ब्रेकिंग न्यूज़ 

हिन्दुओं को अब एकजुट होने का समय

हिन्दुओं को अब एकजुट होने का समय

 

 

 

 

दीपक कुमार रथ
(editor@udayindia.in)

देश बढ़ते साम्प्रदायिक उन्माद को देख रहा है। इसमें कोई अचरज की बात नहीं इस बढ़ते तनाव का बीज तथाकथित अमन परस्त मुस्लिम समाज के एक वर्ग का ही बोया हुआ है, फिर चाहे वो राजस्थान के करौली की हिंसा हो, या मध्य प्रदेश के खरगौन की हिंसा, या दिल्ली के जहांगीरपुरी की हिंसा। यहां यह कहा जा सकता है की जो विभाजनकारी ताकतें हमारे समाज को अस्थिर करने और लोगों के विभिन्न वर्गों के बीच अशांति पैदा करने के लिए सदा तत्पर रहती है, वे उत्तर प्रदेश में यूपी चुनाव हारने के बाद इस तरह की आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने में मशगूल है। जब हिंदू जुलूस, चाहे वह रामनवमी का अवसर हो या हनुमान जन्मोत्सव, तथाकथित मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से होकर गुजरता है, तो पथराव, लक्षित हमले, आगजनी और तोडफ़ोड़ होती है। हर साल हिंदू त्योहारों पर हिंसक हमले तथाकथित गंगा-जमुनी तहजीब के तमाशे को नष्ट कर देते है, जिसे चतुराई से भारतीय मानस में प्रवेश करा दिया है। मस्जिदों और आसपास के घरों की छतों से पथराव शुरू हो जाता है। देखते ही देखते दुकानों और गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया जाता है। दंगाइयों के बुलन्द हौसलों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे पुलिसकर्मियों पर भी हमला करने में नहीं हिचकते। हालांकि गृहमंत्री अमित शाह ने हार्डकोर अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की सही सलाह दी है ताकि वे इस तरह की गतिविधियों को दोहराने की हिम्मत न करें। इससे पहले किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी के दंगों में भी देश ने उपद्रवियों द्वारा पुलिस प्रशासन पर हमला किए जाने की तस्वीरें देखी थीं। आप इसे क्या कहेंगे कि दिल्ली दंगो के मुख्य आरोपी अंसार को जब पुलिस कोर्ट में पेशी के लिए ले जा रही थी तो वो ‘पुष्पा’ फिल्म का एक्शन ‘झुकेगा नहीं’ कर रहा था। जिस पुलिस के सामने एक आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं उसी पुलिस को इन अपराधियों को कोर्ट से सजा दिलवाना तो दूर की बात है उनकी बेल रुकवाने में पसीने छूट जाते हैं!

कैसी विडम्बना है कि इस तरह के सांप्रदायिक दंगे और हिंसात्मक घटना-क्रम का आरोप भाजपा पर लगाया जाता है, जबकि कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने अपने गिरते राजनीतिक वर्चस्व के कारण इन सब घटनाओं को अंजाम दिया हैं। भला कोई भी सत्ताधारी पार्टी ऐसे दंगों एवं साम्प्रदायिक हिंसा को अंजाम देकर अपनी शासन-व्यवस्था पर क्यों दाग लगायेगी? इस देश की बढ़ती साख एवं राष्ट्रीयता को गिराने की मंशा रखने वाले राजनीतिक दलों एवं समुदायों का यह स्थायी चरित्र बन गया है कि वे अपने राष्ट्र से भी कहीं ज्यादा महत्व अपने स्वार्थ, अपनी जात और अपने मजहब को देते हैं। थोक वोट के लालच में सभी राजनीतिक दल जातिवाद और सांप्रदायिकता का सहारा लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। जो कोई अपनी जात और मजहब को बनाए रखना चाहते हैं, उन्हें उसकी पूरी आजादी होनी चाहिए लेकिन उनके नाम पर घृणा फैलाना, ऊंच-नीच को बढ़ाना, दंगे और तोड़-फोड़ करना कहां तक उचित है? यही प्रवृत्ति देश में पनपती रही तो भौगोलिक दृष्टि से तो भारत एक ही रहेगा लेकिन मानसिक दृष्टि से उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। ऐसी अनिश्चय और भय की स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए संकट की परिचायक है और इन संकटों को समाप्त करने की दृष्टि से देश के कई राज्यों में घटी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ताजा फैसलों का महत्व समझा जा सकता है। योगी सख्त प्रशासक के रूप में जाने जाते हैं और उनके ताजा निर्देश इस बात इंगित करते हैं। मुख्यमंत्री योगी ने राज्य की कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठक में स्पष्ट निर्देश दिया कि नए धार्मिक जुलूसों की इजाजत न दी जाए और न ही नए धर्मस्थलों पर लाउडस्पीकर लगाने की। पारंपरिक जुलूसों और शोभायात्राओं के संदर्भ में भी उन्होंने तय मानदंडों का हरहाल में पालन कराने का निर्देश दिया है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आस्था नितांत निजी विषय है और देश का कानून अपने सभी नागरिकों को उपासना की आजादी देता है। लेकिन आस्था जब प्रतिस्पर्धा में तब्दील होने लगे, तब वह कानून के दायरे में भी आ जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.