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मोदी के असली दुश्मन

मोदी के असली दुश्मन

By प्रकाश नंदा

आम धारणा के तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे बड़ी संपत्ति उनकी प्रतिबद्धता, दृढ़ विश्वास और भारत के विकास की वचनबद्धता है। सरकार के सत्ता संभालने के लगभग 10 महीने बाद ही यह धारणा बदलने लगी है तो इसके पीछे अपने लोगों में छिपे उनके दुश्मन हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के इस बयान से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि उनके दुश्मनों में एक तरफ उनके संगठन वाले दल से हैं तो दूसरी तरफ सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और उसके वैचारिक संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हैं।
एक अतिविश्वसनीय सूत्र ने मुझे बताया कि संघ के कुछ हिंदुवादी नेता मोदी और जम्मू-कश्मीर भाजपा को पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाने को लेकर धमका रहे हैं। मोदी और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) सुप्रीमो मुफ्ती मोहम्मद सईद, दोनों इस बात से सहमत हैं कि जम्मू-कश्मीर में पिछले विधानसभा चुनावों में मुस्लिम बहुल कश्मीर और हिंदू बहुल जम्मू के लागों ने राज्य में शांति, स्थायित्व, विकास और जम्मू-कश्मीर को शेष भारत से जोडऩे वाले पुल के लिए ऐतिहासिक अवसर उपलब्ध कराया है। मोदी और सईद ने राजनीति से अधिक व्यावहारिकता को रेखांकित किया है। यह उल्लेखनीय है कि सईद, जो कि भाजपा के उप-मुख्यमंत्री के साथ अगले छह सालों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहेंगे, विवादास्पद आम्र्ड फोर्सेज (स्पेशल पावर्स) ऐक्ट, जो सुरक्षाबलों को विशेष शक्तियां देता है, पर व्यावहारिकता को देखते हुए झुके। लेकिन, ऐसा ही हिंदूवादी संघ के नेताओं के बारे में नहीं कहा जा सकता, जिनका तर्क है कि संविधान से अनुच्छेद 370 के हटाने के मुद्दे पर भाजपा को झुकना नहीं चाहिए, जो अन्य राज्यों के विपरीत जम्मू-कश्मीर को अपेक्षाकृत स्वायतता प्रदान करता है। व्यक्तिगत तौर पर मैं भी अनुच्छेद 370 के खिलाफ हूं। मैंने इस अनुच्छेद के बारे में कहीं और लिखा था कि एक अस्थायी व्यवस्था जम्मू-कश्मीर के लोगों को देश की मुख्यधारा में नहीं ला सकती। लेकिन, पिछली विधानसभा चुनावों में अनुच्छेद 370 की समाप्ति को भाजपा ने अपना मुद्दा नहीं बनाया। अनुच्छेद 370 पर भाजपा ने राष्ट्रीय बहस कराने की बात कही थी। बहस का मतलब पूरी तरह से समाप्ति नहीं होता। किसी भी स्थिति में अनुच्छेद 370 एक दीर्घकालिक प्रसंग बनने जा रहा है। इस मामले में संघ के नेताओं द्वारा मोदी पर अनावश्यक दबाव डालना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस प्रक्रिया में वे मोदी की छवि को धूमिल और सरकार में प्रधानमंत्री की गरिमा को कम कर रहे हैं।

अब दूसरे मुद्दे, भूमि अध्यादेश पर आते हैं। इस अध्यादेश को मोदी सरकार द्वारा लाया गया था, जिसमें रक्षा, गरीबों के लिए मकान और सड़क जैसे आधारभूत ढांचे के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में 70 प्रतिशत भू-स्वामियों की सहमति वाली धारा को हटा दिया गया था। इसके तहत सरकार या सरकारी वर्चस्व वाले उसके निजी साझेदारों द्वारा किसानों या भू-स्वामियों से भूमि की सामान्य मूल्य से 400 प्रतिशत अतिरिक्त मूल्य की क्षतिपूत्र्ति देकर ले लिया जाएगा। मैं यहां अध्यादेश की विशेषता या उसकी खामियों पर चर्चा करना नहीं चाहूंगा, लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह अध्यादेश केन्द्रीय मंत्रीमंडल द्वारा सिफारिश करने के बाद राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित किया गया था। इस मंत्रीमंडल में सहयोगी दलों, शिवसेना, अकाली दल और लोक जनशक्ति पार्टी के भी सदस्य शामिल हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो भू-अध्यादेश पूरे मोदी मंत्रीमंडल की सामूहिक जिम्मेवारी का मामला है या कह लें तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का मामला है। अब जबकि इस पर संसद की मुहर लग चुकी है, अन्य सहयोगियों की अपेक्षा भाजपा की अधिक जिम्मेदारी है कि इसके उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कार्य करे। लेकिन, मामला इसके विपरीत है। अब इस अध्यादेश के खिलाफ शिवसेना आंदोलन की धमकी दे रही है। हालांकि अन्य सहयोगी इतनी अधिक उदंडता नहीं कर रहे हैं, लेकिन अध्यादेश के खिलाफ उनकी सार्वजनिक प्रतिक्रिया संसदीय लोकतंत्र में मंत्रिमंडलीय प्रणाली धर्म के खिलाफ है। मेरे विचार से, मोदी को आत्म-विश्लेषण करना चाहिए कि ऐसे सहयोगियों की जरूरत है या नहीं, खासकर शिवसेना जैसे दल की? जितनी जल्दी सत्ताधारी एनडीए से शिवसेना को बाहर किया जाएगा, उतना ही सरकार और एनडीए के लिए बढिय़ा होगा। यह भी सच है कि एनडीए से शिवसेना की विदाई महाराष्ट्र में भाजपा के मुख्यमंत्री के भाग्य का निर्धारण भी करेगा, लेकिन मेरा मानना है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार को मैनेज करना एक विकल्प हो सकता है, जोकि जाहिरा तौर पर एनडीए में शामिल होने के लिए बेताब दिखते हैं। कम से कम विकास पर आधारित नीतियों के मामले पर मोदी और पवार दोनों के समान दृष्टिकोण हैं।
मैंने पिछले आम चुनावों के बारे में स्पष्ट रूप से कहा था कि लोगों ने भाजपा को नहीं मोदी को वोट दिया है। लोगों ने मोदी को इसलिए वोट दिया क्योंकि उन्होंने विकास और समृद्धि की बात कही, गरीबी का महिमामंडन नहीं किया। भाजपा से अलग, मोदी का आर्थिक दृष्टिकोण नेहरू के आर्थिक दृष्टिकोण से पूरी तरह अलग है। दूसरे शब्दों में कहें तो बहुत सारे मोदी समर्थक प्रधानमंत्री को रूढि़वादी आर्थिक नीतियों के साथ प्रयोग का मौका देना पसंद करेंगे, जैसा कि ब्रिटेन में कन्जर्वेटिव सरकार, अमेरिका में रिपब्लिकन सरकार और जर्मनी में क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक सरकार कर रही है।

वे भारत के कृषि आधारित देश होने की भावनात्मक बातें करते हैं। यद्यपि तथ्य यह है कि कृषि ने भारत को कभी नाम, पहचान, समृद्धि नहीं दी। यहां तक कि ब्रिटेन का उपनिवेश बनने से पहले भी भारत में सभी संपदा व्यापार द्वारा ही कमाए गए थे। उस समय भारत का व्यापार भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर पूरे विश्व में फैला हुआ था। ब्रिटीश उपनिवेश बनने से पहले भारत की अर्थव्यवस्था चीन के साथ-साथ ब्रिटेन से भी धनी थी। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था के कुल सकल घरेलू उत्पाद की आधी से भी अधिक थी। हम कृषि उत्पादों के निर्यातक कभी नहीं रहे, खासकर खाद्य सामग्रियों के। इसमें कोई शंका नहीं है कि हमारे ग्रामीण जनों के पास पर्याप्त खाद्य सामग्रियां होती थीं, लेकिन एक व्यापारिक देश के रूप में हम फारस की खाड़ी से मोतियों, ऊन, मेवे, खजूर, गुलाब जल का आयात करते थे। कॉफी, सोना, ड्रग्स और मधु अरब के देशों से आयात करते थे। चीन से चाय, चीनी और सिल्क तथा यूरोप से तांबा, लौह तथा शीशा जैसे धातु एवं कागज का आयात होता था। हमारी अथाह संपत्ति का मुख्य आधार आयात के बजाय निर्यात पर आधारित था। हमारे निर्यात में सूती वस्त्र, हथकरघा, कच्चा रेशम, पशमीना शॉल, नील, अफीम, मिर्च एवं अन्य स्वादिष्ट मसाले तथा कीमती पत्थर एवं ड्रग्स जैसे वस्तुएं शामिल थे।

हम औपनिवेशिक शासन में गरीब बनते गए, जब हमारी ही धरती से भेजे गए धातुओं एवं मिनरल्स को आयात करने के लिए बाध्य कर आयात करने वाला देश बना दिया गया। भारतीय अपनी उद्यमशीलता को भूलते और हमारे अधिक से अधिक लोगों को गए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए  कृषि पर निर्भर रहने के लिए बाध्य कर दिया गया। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी गरीबी का सीधा संबंध हमारे अधिकांश भारतीय लोगों का कृषि पर आवश्यकता से अधिक निर्भरता है। यहां तक कि आज भी कृषि रोजगार उपलब्ध कराने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। लगभग 45.5 प्रतिशत भारतीय अपनी जीवकोपार्जन के लिए कृषि पर निर्भर हैं। हालांकि सच्चाई यह है कि कृषि से जुड़े अधिकांश लोग अद्र्ध-रोजगार के शिकार होते हैं, क्योंकि पूर्णकालिक कृषि विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है। किसानों के पास बड़े स्तर पर खेती करने के लिए ज्यादा जमीन नहीं है। 60 प्रतिशत किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम कृषि भूमि है। उनमें से अधिकांश खेती के लिए अनियमित मानसून पर निर्भर होते हैं। विश्व की तुलना में भारत की कृषि उत्पादकता बहुत कम है। सिंचाई और कृषि विकास की दोषपूर्ण रणनीति क्षारता, लवणता और जल जमाव के रूप में भूमि की गुणवत्ता को कम करती है। इस कारण मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है।

मेरा मूल मुद्दा यह है कि बेरोजगार, अद्र्ध-रोजगार और गरीबी में जीने वाले भारतीय किसानों को कृषि क्षेत्र में कैद करने के बजाय उन्हें इस तरह सशक्त बनाने की जरूरत है ताकि उनके सामने गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार चुनने का विकल्प उपलब्ध हो। हमारे नेता और नीति-निर्माता गांवों की खोई हुई उद्यशीलता का पुनर्रूद्धार करने की कोशिश क्यों नहीं करते? मैं इस बात को लेकर निश्चिंत हूं कि देश से बेरोजगारी और अद्र्ध-रोजगारी को समाप्त करने के लिए गांवों में कुटीर एवं लघु उद्योग को बढ़ावा देना होगा। हमें इस बात को समझना होगा कि बड़े उद्योग और कारखाने भारत को पूरी तरह समृद्ध नहीं बना सकते। दुनिया के औद्योगीकृत देशों में से एक जापान इसका एक उदाहरण है। यहां मैं 1996 के आंकड़े दूंगा, जिसके अंतर्गत देश के कुल 6.50 मिलियन व्यवसायिक संस्थानों में लघु एवं मध्यम उद्योग की संख्या 6.43 मिलियन थी, जो कुल संस्थान का 98.9 प्रतिशत है। उत्तरगामी वर्षों में जापान में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

इसकी पृष्ठभूमि में भू-अध्यादेश को देखा जाए तो मोदी निश्चित रूप से सही रास्ते पर हैं, लेकिन उनके साथ के ही दुश्मन उन्हें विचलित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें निश्चित रूप से मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिए। उनके सामने झुकना बहुमत के साथ धोखा होगा। उन्हें एनडीए, भाजपा और संघ के अपने दुश्मनों का बताना चाहिए कि अगर वे जिम्मेदार नहीं हुए तो वो 2019 का इंतजार किए बिना जनता के बीच दुबारा जाना पसंद करेंगे।

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