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व्यक्तिपूजा के निषेध और अस्पृश्यता निवारण का मूल मंत्र

व्यक्तिपूजा के निषेध और अस्पृश्यता निवारण का मूल मंत्र

तूफान और प्रतिकूल परिस्थितियां व्यक्तित्व की परख की कसौटी होती हैं। विपरीत हालात असाधारण शख्सियतों के निर्माण का जरिया होती हैं। अंग्रेजी सत्त्ता की लूट-खसोट की नीति और गुलामी के शासन से उपजा विक्षोभ नहीं होता तो शायद हमारे समाज में डायनासोर जैसी हस्तियां नहीं उभर पातीं। स्वाधीनता आंदोलन को इन अर्थों में हम व्यक्तित्वों के उभरने के हालात के तौर पर भी देख सकते हैं। चाहे संस्कृति का क्षेत्र हो या राजनीति का, समाज सुधार की कोशिशों की बात हो या फिर शिक्षा में लाए जाने वाले बदलाव की, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हर क्षेत्र में काम करने की उद्भट ललक वाली शख्सियतें जुटी रहीं। विपरीत हालात और संघर्षों के बीच ही विशाल व्यक्तित्वों का निर्माण हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार भी स्वाधीनता संघर्ष की कोख से ही उपजे थे। जिन्होंने एक ऐसे राष्ट्र का सपना देखा, जो पारंपरिक भारतीय राष्ट्र की सांस्कृतिक अवधारणा पर आधारित हो, जिसकी एकता को कोई चुनौती नहीं हो और जिसका सामाजिक वातावरण समरस हो, जिसमें जाति, समुदाय और पूजा पद्धति के नाम पर कोई असमानता और भेदभाव ना हो।

केशव बलिराम हेडगेवार जब जवानी की ओर कदम बढ़ा रहे थे, उन दिनों भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस औपनिवेशिक सोच और आधार से मुक्त होकर उस भारतीय जनमानस का प्रतिनिधि बन चुकी थी, जो अंग्रेजों की गुलामी से अपने देश और अपनी माटी को आजाद देखना चाहता था। कांग्रेस को इस दिशा में मोडऩे में निश्चित तौर पर लाल-बाल और पाल की तिकड़ी के ओजस्वी नेतृत्व का प्रभाव सबसे ज्यादा था। लाल यानी लाला लाजपत राय, बाल यानी बाल गंगाधर तिलक और पाल यानी विपिन चंद्र पाल जैसे गरम दल के नेताओं ने कांग्रेस को भारतीयों की सोच की प्रतिनिधि पार्टी बनाने की दिशा में मोड़ दिया था। यह भी देखने की बात है कि ये तीनों नेता भारत के तीन इलाकों के थे, लेकिन भारतीय राष्ट्र की अखंडता और उसकी आजादी को लेकर तीनों की सोच एक थी। बाल गंगाधर तिलक जहां देश के पश्चिमी हिस्से यानी महाराष्ट्र के थे, वहीं बिपिन चंद्र पाल देश के पूर्वी छोर यानी बंगाल के निवासी थे। इसी तरह लाला लाजपत राय पंजाब के थे।

ऐसे माहौल में युवाओं में जोश भरना ही था। पुणे में पढ़ाई करने पहुंचे केशव बलिराम हेडगेवार पर इसका असर पडऩा ही था। उस दौर में वंदेमातरम् राष्ट्रीय उद्घोष बन गया था। उसे गाना राजाज्ञा जैसे उल्लंघन था। इसके लिए स्कूल में महज 14 साल की उम्र में हेडगेवार सजा काट चुके थे। उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। बहरहाल मेडिकल की पढ़ाई के बाद वे नागपुर लौटे तो उन्होंने प्रैक्टिस करने या नौकरी करने की बजाय लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से कांग्रेस के साथ स्वाधीनता आंदोलन में जुट गए। इसके बाद उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ उग्र भाषण देना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्हें चेतावनी भी दी गई, लेकिन उसे उन्होंने अनसुना कर दिया। इसके चलते 1921 में गिरफ्तार किया गया और एक साल के सश्रम कारावास की सजा हुई।

कांग्रेस के साथ स्वाधीनता आंदोलन में जुटे रहने के बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया।

डॉक्टर हेडगेवार को महसूस हुआ कि जब तक भारत के बहुसंख्य हिंदू समाज को संगठित नहीं किया गया, तब तक ना तो देशभक्ति की प्रबल भावना जगाई जा सकेगी और ना ही समाज में बराबरी की सोच विकसित हो पाएगी। इसी भावना के चलते 1925 में विजयादशमी के दिन उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उनकी हिंदू की परिभाषा विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक ‘हिंदुत्व’ पर आधारित है। सावरकर का यह ग्रंथ एक तरह से भारतीय राष्ट्र का दर्शन कराता है। इसमें हिंदू के बारे में कहा गया गया है, ‘भारत के वे सभी लोग हिंदू हैं, जो इस देश को पितृभूमि-पुण्यभूमि मानते हैं’। इनमें सनातनी, आर्यसमाजी, जैन, बौद्ध, सिख आदि पंथों एवं धर्मावलंबी के साथ उनका आचरण करने वाला समस्त समुदाय और व्यक्ति हिंदू है। इस संगठन मूल मंत्र ‘अस्पृश्यता का निवारण एवं हिंदुओं का सैनिकीकरण’’, इस संगठन के लिए स्वयंसेवकों की भर्ती शुरू हुई और सुबह- शाम एक-एक घंटे की शाखायें लगाई जाने लगी। अस्पृश्यता निवारण और सामाजिक समरसता के सिद्धांत के चलते थोड़े समय में ही यह संगठन लोकप्रिय हो गया। सन् 1935-36 तक संघ की शाखाएं केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित थीं, जिनमें कुछ हजार स्वयंसेवक ही थे। लेकिन देखते ही देखते संगठन का विस्तार होता चला गया। इसकी वजह यह थी कि इसमें व्यक्ति पूजा का कोई स्थान नहीं था। 1928 की गुरू पूर्णिया के दिन से उन्होंने व्यक्ति पूजा की बजाय भगवा ध्वज के पूजन की परंपरा शुरू कराई। जब स्वयंसेवक गुरु पूजन के लिए एकत्र हुए तब सभी स्वयंसेवकों को यही अनुमान था कि डॉक्टर साहब की गुरु के रूप में पूजा की जाएगी। लेकिन वहां कुछ और ही हुआ। पहले गुरूपूजन पर डॉ. हेडगेवार ने जो कहा था, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘संघ ने अपने गुरु की जगह पर किसी व्यक्ति विशेष को मान न देते हुए परम पवित्र भगवा ध्वज को ही सम्मानित किया है। इसका कारण है कि व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, फिर भी वह कभी भी स्थिर या पूर्ण नहीं रह सकता। अतएव व्यक्ति विशेष को गुरु के स्थान पर रखकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बनाने की अपेक्षा इतिहास, परंपरा एवं राष्ट्रीयता का समन्वित प्रतिबिंब भगवा ध्वज हमारे गुरु के रूप में सम्मानित है। इससे मिलने वाली स्फूर्ति किसी भी मनुष्य से मिलने वाली स्फूर्ति की अपेक्षा श्रेष्ठ है।’

साफ है कि व्यक्ति पूजा के निषेध की वजह रही कि ना तो कोई बड़ा है और ना ही छोटा। संघ में आने वाले सभी बराबर हैं। स्वयंसेवक का ध्येय है समाज में बराबरी को स्थापित करना, सबके काम आना और राष्ट्रभक्ति के हर उपाय करना। अपने इन्हीं उद्देश्यों को लेकर संघ लगातार आगे बढ़ता रहा। लेकिन इसके कतिपय लोग परेशान भी रहे। इसकी वजह से संघ के बारे में जगह-जगह यह कुप्रचार किया गया कि यहां ब्राह्मणों का वर्चस्व है। यहां छुआछूत और ऊंचनीच का भाव है। लेकिन खुद महात्मा गांधी ने वर्धा में संघ के एक शिविर का दौरा किया था। यह तारीख थी 25 दिसंबर 1934। उस दिन सुबह 6 बजे ही गांधी संघ की आरएसएस के शिविर में पहुंच गए। वहां उन्होंने रसोईघर देखा और भोजन और उसकी लागत के बारे में पूछताछ की। गांधी जी संघ के शिविर में दो बातों से प्रभावित हुए। उन्हें जब पता चला कि शिविर में गणवेश, भोजन और ठहरने का समूचा प्रबंध और खर्च स्वयंसेवकों ने अपने पैसे से किया था और शिविर में अस्पृश्यता एकदम नहीं थी। यहां तक कि स्वयंसेवकों को एक-दूसरे की जाति तक पता नहीं थी। उसके अगले दिन डॉक्टर हेडगेवार खुद गांधी से वर्धा में मिले थे। करीब तेरह साल बाद संघ के ही स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी ने स्वयं इस बात का जिक्र किया था। उन्होंने तब कहा था कि जब जब उन्होंने संघ के शिविर का दौरा किया, तो वहां अनुशासन देखकर और छुआछूत की अनुपस्थिति से बहुत हैरान हुआ था।

यह कमजोर तबके के उत्थान और छुआछूत की अवधारणा के खिलाफ संघ और डॉक्टर हेडगेवार की सोच ही थी कि उससे प्रभावित हुए बिना डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी नहीं रह पाए। 1939 में संघ के एक शिविर के दौरे के बाद उन्होंने लिखा था, ‘यह पहली बार है, जब मैं संघ के स्वयंसेवकों के शिविर का दौरा कर रहा हूं। मुझे सवर्णियों (उच्च जाति) और हरिजन (निम्न जाति) के बीच पूर्ण समानता पाकर खुशी हो रही है, किसी को इस तरह के अंतर के बारे में पता नहीं है।’

समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान की सोच ही है कि आज वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय समेत संघ के सैकड़ों प्रकल्प संस्थानिक और संघ के स्वयंसेवकों के व्यक्तिगत प्रयासों से लगातार चल रहे हैं। भारत पर जब भी हमला हुआ, सेनाओं के सहयोग के लिए स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचते रहे हैं। भूकंप हो या सुनामी हो या बाढ़ हो या सूखा, या फिर कोई रेल-जहाज दुर्घटना, हर ऐसी परिस्थिति में संघ के स्वयंसेवकों की स्वत:स्फूर्त उपस्थिति अनिवार्य होती रही है। शायद यही वजह है कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से जब यह पूछा गया कि देश पर जब विपत्ति आएगी तो सबसे पहले देश के लिए कौन खड़ा होगा तो उन्होंने सेना और संघ के खड़े होने की बात कही थी।

बराबरी की विचारधारा, व्यक्तिवाद के निषेध और राष्ट्र निर्माण की सोच ही है कि देश के पहले फील्ड मार्शल जनरल के एम करियप्पा ने भी कहा था कि संघ का काम उनके दिल का काम है।

संघ के ही अन्यतम स्वयंसेवक भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी थे। उन्होंने समाज के आखिरी व्यक्ति के उत्थान के लिए अंत्योदय का विचार दिया था। अंत्योदय की अवधारणा भी दरअसल समाज के आखिरी व्यक्ति के उत्थान से ही प्रेरित है।

 


उमेश
चतुर्वेदी

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