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अमन के फरिश्तों का सच

अमन के फरिश्तों का सच

 

देश में साम्प्रदायिक तनाव दिन पर दिन बढ़ते दिख रहा है। इसमें कोई अचरज की बात नहीं इस बढ़ते तनाव का बीज तथाकथित अमन परस्त मुस्लिम समाज का ही बोया हुआ है। फराग रोहवी का एक शेर है की ‘सुना है अम्न-परस्तों का वो इलाका है, वहीं शिकार कबूतर हुआ तो कैसे हुआ।’ बीते दिनों जिस तरह रामनवमी के मौके पर जुलूस और शोभायात्रा पर पथराव-आगजनी जैसी घटनाएं सामने आयी साथ ही हनुमान जयंती के मौके पर भी दिल्ली में मुस्लिम दंगाई भीड़ जिस तरह से शोभायात्रा पर हमले करती नजर आयी उससे ‘रिलिजन ऑफ पीस’ की कलई  खुल गयी। कहने को तो इस माहौल के बिगडऩे के पीछे लाउडस्पीकर विवाद माना जा रहा है।  दरअसल, पिछले कई दिनों से देश के अलग-अलग राज्यों में आजान का लाउडस्पीकर पर बजने का विरोध किया जा रहा है। कई पार्टियां और दिग्गज नेता साफ खुले शब्दों में कह रहे हैं कि अगर आजान का लाउडस्पीकर पर बजना बंद नहीं हुआ तो वो भी दिन में पांच बार हनुमान चालीसा लाउडस्पीकर पर बजाएंगे।

दरअसल, इस  हनुमान जयंती के मौके पर मुस्लिम अनुयायियों ने जिस तरह की हरकतें की उससे माहौल इतना बिगड़ गया कि बात दंगे में बदल गई। ये हंगामा उस दौरान हुआ है जब हनुमान जयंती की शोभायात्रा जहांगीरपुरी के कुशल सिनेमा के पास से गुजरी और उस पर पथराव हुआ। जानकारी के मुताबिक हिंसा के दौरान उपद्रवियों ने कई गाडिय़ों को नुकसान पहुंचाते हुए आग के हवाले कर दिया। लोग सड़कों पर इधर-उधर भागते दिखाई दिए। पत्थरबाजी करने वाली भीड़ के हाथों में डंडे और तलवार भी दिखाई दिए।  दिल्ली पुलिस के मुताबिक इस हिंसा में 6 पुलिसकर्मी समेत 7 लोग जख्मी हुए हैं।

तैयार थी साजिश

शोभायात्राओं पर हमले का क्रम देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया। जहांगीरपुरी में हनुमान जन्मोत्सव की शोभायात्रा पर भीषण हमला और आगजनी ठीक वैसे ही है, जैसा हम मध्य प्रदेश के खरगोन से लेकर गुजरात के खंभात और राजस्थान के करौली तक में देख चुके हैं। दिल्ली, गुजरात, झारखंड, बंगाल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में हुईं इन हिंसक घटनाओं के बीच समानताएं अगर किसी को न दिखती हो, तो उसे ‘आंख से अंधा नाम नैनसुख’ कह सकते हैं। जैसे-पहले शोभायात्रा पर हमला, फिर पूरी तैयारी के साथ आगजनी और हिंसा। वैसे भी पेट्रोल बम, तलवार, पिस्तौल के साथ अनगिनत पत्थरों, कांच की बोतलों का चलना, लक्षित आगजनी आदि अचानक नहीं हो सकतीं। हिंसा का भयावह सच वीडियो और सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा है। दिल्ली का वीडियो देखें। इसमें शोभायात्रा में लोग गाते-नारा लगाते चल रहे हैं और अचानक उन पर भारी संख्या में लोग हमला कर देते हैं। जितनी संख्या में हिंसा करते लोग दिख रहे हैं वे एकाएक नहीं जुट सकते। जाहिर है, सब सुनियोजित तरीके से किया गया और पहले से पूरी तैयारी थी।

टाइम्स नाउ हिंदी की एक रपट में एक वीडियो के जरिये खुलासा गया है कैसे जहांगीरपुरी में हमले की प्लानिंग पहले से की गयी थी। वहीं हिंसा से एक दिन पहले यानी 15 अप्रैल की रात का वीडियो भी सामने आया है।  इस वीडियो में लड़के लाठी-डंडे के साथ दिख रहे हैं। उसी रपट के अनुसार जिस मस्जिद के सामने से हिंसा शुरू हुई, उसके इमाम ने दंगे के मुख्य आरोपी अंसार को फोन कर बुलाया था। अंसार इमाम से मिला इसके बाद मस्जिद के सामने से निकल रही शोभायात्रा में शामिल कुछ लोगों से अंसार ने बहस की। ये बहस हिंसा में तब्दील हो गई। इस बीच मस्जिद का एक और वीडियो सामने आया है। वीडियो में कुछ लोग मस्जिद की छत पर नजर आ रहे हैं। मस्जिद की छत से पत्थरबाजी की गयी थी। हल्ला, हंगामा, एक-दूसरे को मार डालने की सनक, इससे पैदा हुआ खौफ। 2 मिनट 15 सेकंड के इस वीडियो में घंटों की बर्बादी और साजिश की पूरी कहानी छिपी है। वीडियो का एक-एक फ्रेम ये बताने के लिए काफी है कि हिंसा यूं ही तो नहीं भड़की इसकी तैयारी बड़ी थी और पहले से थी। मोबाइल कैमरे से इस वीडियो को किसी के छत से शूट किया है।

इसी तरह गुजरात के आणंद जिले के खंभात इलाके में पांच अप्रैल को एक धार्मिक जुलूस पर कब्रिस्तान से हुए हमले से भी अंदाजा लगाया जा सकता है की तयारी किस पैमाने पर थी। हमले के बाद गिरफ्तार लोगों से पता चला है कि उस हिंसा के पीछे वहां का एक मौलवी रजक पटेल था। मौलवी रजक घटना को अंजाम देने के लिए जिले के बाहर और कुछ विदेशी लोगों से आवश्यक धन की व्यवस्था को लेकर भी संपर्क में था। जैसे ही उसे पता चला कि रामनवमी जुलूस की अनुमति मिल गई है, तो उसने तीन दिन के भीतर पूरी व्यवस्था कर ली। जाहिर है, तैयारी पहले से हो रही होगी। कब्रिस्तान से पत्थर फेंकने की योजना इसलिए बनाई गई, ताकि पत्थरों की कमी न पड़े।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अवधेश कुमार, दैनिक जागरण में लिखते हैं ‘इन लोगों ने देश में शोभायात्राओं में हिंसा इसीलिए की, ताकि हिंदुओं के अंदर भय पैदा हो और वे आगे से यात्रा न निकालें। यह मानसिकता जुनूनी मजहबी घृणा से ही पैदा होती है और विश्व स्तर पर यह जिहादी आतंकवाद के रूप में हमारे सामने है। जिस तरह से कोई आतंकी मॉड्यूल योजना बनाकर हमला करता है, लगभग वैसा ही तौर-तरीका इनका भी है। यानी पहले बैठकें करना, उसमें शोभायात्राओं को कहां-कहां किस तरह निशाना बनाना है उस पर चर्चा करना, योजना बनाना, उन्हें अंजाम देने के लिए संसाधन जुटाना, मुख्य लोगों को तैयार करना या बाहर से बुलाना, आम लोगों को भड़काकर इसके लिए तैयार करना, शोभायात्रा आने के पहले घात लगाकर बैठना और अचानक हमला कर देना।’

आतंक का नया पैंतरा

इसमें कोई शक नहीं यह आतंक का नया चेहरा है। इसके पीछे कारण यह कहा जा सकता है की केंद्र से लेकर अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारों के कारण जिहादी और सांप्रदायिक तत्व कमजोर पड़ गए हैं। वे बड़ी साजिशों को सफल नहीं कर पा रहे। आतंकी हिंसा को अंजाम देने वाली ताकतें भी निराश हैं। इस कारण सीधे आतंकवादी हमले करने की जगह इन शक्तियों ने तरीका बदलने की शुरुआत की है। आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के विकल्प के तौर पर इस प्रकार की एकपक्षीय हिंसा और दंगा हमारे लिए नई चुनौती बनकर सामने आई है। राष्ट्रव्यापी साजिश रचने के पीछे पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) जैसे संगठनों का हाथ होने की भी बात सामने आ रही है। पीएफआई पहले से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है। इसके बावजूद यह संगठन एकपक्षीय सांप्रदायिक हिंसा की साजिशों को अंजाम देने में सफल हो पा रहा है, इसके पीछे कहीं ना कहीं  इन तमाम राज्य सरकारों की ढिलाई ही वजह हो सकती है। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में सख्ती से काम लिया गया और नतीजतन कोई अप्रिय घटना नहीं हुई, वैसी ही सख्ती आज वक्त की जरुरत बन गयी है।

इसे विडंबना नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे कि देश में सेक्युलरवाद और लिबरलवाद का झंडा उठाए कुछ लोगोंं के मुंह पर ताले लगे हुए हैं। यही हिंसा मुस्लिम धार्मिक जुलूस पर होती तो तूफान खड़ा हो चुका होता। संभव है टूलकिट भी बन जाती और दुनिया भर में प्रचार होता कि भारत में फासिस्ट शक्तियों का राज आ गया है, जो हिंदू धर्म के अलावा हर मजहब को हिंसा की बदौलत नष्ट करना चाहते हैं।  इतनी बड़ी हिंसा पर चुप्पी साधे रहना तो उनको झूठा और पाखंडी ही बनाएगा। जो भी हो,चाहे सरकारें हों या आम जनता, हम सबको इन घटनाओं के बाद ज्यादा गहराई से अपने सोच और व्यवहार पर विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि जैसा जफर सहबई कहते हैं की खुदा-ए-अमन जो कहता है खुद को, जमीन पर खुद ही मकतल लिख रहा है।

नीलाभ कृष्ण

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