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नरेन्द्र मोदी का आत्मनिर्भर भारत : दीनदयाल उपाध्याय की आर्थिक दृष्टि

नरेन्द्र मोदी का आत्मनिर्भर भारत : दीनदयाल उपाध्याय की आर्थिक दृष्टि

क्या नरेन्द्र्र मोदी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आर्थिक दृष्टिकोण ‘एकात्म मानव दर्शन’को अपने आत्मानिर्भर भारत के माध्यम से क्रियान्वित कर रहे हैं?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर निस्संदेह, 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के बाद से आरंभ माना जाना चाहिए। भारत के लोगों के विकास के लिए लागू किए जाने वाली विभिन्न योजनाओं के धरातल पर सकारात्मक प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है। जब इन योजनाओं की सफलता के सम्बंध में सावधानीपूर्वक अध्ययन करने के बाद हां ही उत्तर मिलता है।

इसे मापने के लिए हमें पहले पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन के बारे में जानना आवश्यक है। क्या है यह दर्शन और इसका क्या अर्थ है।

1965 में विजयवाड़ा में भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में महामंत्री पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव दर्शन’ नामक एक नई आर्थिक सोच का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था- एकात्म मानववाद का दर्शन।

अपने बाद के भाषणों और लेखों में, दीनदयाल उपाध्याय ने तर्क दिया कि ‘एकात्म मानव दर्शन’ विशुद्ध रूप से समय-परीक्षणित भारतीय लोकाचार और सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित है, जो लोगों को उनके जन्मजात कौशल और आंतरिक कारकों का पता लगा कर उसे विकास की प्रक्रिया में गौरवान्वित रूप से भागीदार बनाने में विश्वास करता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह भारतीय आर्थिक सोच साम्यवाद और पूंजीवाद का एक व्यवहारिक विकल्प है क्योंकि यह एक राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण पर आधारित है।

पांच दशक बाद 2015 में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र्र मोदी ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा के साथ सामने आए, जो कि दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन का प्रतिबिम्ब ही है। ऐसे में मोदी दीनदयाल उपाध्याय के सपने को साकार कर रहे हैं। वास्तव में, ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा की विशिष्ट विशेषताएं दीनदयाल उपाध्याय के उस आर्थिक दर्शन में दिए गए तत्वों से मेल खाती हैं।

दीनदयाल उपाध्याय ने कहा कि भारतीय जनता का ‘विनाशकारी आत्म-विस्मरण’ देश की आर्थिक बीमारियों का मूल कारण था। वास्तविकता में उनका मानना था कि ‘आर्थिक विकास’ लोगों के लिए लोगों द्वारा ही किया जाना चाहिए और यही सच्चाई है।

इसका मतलब है कि लोगों को विकास की प्रक्रिया में गर्व के साथ भागीदार बनाया जाना चाहिए। इस संबंध में, दीनदयाल ने कहा कि बड़े पैमाने पर ‘उत्पादन’ के बजाय यह ‘जनता द्वारा उत्पादन’ होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में लोगों की भारी भागीदारी हो जो, रोजगार उत्पन्न करने की क्षमता बढ़ाता है।

मोदी भी विकास की प्रक्रिया में ‘लोगों की भागीदारी’ की इस अवधारणा को ही अपनी योजनाओं का हिस्सा बनाते हैं। उन्होंने लोगों को बैंक खाते खुलवाने में काफी हद तक सफलता हासिल की है। वह ‘स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, जनधन, कृषि सिंचाई योजना, मुद्रा योजना आदि के तहत लघु उद्योग स्थापित करने के लिए युवाओं को ऋण; आदि देने की नीतियों को लागू कर चुके हैं। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को लेकर मोदी ने एक बड़ा फैसला लिया जिसके तहत उन्होंने वर्ष 2022 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 5.52 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया।

ईमानदार करदाताओं को सम्मानित करने के संदर्भ में ‘ईमानदारी का पर्व’ मनाने के लिए मोदी का बार-बार दावा दीनदयाल की सोच के अनुरूप है। पंडित दीनदयाल ने कहा था, ‘समाज के अर्थ पुरुषार्थ में आर्थिक नीति के साथ-साथ अच्छों की रक्षा और दोषियों को दंडित करने के लिए राज्य की शक्ति पर विचार करना होगा’ मोदी कहते रहते हैं कि वह भ्रष्टाचारियों को नहीं बख्शेंगे और ईमानदारों को सम्मानित करने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे।

यह सामान्य ज्ञान की बात है कि समुद्र की सतह पर काफी ऊंचाई तक पहुंचाने वाली लहरे उन नावों को भी ऊपर तक उठाने में सहयोग करती हैं। इसी तरह से जन साधारण के लिए बनाई जाने वाली नीतियां नागरिकों को मजबूत गतिविधि के माध्यम से उनके विकास को तय करती हैं। दीनदयाल उपाध्याय का भी मानना था कि जमीनी स्तर पर एक जीवंत आर्थिक गतिविधि आर्थिक उछाल की ओर ले जाती है जिसमें समाज के आर्थिक रूप से हाशिए पर रहने वाले हर वर्ग को उठाने की क्षमता होती है। स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, मुद्रा की कल्पना को मोदी द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। जो जमीनी स्तर पर एक जीवंत आर्थिक गतिविधि सुनिश्चित करने के लिए उपकरण है। ‘अंत्योदय’ पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दी गई एक सार्थक अवधारणा है। यह कतार में लगे अंतिम व्यक्ति के आर्थिक उत्थान के बारे में है। उपर्युक्त योजनाओं को लाकर मोदी ठीक वैसा ही कर रहे हैं।

जनसंघ के आर्थिक विचारक का जोर और फोकस अपनी अंतर्निहित ताकत और मूल्यों के माध्यम से एक नए भारत के निर्माण पर था।

राष्ट्रव्यापी आंदोलन, एक विकेन्द्रीकृत रोजगार के अवसर, समाज के लिए स्वदेशी विचारों को बढ़ावा देना, सूक्ष्म, लघु, मध्यम, कुटीर उद्योगों और स्वरोजगार क्षेत्रों जैसी पारंपरिक अर्थव्यवस्था की रक्षा करना। मोदी द्वारा संचालित बजट के जटिल पहलुओं पर एक सूक्ष्म नजर डालने से पता चलता है कि प्रधानमंत्री दीनदयाल की सोच को वास्तविकता में बदल रहे हैं। यह विजन इन एक्शन है।

दीनदयाल का एक महान उद्देश्य था, भारतवर्ष को एक आर्थिक और सैन्य महाशक्ति, सांस्कृतिक रूप से जीवंत, सामाजिक एकता के साथ नैतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र बनाना। और प्रधानमंत्री मोदी दीनदयाल के उद्देश्य को वास्तविक स्वरूप देने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।

दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अग्रणी प्रचारक और भारतीय जनसंघ के नेता थे। जनसंघ के महामंत्री के रूप में उसकी देखभाल और पोषण करने के बाद, दिसंबर 1967 में वह जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में चुने गए। 11 फरवरी, 1968 को रहस्यमय परिस्थितियों में वह मृत पाए गए थे। उनका शव उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर पटरियों पर मिला था। जिसका नाम आज उन्हीं के नाम पर है।

 

एस हेमंत

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