतने के बावजूद हारा हुआ बताया जा रहा है। ममता बनर्जी ने इसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का भी आयाम जोड़ दिया है। यह बात और है कि अक्सर भारतीय जनता पार्टी की चुनावी जीत के बाद हतप्रभ रहने वाली बौद्धिक जो ताकतें अतीत में इसके लिए ईवीएम में हेराफेरी को ही जिम्मेदार बताती रही हैं, वे इस बार चुप हैं। ईवीएम को लेकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी चुप्पी साध रखी है। जबकि मतगणना के कुछ दिन पहले ईवीएम को लेकर वाराणसी आदि कुछ जगहों पर उठे विवाद के बहाने इस मशीन पर निशाना जरूर साधा था।

चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की वापसी के संकेत साफ हैं। इन चुनावों में नरेंद्र मोदी का सिक्का एक बार फिर चला है। वैसे तो 2013 में प्रधानमंत्री पद का भारतीय जनता पार्टी की ओर से दावेदार बनाए जाने के बाद से ही चुनावी राजनीति में उनके नाम का सिक्का चल रहा है, इस बार फिर साबित हुआ है कि भारतीय जनता पार्टी के वे अकेले बड़े चेहरे हैं। उत्तराखंड और मणिपुर में उन्होंने जिस तरह चुनावी हवा को भारतीय जनता पार्टी में बदला, उससे स्पष्ट है कि केंद्रीय स्तर पर शुरू उनके दिमाग की उपज कल्याणकारी योजनाओं के साथ ही विदेशी धरती पर भारत की बढ़ती धमक की वजह से उनकी लोकप्रियता ही नहीं विश्वसनीयता बरकरार है। उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी के भी अंदरूनी सूत्र भी अपनी वापसी का भरोसा नहीं कर पा रहे थे। आपसी बातचीत में वे जीत के प्रति आश्वस्त तक नजर नहीं आ रहे थे। इसकी वजह उत्तराखंड की परंपरा भी रही है, जहां मतदाता एक बार कांग्रेस और दूसरी बार भारतीय जनता पार्टी को चुनते रहे हैं।

पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव वैश्विक महामारी कोरोना की वजह से उपजी आर्थिक और सामाजिक दुश्वारियों की पृष्ठभूमि के साथ ही किसान आंदोलन की छाया में हुए थे। कोरोना के दौरान अचानक हुए राष्ट्रीय तालाबंदी के चलते लोगों का पलायन बढ़ा। दुर्योग कहें कि देश के औद्योगिक महानगरों में जो बुनियादी कार्य शक्ति है, वह उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से पलायित हो चुके लोगों की है। इस कार्यशक्ति वाले हाथों के सामने तालबंदी के चलते जब लगा कि रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है तो वे पैदल ही अपने गांवों की ओर लौट चले। इन लोगों के पलायन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को जिम्मेदार बताया गया। उनकी दुश्वारियों और परेशानियों के लिए बार-बार मोदी सरकार के साथ ही राज्य सरकारों को भी जिम्मेदार ठहराया गया। इसी बीच नवंबर 2019 में किसान आंदोलन शुरू हो गया, जिसे पहले पंजाब की सत्ता पर काबिज कैप्टन अमरिंदर सिंह ने परोक्ष समर्थन दिया। जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ता गया, वैसे-वैसे भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी विरोधी धुरी की पूरी राजनीतिक और सामाजिक जमात, स्वयंसेवी संगठन इस आंदोलन में जुट पड़े। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने खुलकर इस आंदोलन का साथ दिया। इसके चलते आंदोलनकारी बंगाल के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के विरोध में प्रचार करने भी पहुंचे। किसान दिल्ली की सीमाओं तक महीनों तक जमे रहे, 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर उनके कुछ शातिर तत्वों ने उत्पात मचाया। दिल्ली में घुसते किसानों ने पुलिस और रिपोर्टरों से मारपीट की। इस वजह से माना जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में मशक्कत करनी पड़ सकती है। किसान आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के खीरी इलाके में बवाल हुआ। लेकिन चुनाव नतीजों में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में 41.29 प्रतिशत, उत्तराखंड में 44.33 प्रतिशत, गोवा में 33.31 फीसद और मणिपुर में 37.83 प्रतिशत मतों के समर्थन के साथ वापस लौटने में कामयाब रही। जबकि सीमावर्ती राज्य पंजाब में आम आदमी पार्टी ने 42.01 प्रतिशत मत के साथ बंपर जीत हासिल करने में कामयाब रही।

भारतीय चुनावों के बारे में यह मान्यता है कि वह जाति और धर्म के बंधन में ही बंधा रहता है। निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश में यादव और मुसलमान मतों का ज्यादातर हिस्सा भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ समाजवादी पार्टी को गोलबंद होकर मिला। लेकिन इन चुनावों में जाति और धर्म की बेडिय़ां टूटती भी दिखीं। इन चुनावों में एक नया वोट बैंक बनता दिखा। जिसे लाभार्थी वोट बैंक कह सकते हैं। कोरोना काल में मिले मुफ्त राशन के साथ ही अकेले उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 45 लाख मकान दिया जाना मामूली बात नहीं है। 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में करीब तीन करोड़ 44 लाख लोगों ने वोट डाले थे। लेकिन उत्तर प्रदेश में मुफ्त राशन, किसान सम्मान निधि, महिलाओं के जनधन खाते में कोरोना के दौरान मिली राहत रकम, शौचालय आदि के जरिए जो लाभकारी योजनाएं दी गईं, उनके लाभार्थियों की संख्या ही करीब पौने चार करोड़ को पार कर गई। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की हालत में लगातार आते सुधार के साथ ही पिछली सरकारों की तुलना में बेहतर विकास की योजनाओं ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में वोटरों की गोलबंदी की वजह बनी। उत्तराखंड में बेशक प्रधानमंत्री की सभाओं से भाजपा को लाभ हुआ, लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस की अंदरूनी गुटबंदी ने उसे बहुत नुकसान पहुंचाया। उत्तराखंड के पूरे पांच साल के शासन के दौरान भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगना, उत्तराखंड में सड़कों की हालत में सुधार, केदारनाथ धाम का पुनरूद्धार, चार धाम को जोडऩे वाले हाईवे का निर्माण जैसे कार्य भी भाजपा के पक्ष में गए। एक दशक पहले मणिपुर के एक मंत्री ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि उनकी कैबिनेट की बैठक पैसे के आपस में बंटवारे के लिए होती है। उस मणिपुर में स्थितियां बदलीं। वहां भी विकास की बयार पहुंची, पूर्वोत्तर पर अलग से ध्यान देने का असर यह हुआ कि वहां भी सड़कों की स्थिति में सुधार हुआ। इसका असर भी भारतीय जनता पार्टी के समर्थनक आधार के रूप में वहां मिला। कुछ ऐसी ही स्थिति गोवा की भी रही। वैसे गोवा में माना जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की हार सुनिश्चित की। गोवा में कांग्रेस को जहां 23.04 प्रतिशत वोट मिला है, वहीं आम आदमी पार्टी को 6.77 फीसद और तृणमूल को 5.21 प्रतिशत। जाहिर है कि अगर वोटों का यह बिखराव कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा बना है। यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि जहां उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मणिपुर में लगातार दूसरी बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है, वहीं गोवा में लगातार तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी सत्ता में वापस लौटी है।

पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत के पीछे वहां बारी-बारी से सत्ता में रही शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा रहा। पंजाब का ज्यादातर मतदाता दोनों ही दलों को भ्रष्टाचार और राज्य में नशाखोरी की बढ़ती लत के लिए सीधे जिम्मेदार बताता रहा। उन्हें आम आदमी पार्टी के रूप में तीसरा विकल्प मिला और आम आदमी पार्टी का झाड़ू पूरे राज्य में इस सफाई के साथ चला कि शिरोमणि अकाली दल मात्र तीन सीटों पर सिमट गया, जबकि सत्ताधारी कांग्रेस को महज 18 सीटों से संतोष करना पड़ा। पंजाब में भारतीय जनता पार्टी के बारे मतदाता यह मानते रहे कि वह शिरोमणि अकाली दल की पिछलग्गू रही है। जाहिर है कि इसके प्रति मतदाताओं की नकारात्मक सोच के घेरे में भारतीय जनता पार्टी भी रही। वहां का आम मतदाता भारतीय जनता पार्टी को शिरोमणि अकाली दल की बी टीम मानता रहा है। पंजाब का आम मतदाता मानता है कि नशाखोरी की लत को बढ़ावा देने के पीछे कांग्रेस के कुशासन के साथ ही शिरोमणि अकाली दल की मिलीभगत का हाथ रहा है।

इस चुनाव ने कुछ संकेत दिए हैं। मसलन जनता आंदोलनकारी का साथ दे सकती है, लेकिन वोट देने की जब बात होगी तो उसे राजनीतिक दल चाहिए। वह भी उसकी नजर में भरोसेमंद, जो उसकी भावी चुनौतियों को सहज कर सके और उसकी आकांक्षाओं की पूर्ति कर सके। यह सोच नहीं होती तो उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जैसे किसान आंदोलन प्रभावित इलाके की सारी सीटें भारतीय जनता पार्टी नहीं जीत पाती । इसी तरह पंजाब में किसान आंदोलनकारियों के 22 संगठनों ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन उनके प्रत्याशियों की जमानत तक नहीं बची।

उत्तर प्रदेश में पूरे साढ़े तीन साल तक प्रियंका गांधी की अगुआई में कांग्रेस विपक्षी भूमिका में रही। हाथरस और उन्नाव कांड की चाहे जो भी हकीकत हो, इस बहाने प्रियंका और उनकी कांग्रेस लगातार सड़कों पर रही। आगरा आदि में भी उन्होंने प्रदर्शन किया। पूरे कोरोना काल में अखिलेश यादव कहीं नजर नहीं आए, सिवा ट्वीटर के। लेकिन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पर जनता ने भरोसा नहीं किया, बल्कि समाजवादी पार्टी का साथ दिया। इससे स्पष्ट होता है कि कोई दल चाहे कितना भी आंदोलन कर ले, जनता अपना भविष्य उसे सौंपना चाहती है, जिसमें दम हो। वह दम उस दल के कैडर के जरिए जनता की नजर में चढ़ता है। कांग्रेस इस मामले में पीछे रही।

उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की कहानियां खूब प्रचारित की गईं। चंद्रशेखर रावण के रूप में नए और ओजस्वी दलित चेहरे को उभारा गया। लेकिन चंद्रशेखर की कौन कहे, उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहीं और देश का दलित चेहरा मायावती की कोशिशों के बावजूद पार्टी का सिर्फ खाता ही खुल सका। राज्य की सत्ता पर एक बार पूर्ण बहुमत से और चार बार सहयोग से काबिज होने वाले दल को मह 12.88 प्रतिशत समर्थन मिलना साबित करता है कि अगर बहुजन समाज पार्टी ने अपना रवैया नहीं बदला तो उसकी भी रामकहानी में बहुत पेच आएंगे।

1984 के आम चुनावों में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने वैजयंती माला बाली, अमिताभ बच्चन और सुनील दत्त जैसे बालीवुड कलाकारों के जरिए चमक-दमकभरी राजनीति की शुरूआत की थी। इसमें वे सफल भी रहे थे। लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनाव में उसी कांग्रेस ने कई फिल्म कलाकारों आदि पर दांव लगाया। लेकिन वे खेत रहे। यही हाल समाजवादी पार्टी का भी रहा।

उत्तर प्रदेश के चुनावों में जाति का कार्ड उन जगहों पर चलता नजर आया, जहां समाजवादी पार्टी ने किसी खास जाति के मजबूत चेहरे को उतारा था।

इस चुनाव ने यह भी साबित किया है कि अहंकार की भाषा को लोकतांत्रिक समाज स्वीकार नहीं करता। सभाओं में उमड़ती भीड़ देख अखिलेश की रूक्ष होती भाषा को वोटरों ने एक बार फिर बदअमली की वापसी की आशंका के तौर पर लिया और समाजवादी पार्टी तमाम बढ़त के बावजूद भाजपा से पीछे रही। वैसे कह सकते हैं कि यह जीत सबका साथ और सबका विश्वास के विचार की है, जिसकी बुनियाद पर हाल के दिनों में एक ऐसा भारत खड़ा हो रहा है, जिसकी आर्थिक और राजनीतिक धमक देश के बाहर भी गंभीरता से सुनी जा रही है।

इन चुनाव नतीजों के चलते भविष्य में कुछ समस्याएं भी खड़ी होने वाली हैं। आम आदमी की जो राजनीतिक शैली रही है, उसकी वजह से इस सीमावर्ती राज्य में कानून व्यवस्था संभालना और परोक्ष विदेशी हाथों पर लगाम लगाना आम आदमी पार्टी की सरकार की बड़ी चुनौती होगी। दबी जबान से माना जाता है कि आम आदमी पार्टी को आर्थिक सहयोग कनाडा और विदेश स्थित संदेहास्पद शक्तियों से मिला है। जाहिर है कि वे आने वाले दिनों में अपने ढंग से आम आदमी पार्टी की सरकार को चलाने की कोशिश करेंगी। इस बीच पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की निगाह लगी ही हुई है। वह राज्य में अशांति और इसके जरिए व्यवस्था को बदहाल करने की कोशिश करेगी, जिससे पार पाना आम आदमी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।

भारतीय जनता पार्टी के लिए लाभार्थी वर्ग को खुश रखना, मुफ्त राशन की व्यवस्था बनाए रखना और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं की ओर आगे बढ़ते रहना ही होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ और इनमें व्यवधान आया तो मतदाताओं को नाराज करने की कोशिश समाजवादी पार्टी की ओर से होगी। वैसे भी वह उत्तर प्रदेश में मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी है। इसलिए वह सरकार को चैन से बैठने नहीं देगी।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

 

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