ब्रेकिंग न्यूज़ 

गांवों पर भी नजर डालें युवा

गांवों पर भी नजर डालें युवा

उदारीकरण के पहले तक गर्मी की छुट्टियां बच्चों और युवाओं के लिए सैर-सपाटे और उधम मचाने का वक्त होती थीं। शहरों में रहने वाले बच्चे अपने दादा-दादी या नाना-नानी के घर गांवों का रूख करते थे। गांव में रहने वाले उनके घर-ननिहाल के बच्चों को पूरे साल उनका इंतजार रहता था। बच्चे जुटते और उनकी दोपहरिया बाग-बगीचों, उथली नदियों, सूखे तालाबों के किनारे उधम मचाते बीततीं। पहले ज्यादातर शादी-विवाह, मुंडन-जनेऊ भी गरमी की छुट्टियों में ही आयोजित होते थे। शाम को इन आयोजनों के भोजभात में भी उत्साही बच्चों का जुटान होता, मस्तियां होतीं। दोपहरिया में कभी दबाव बढ़ा तो उनके शहरों से लाई बाल पत्रिकाओं मसलन चंदामामा, गुडिय़ा, पराग, नंदन, बालभारती आदि के नए-पुराने अंकों में छपी कहानियों का डेरे-ट्यूबवेल पर सामूहिक वाचन-पाठन होता। बाग-बगीचों से अमिया और टिकोरा तोडऩे का कार्यक्रम चलता, महुआ के फूल तपती दोपहरिया के बीच बीने जाते और शाम को घर वापसी होती। लेकिन अब गरमी की छुट्टियों के ऐसे दृश्य बीते दिनों की बात हो गई है। अब गांवों तक में बगीचों का रकबा नहीं रहा, तालाब भी कम हो गए। अब छुट्टियों में बच्चे शहरों से गांव नहीं लौटते। गांव में अब वे ही बच्चे रूके हैं, जिनके माता-पिता की हैसियत शहरों की महंगी फीस भरने की नहीं है, इसलिए अब गांवों की गर्मियों में भी बच्चों की धमाचौकड़ी का तीन-चार दशक पुराना नजारा भी नहीं रहा। अब शहरों में रह रहे बच्चे गांव भी नहीं लौटते। उनके बिगड़ जाने और अंग्रेजी भूल जाने का डर उनके माता-पिताओं को उन्हें गांव लाने की राह में बाधा बनकर उठ खड़ा होता है। यह बात और है कि आज के बच्चों के ज्यादातर माता-पिताओं की बुनियाद और नाभिनाल भी गांव से ही जुड़ी है। यही वजह है कि छिटफुट बची आम की बगियों में भी अब बाल कलरव पहले जैसी नहीं गूंजती। बैसाख-जेठ की तपती दोपहरियों को बगीचों में होने वाले खेल जैसे दोल्हा-पाती, चोंचा, चीका, कबड्डी का शोर भी नहीं सुनाई देता। कुछ दिनों पहले तक लूडो खेलने वालों की भीड़ भी जुटती थी। लेकिन वैसी भीड़ भी नहीं दिखती। हां, दृश्य में थोड़ा बदलाव जरूर आया है। अब खाली और बेरोजगार बचे लोगों की भीड़ ताश खेलती जरूर नजर आती है।

1937 में दो साल पहले के भारत सरकार अधिनियम के तहत राज्यों में विधानसभाओं का गठन हुआ था। राज्य सरकारों को तब शासन के लिए जो विषय दिए गए थे, उनमें बुनियादी यानी प्राथमिक शिक्षा भी था। गांधी जी चाहते थे कि राज्य सरकारें भारतीय ढंग से शिक्षा दें। इसलिए उन्होंने 1937 में राष्ट्रीय शिक्षा समिति बनाई। जिसके अध्यक्ष जाकिर हुसैन थे। इस समिति को यह सुझाव देना था कि स्वराजी भारत की सरकारों के तहत कैसी शिक्षा दी जाएगी। यह समिति जब तक रिपोर्ट देती, उसके पहले ही गांधी जी ने बुनियादी शिक्षा को लेकर एक दस्तावेज तैयार कर दिया था। उसमें उन्होंने बच्चों को पर्यावरण, परिवेश और समाज से जोडऩे की वकालत की थी। यही वजह है कि बच्चों को खेती-किसानी, बागवानी के साथ ही शिल्पकारी को भी शिक्षा में जोड़ा गया। सभी छात्रों के लिए सहज रूप से ऐसे शारीरिक कार्य जोड़े गए, जो उत्पादक भी हों। 1986 की शिक्षा नीति तक तकरीबन हर सरकारी विद्यालय की सफाई के लिए चपरासी की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि उसकी साफ-सफाई की जिम्मेदारी उस विद्यालय में पढऩे वाले छात्रों, वहां पढ़ाने वाले अध्यापकों और उस गांव-समुदाय के लोगों पर थी। लेकिन 1986 के बाद आधुनिक होने के नाम पर शिक्षा आगे तो बढ़ी, लेकिन उसका जोर भौतिकता पर बढ़ा। अब अगर किसी स्कूल में स्वेच्छा से भी कोई छात्र सफाई व्यवस्था में हाथ बंटा दे तो आज के टेलीविजन समाचार चैनलों के पत्रकार उसे स्कूप बनाकर उस विद्यालय को संचालित करने वाली राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ मुहिम चला देंगे। इसीलिए शारीरिक शिक्षा, उत्पादक शिक्षा और परिवेश से जुड़ाव लगातार नई पीढ़ी से कम होता गया है। शिक्षा बाजार का विषय बन गई है। इसलिए लोग अपनी हैसियत के मुताबिक मोटी फीस चुकाते हैं और बदले में स्कूल विशेष के अध्यापकों और विद्यालय से वाजिब नतीजा चाहते हैं। वह नतीजा बच्चे को मिलने वाले नंबरों में दिखना चाहिए, जिसे नब्बे-पच्चानबे प्रतिशत से ज्यादा होना चाहिए। इसलिए आज के बच्चों पर पढ़ाई-पढ़ाई और पढ़ाई पर ही ज्यादा जोर दिया जा रहा है। जिंदगी की सहजता उनसे लगातार दर होती गई है। यह सहजता का दूर होना ही है कि बच्चे अब गांव नहीं लौटते, अमराइयों और बगियों में चिडिय़ों की चहचहाहट के साथ बच्चों की आवाज नहीं गूंजती, बंदरों की घुडक़ी उन्हें परेशान नहीं करती और वे अपनी उस परिवेश से दूर होते जा रहे हैं, जिसका मूल है भारत की संस्कृति, जिसका प्रमुख हिस्सा है देश की माटी और उसके प्रति गहरा जुड़ाव ।

गांधी ने युवाओं से गरमी की छुट्टियों में गांव जाने का सुझाव दिया था। गांधी चाहते थे कि गरमी की छुट्टियों में युवा गांव जाएं और वहां को लोगों में जागरूकता पैदा करें। उन्हें स्वच्छता का पाठ पढ़ाएं और उनकी जरूरी मदद करें। गांवों के बच्चों को जाकर पढ़ाई में मदद करें। आज विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय सेवा योजना, जिसे संक्षेप में एनएसएस कहते हैं, वह गांधी की इस सोच पर ही आधारित योजना है। अब भी विश्वविद्यालय और कॉलेज अपनी एनएसएस यूनिटों का शिविर नजदीकी गांवों आदि में लगाते हैं। लेकिन यह योजना ज्यादातर जगहों पर छात्रों के लिए एक्स्ट्रा करीकुलम एक्टिविटीज के नाम पर कुछ अंक या आगे की कक्षाओं में दाखिला आदि में कुछ वरीयता हासिल करने का जरिया भर रह गई है। लेकिन यह भी सच है कि आज साठ-सत्तर पार के कई ऐसे लोग आपको दूर-दराज के गांवों में मिल जाएंगे, जिन्होंने गांधी, विनोबा या जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा से गांवों का जो रूख किया, वह उनकी पूरी जिंदगी के लिए बन गया। गांवों के विकास, उनके परिवेश को संकुचन से दूर करके और ज्यादा समावेशी बनाना उनकी जिंदगी का उद्देश्य बन गया। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और असम में ऐसे ढेरों आश्रम मिल जाएंगे, जिनका संचालन वे लोग कर रहे हैं, जो गांधी, जयप्रकाश या विनोबा की प्रेरणा से गांवों के बीच कुछ करने पहुंचे और वहीं के होकर रह गए।

सच तो यह है कि आज गांवों को प्रगतिवादी सोच वाले युवाओं की ज्यादा जरूरत है। कभी शिल्पकारी और पारंपरिक ज्ञान परंपरा का प्रतीक रही जाति व्यवस्था अब राजनीति और दहेज का सबसे बड़ा हथियार और जरिया बन गई है। इसके जरिए गांवों में राजनीति के जैसे तंत्र का विकास हुआ है, उससे गांवों की भौतिक समृद्धि में कुछ इजाफा भले ही हुआ हो, मानवता और समावेशी नजरिये से गांव पीछे ही गए हैं। जिससे गांवों में नए तरीके का सामाजिक असंतुलन दिख रहा है। जिसकी प्रकारांतर से शहरी समाज पर भी छाया पड़ रही है। जिससे सामाजिक दुराव बढ़ा है। अतिवादी सोच और अतिचार ने सामाजिक संतुलन ही नहीं, उसके ताने-बाने को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। इसका असर यह हुआ है कि सामाजिक तौर पर मनुष्य-मनुष्य के बीच दूरी बढ़ी है। यह दूरी पारिवारिक और सामाजिक दोनों ही संतुलन को बिगाड़ रहा है। ऐसे माहौल को युवा ही बदल सकते हैं। बशर्तें कि वे गांवों का रूख करें और अपने ढंग से लोगों के बीच काम करें और आधुनिक मूल्यों को प्रसारित करने में अपनी भूमिका निभाएं।

आज के दौर में हर लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार की तरफ सहारे के लिए देखा जाता है। सामाजिक भूमिका के लिए भी सरकार की ही खोज की जाती है। अब इस चक्र को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता। इसलिए जरूरी है कि सरकारें ‘गांव चलो’ का नारा दें। गांवों की ओर प्रबुद्ध युवा अगर गर्मी की छुट्टियों के ही दौरान रूख करने लगा तो माहौल बदलने की कोशिश तेज हो जाएगी। गांवों की ओर लौटना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेंगा। जिसकी बदौलत वहां सकारात्मक बदलाव लाया जा सकेगा। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि ऐसा कदम कौन उठाएगा?

 

 

उमेश चतुर्वेदी

Leave a Reply

Your email address will not be published.