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डॉ. हेडगेवार ने देश के लिए जीना सिखाया

डॉ. हेडगेवार ने देश के लिए जीना सिखाया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को दो वर्ष बाद यानी विजयादशमी 2025 को सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे। इस अवसर पर संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ के कार्यों व उद्देश्य को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया है। इस बीच संघ विश्व-ख्याति का संगठन बन चुका है। उसका संगठन कौशल और व्यक्ति निर्माण की अद्भुत कार्य पद्धति दुनियाभर के समाज विज्ञानियों को चकित किए हुए हैं। उस पर शोध हो रहे हैं एक संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करते हुए एकात्मता और गुणवत्ता के साथ पूरी चैतन्यता बनाए हुए इतनी सुदीर्घ यात्रा कर रहा है तो उसकी विशेषताएं क्या है, उसकी उद्देश्य परकता है और उसकी अबाध निरंतरता का मूलमंत्र क्या है? और वो कौन सी प्रेरणा है जो लाखों लोगों को अपना सब प्रकार से सुयोग्य जीवन, आज की भाषा में कहें तो ‘बाइट करियर’ राष्ट्र और समाज की सेवा के लिए न्यौछावर कर देने का मार्ग दिखती है और ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ इनके जीवन का मंत्र बन जाता है? निस्संदेह संघ संस्थापक डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने बड़ी दूर दृष्टि से संघ के विचार को मूर्त रूप देने, उसकी निरंतरता और जीवंतता बनाए रखने के लिए जिस दैनिक शाखा पद्धति का अनुसंधान किया, वहीं संघ-शक्ति का मूल स्रोत है।

शाखा को संघ की ‘नित्य सिद्ध शक्ति’ कहा जाता है जहां दैनिक संस्कार पाकर व्यक्ति बिन्दु से सिंधु का विस्तार पाने की ओर बढ़ता है। डॉ. हेडगेवार सचमुच भारतीय मन के चिकित्सक थे जिन्होंने संघ विचार का उदात्त भाव व्यक्ति के अंत:करण में जीवंत करने की एक वैज्ञानिक पद्धति ईजाद की। व्यक्ति के जीवन को दैनिक संस्कार से गुणसंपन्न बनाकर समाज की एक संगठित शक्ति खड़ी करने के लिए डॉ. हेडगेवार ने लोगों को देश के लिए जीना सिखाया। भारत के इतिहास में राष्ट्र निर्माण के लिए यह डॉ. हेडगेवार का अद्वितीय अवदान है। एक से एक श्रेष्ठ विचार को लेकर अनेक संगठन, संस्थाएं स्थापित हुई, अपने प्रवर्तक महापुरुषों के जीवनकाल में उनकी तेजस्विता की खूब आभा बिखेरी और अंत में उन महापुरुषों का जीवन तिरोहित होने के साथ ही संगठन निष्प्रभावी हो गया। इसके विपरीत संघ एक शताब्दी की यशस्वी यात्रा पूरी करने के निकट होकर भी उतना ही युवा, सक्रिय और दैदीप्यमान बना है तो यह डॉ. हेडगेवार के संगठन कौशल का ही चमत्कार है।

यह जानना भी बेहद रोचक और रोमांचक है कि संघ स्थापना के मात्र 15 साल बाद जून 1940 में ही डॉक्टर साहब का निधन हो गया। इन 15 वर्षों में वे संघ को देशव्यापी बना चुके थे और संघ की नींव व उसके स्वरूप को सुदृढ़ करने में उन्होंने इतना अनथक और कठोर परिश्रम किया दिन-रात कि उनके अत्यंत बलिष्ठ शरीर में भी खून का पानी हो गया। ऐसा तेजस्वी, त्यागपूर्ण और प्रेरणास्पद जीवन था डॉ. हेडगेवार का कि उनके जाने के 82 साल बाद भी संघ व्यापक फलक पर समाज सेवा, सामाजिक समरसता, हिंदू चेतना के विस्तार और भारत की राष्ट्रीयता के जागरण का धु्रवतारा बनकर दमक रहा है। अपने शुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए भले ही संघ के विरोधी सांप्रदायिक-फासिस्ट होने जैसे अनर्गल आरोप संघ पर मढ़ते हों, पर आज संघ देशभक्ति के अखण्ड दीप में भारतीय जनमानस में प्रकाशमान है। आज अगर 32 साल तक बड़ी चालाकी से छिपाई जाती रही कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा, तिरस्कार, उत्पीडऩ, बेदखली और उनकी पुश्तैनी संपत्तियों की लूट की कहानी सामने आने पर पूरा देश उनके साथ खड़ा दिख रहा है तो यह  संघ के द्वारा देश में बनाए गए राष्ट्रीयता के वातावरण का ही नतीजा है कि हर भारत विरोधी गतिविधि के खिलाफ पूरा देश आवाज उठाने लगता है।

‘याचि देही याचि डोला’ यानी इसी शरीर और इन्हीं आंखों से संघ के स्वप्न को साकार होते देखने की जो आकांक्षा डॉक्टर साहब की थी, वह आज पूर्णता की और है। वर्धा में 1936 में लगे संघ शिविर में महात्मा गांधी आए तो यह देख और जानकर चकित रह गए कि सभी वर्णों और जातियों के लोग वहां बिना किसी भेद-भाव के साथ रह रहे हैं, एक-दूसरे के हाथ का परोसा भोजन साथ बैठकर कर रहे हैं। ऐसा उल्लेख है कि यह देखकर उन्होंने डॉ. हेडगेवार को कहा कि जो मैं सोचता ही रहा, उसे तुमने कर दिखाया। ऐसा सामाजिक समरसता का संस्कार संघ के स्वयंसेवकों में गढ़ा डॉक्टर साहब ने। एक बार किसी ने कहा कि डॉक्टर साहब अब संघ को लोग जानने लगे हैं तो अपने स्वयंसेवकों की पहचान के लिए भी कुछ बिल्ला या ऐसा कोई चिन्ह बनवा दें ताकि लोग दूर से पहचान जाएं कि ये संघ का स्वयंसेवक आ रहा है। डॉ. हेडगेवार ने कहा कि संघ के स्वयंसेवक की पहचान उसका शुद्ध आचरण होगा ताकि लोग उसके जीवन से प्रेरणा ले सकें। संघ की स्थापना और उसका नीति शास्त्र तैयार कर उसके क्रियान्वयन की ऐसी दृष्टि और संकल्प था डॉ. हेडगेवार का। आज जब कहीं 4-6 लोग भारत की संस्कृति और संस्कार बात करते दिखे या ईमानदारी, देशभक्ति की चर्चा कर रहे हो अथवा सामान्य धोती-कुर्ता भी पहने दिख जाएं तो अनायास रास्ते चलता आदमी उनसे पूछ बैठता है – भाई साहब आप आरएसएस के हो क्या? यानी लोगों की नजर में संघ देशभक्ति, ईमानदारी, सेवा और भारतीयता का प्रतीक बन गया है। यह आदर्श भारत की शक्ति बने, यही डॉ. हेडगेवार चाहते थे। संघ की शाखा के दैनिक कार्यक्रमों का यह संस्कार हैं जो स्वयंसेवकों के जीवन में प्रतिफलित होता है।

कालांतर में कुछ लोगों ने नकल की कोशिश की कि हम भी वैसी शाखा लगाएंगे, वैसी यूनीफार्म पहनाकर पीटी कराएंगे, पर वह तत्वज्ञान कहां से लाएंगे जो भारत भक्ति जगाता है, उनके दिलों में तो भारत विरोध का जहर भरा है। वे संघ की तर्ज पर स्वयंसेवक तो तैयार नहीं कर पाए, पर उन्होंने बुद्धिजीवियों की ब्रिटिश मानसिकता की गुलाम ऐसी जमात जरूर खड़ी कर दी जो भारत के देशभक्त क्रांतिकारी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि को ‘रिवोल्यूशनरी टेररिस्ट’ लिखते हैं। जिस-जिस तरह से भारत की तौहीन की जा सकती है, भारत के गौरव को धिक्कारा जा सकता है, वह करते हैं। डॉ. हेडगेवार तो जन्मजात देशभक्त थे। उन्होंने पूरा जीवन निस्वार्थ देश की सेवा में झोंक दिया और आज जमात ये संघ वालों से हिसाब मांगती है कि आजादी की लड़ाई में संघ कहां था? उनको न भारत की पहचान है, न भारतीयता की तो संघ उन्हें देशभक्त कहां से दिखेगा? उन्हें पता ही नहीं है कि डॉ. हेडगेवार आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही कांग्रेस में नागपुर प्रांत के मंत्री थे। क्रांतिकारी आंदोलन में कोकेन छद्म नाम से उनकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी। संघ की प्रतिज्ञा में उस समय देश की स्वाधीनता का संकल्प शामिल था। देशभर में 26 जनवरी 1930 को संघ की सभी शाखाओं पर पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लिया गया और इसका निर्देश डॉ. हेडगेवार ने पत्र लिखकर सभी शाखाओं को दिया। जंगल सत्याग्रह में डॉ. हेडगेवार सरसंघचालक का दायित्व एक अन्य का कार्यकर्ता को सौंपकर जेल गए।

स्वाधीनता आंदोलन में अपनी लंबी सहभागिता के अनुभव से डॉक्टर साहब मानते थे कि केवल देश की आजादी पा लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह स्वाधीनता अक्षुण्ण रहे और फिर भारत पराधीन न हो, इसके लिए गुणसंपन्न समाज की संगठित शक्ति खड़ी करनी पड़ेगी। ऐसा गुणसंपन्न, सद्गुण- सदाचार से युक्त और स्वार्थ-भेद से मुक्त संगठित देशभक्त समाज निर्माण करने के लिए ही उन्होंने संघ की स्थापना की। डॉ. हेडगेवार ने निसंकोच ‘भारत हिंदू राष्ट्र है’ के ध्येय को सामने रखकर हिन्दू समाज के संगठन का लक्ष्य तय किया, इसका अर्थ यह कतई नहीं रहा कि संघ मुस्लिमों का विरोधी है। संघ प्रमुख डॉ. भागवत तो खुलेआम कहते हैं कि भारत में मुस्लिमों के बिना हिंदुत्व अधूरा है। संघ भारत में सभी को हिंदू मानता है भले ही किसी की पूजा पद्धति अलग हो। हिंदू भारत की राष्ट्रीयता है। अब तो जैसी कि खबरें आई है कि जब गुलाम नबी आजाद भी यह मान रहे हो कि कुछ पीढ़ी पहले उनके पुरुखे हिंदू थे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो मुस्लिमों के गोत्र जाट-राजपूत और गूजरों वाले राणा चौधरी, भाटी, चौहान हो तो सारे भ्रम केवल स्वार्थवश फैलाए जा रहे दिखते हैं। बिहार सरकार के एक मुस्लिम मंत्री ने अपनी आठ सौ साल की पूर्वज परंपरा को याद करते हुए डॉ. भागवत के कथन से सहमति जताई है कि भारत के हिंदू और मुसलमानों का डीएनए एक ही है। तब हिंदू राष्ट्र या हिंदू संगठन की बात डराने वाली नहीं बचती। डॉ. हेडगेवार ने इस सत्य को बिना लाग-लपेट के साथ कहा और डॉ. मोहन भागवत तो स्पष्ट कहते हैं कि संघ में सब कुछ परिवर्तनीय है सिवाय इस घोषणा के कि ‘भारत हिंदू राष्ट्र है।’

आज जब देश स्वाधीनता के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा तब देश की एकात्मता और राष्ट्रीय भावना प्रत्येक नागरिक के अंत:करण में सुदृढ़ करने की जरूरत है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती है। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह’ और ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं- तेरे कातिल जिंदा है’ की मानसिकता को पालने-पोषणे वाली जमात। अल्पसंख्यकवाद और से सेकुलरवाद आड़ में जब देश विरोधी मंसूबे मजबूत होने लगे तो ये देश की एकता और आजादी के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। ऐसे में डॉ. हेडगेवार की दूरदेशी और उनके द्वारा देश की स्वाधीनता के लिए संभावित खतरों को भांपते हुए संघ की स्थापना आज भारत के सामने उपस्थित सारी चुनौतियों का समाधान हैं। आज यदि भारत नए नेतृत्व के साथ विश्व में अग्रगण्य भूमिका में प्रतिष्ठा पा रहा है तो यह भी संघ की देशभक्त, ईमानदार और सामाजिक समरसता व सेवा की संकल्पना का ही प्रतिफलन है, वरना तो देश आतंकवाद, भ्रष्टाचार और आत्महीनता के गर्त में घकेल दिया गया था। डॉ. हेडगेवार के जीवन और संघ के विचार के मर्म को समझने के लिए मानसिक संकीर्णताओं से निकलना पड़ेगा। संघ तो पांच बार सत्ता के प्रतिबंध झेलकर भी अडिग रहा क्योंकि राजनीति उसके केंद्र में नहीं है। डॉ. हेडगेवार ने उसे जो भारतभक्ति की घुट्टी पिलाई, वही उसका अमृतपान है। इसलिए भारतीय जन में यह भरोसा और बढ़ा है कि संघ है तो भारत हैं।

 

 

 

प्रो. बल्देव भाई शर्मा

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