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हिंसा परमो धर्म: वालों के लिए निष्कासन कानून जरूरी

हिंसा परमो धर्म: वालों के लिए निष्कासन कानून जरूरी

सनातन धर्म के अनुयायियों को सताना उन पर जुल्म करना मुस्लिम हमलावरों और मुगल राजाओं की सोच और आदत रही है। जिन्होंने इस्लाम के नाम पर नयी संस्कृति को जन्म दिया। दूसरे किसी भी धर्म को नष्ट करने का काम किया और यही पाठ आनें वाली पीढिय़ों को पढ़ाया। महमूद-गजनी और मुहम्मद गौरी तो बाहर से आये हुये हमलावर, चोर, डकैत थे जो माल लूटने आये। बाद में यहां राजाओं को अलग- अलग हिस्सों में बंटा देख राज गद्दी पर कब्जा करने का काम बाबर ने किया।

बाबर ने और उसके सिपहसालारों ने मंदिर गिरा कर या मंदिरों से सटे स्थानों पर मस्जिदें बनबाई। हिन्दु धर्म के लोगों पर हिंसा करने का अध्याय यहीं से शुरू हुआ जो उनके वंशजों ने भी जारी रखा। कभी इस्लाम का नाम लेकर कभी कुरान शरीफ का सहारा लेकर हिन्दुओं के धर्म को मिटाना और उनके देवी -देवताओं की मूर्तियों को नष्ट करना उनका रोज का काम हो गया। औरंगजेब ने तो मूर्तियों के हाथ पैर काटे, उनके नाक कान काटे। एैसी हाथ पैर कटी हुयी सैकड़ों मूर्तियां मैनें अपने स्कूल टाईम में तालाब के मंदिरों के पास ललितपुर में रखी देखी है। यह संस्कृति और विचार जो औरंगजेब जैसे नरसंहारी दे कर गये, उसे आज भी कुछ कट्टर मुसलमान धर्म के नाम पर अपनायें जा रहे हैं।

आजादी के बाद भारत के दो टुकड़े धार्मिक आधार पर हुये थे। पाकिस्तान मुसलमानों के लिये था जो मुसलमान भारत में रह गये उन्हें हिन्दुओं की तरह बराबर के सभी अधिकार मिले। कुछ अधिकार मुसलमानों को अलग से भी धर्म के नाम पर विशेष तौर से दिये गये। कुछ कट्टर मुसलमानों ने धर्म के नाम पर औरंगजेब वाली संस्कृति अपनाये रखी जिसे बंटवारे से पहले जिन्ना ने चलायी थी और डायरेक्ट एक्शन के नाम पर बगाल में दस हजार हिन्दुओं का कत्ल करवा दिया था।

आज विकास की ओर तेजी से बढ़ते भारत में मुगलिया, औरंगजेब की संस्कृति और पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री मुहम्मद अली जिन्ना की सोच का कोई स्थान नहीं है। जो धर्म के नाम पर हिंसक विचारों के मुसलमान हैं उन्हें अपनी सोच बदलनी होगी। मंदिरों पर हमले, शोभायात्राओं पर पत्थर फेंकना न तो सरकार होने देगी न उसे आज का हिन्दु बर्दाश्त करेगा। आजादी के बाद अक्सर देश में हिन्दु -मुस्लिम दंगे होते रहे और तत्कालीन सरकारें इसे नहीं रोक पायी। उत्तर प्रदेश इसमें सबसे अधिक प्रभावित रहा। समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री के समय सबसे अधिक दंगे-फसाद हुये जिसमें मुलायम सिंह के राज में बदायूं, गोरखपुर, कानपुर, लखनऊ आदि जगहों पर हुये दंगे भुलाये नहीं जा सकते। यही क्रम उनके पुत्र अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बननें के बाद जारी रहा। वोट बैंक की राजनीति ने मुसलमानों के तुष्टीकरण हेतु नियम कानून की सीमायें तोडऩे में कोई हिचक नहीं की। जिसकी एक बानगी हमें मुजफ्फरनगर के दंगों में देखने को मिली। हिन्दुओं के साथ अखिलेश राज में की गयी ज्यातियां और उनके एक प्रभावशाली मंत्री आजम खान पर दंगों को हवा देेने के आरोप लगे। मुजफ्फरनगर के दंगे समाज पर एक बदनुमा दाग छोड़ गये जिसे वहां के लोग शायद ही कभी भूल पायें।

बस इसी तरह हिन्दुओं पर हिंसा की प्रवृत्ति को राजनेता हवा देते रहे। दोनों धर्म के लोगों को बांट कर अपना उल्लू सीधा करते रहे। उसमें समय-समय पर अवसर पाकर हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान जो कभी हमारा ही अंग था, आग में घी डालनें का काम करता रहा। मुसलमानों को उकसाना, दंगों की फंडिंग करना, आतंकियों को भारत भेज कर उनसे हिंसा करवाना पाकिस्तान का स्थायी एजेंडा बन गया।

जबसे पाकिस्तान बना है आजादी मिलनें से लेकर आज तक पाकिस्तान का एक ही काम है, भारत में हिंसा करवाना और कश्मीर में अस्थिरता पैदा करना। एक भी एैसी घटना नहीं है कि कभी किसी धार्मिक जुलूस या जलसे में किसी हिन्दु या किसी हिन्दु संगठन ने कभी पत्थर फेंके हो। हिन्दुओं के धार्मिक आयोजनों पर पत्थर फेंके जाने की अनगिनत घटनायें हुयी है। इन सभी घटनाओं में कट्टरवादी मुसलमानों या संगठनों का हाथ पाया गया। कभी किसी अन्य अल्पसंख्यकों ईसाई, सिक्ख, पारसी, जैन, आदि ने ये काम नहीं किया। यह बात विचारणीय है।

कश्मीर में मकानों से आर्मी और पुलिस पर पत्थर फेंके जाते रहे, गोलियां चलायी जाती रही है सैकड़ों हजारों सेना और पुलिस के लोग मारे गये। इन घटनाओं में पाकिस्तानी आतंकवादी और स्थानीय कट्टर वादियों का हाथ रहा। हिंसा इस सीमा तक पहुंच गयी कि लाखों कश्मीरी हिन्दुओं और गैर मुस्लिम धर्मों के लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा गया और उन्हें कश्मीर छोड़कर जाना पड़ा। 370 धारा के हटनें के बाद और जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के बाद एैसी घटनायें काफी कम हो गयी। हालांकि पाकिस्तान अभी भी अपना आतंकवादी रवैया नहीं छोड़ रहा।

दिल्ली में शाहीन बाग के बाद जहांगीरपुरी में हुयी घटना ने मुस्लिम आतंकवादियों का चेहरा बेनकाब कर दिया जहां हिन्दुओं के शांतिपूर्ण जुलूस पर मुसलमानों की छतों से पत्थर फेंके गये। पुलिस पर भी गोली चलायी गयी। ये सब यकायक नहीं हुआ। गोरखपुर में मंदिर में घुस कर घटना को अंजाम देनी की साजिश पकड़ी गयी। मुस्लिम नेताओं के अलावा बहुत से हिन्दु राजनैतिक दलों के नेता अपनी राजनीति जिन्दा रखने के लिये इस तरह की घटनाओं पर खेद जतानें के बजाय हिंसा करने वालों के हमदर्द बन जाते हैं। देश को अस्थिर करने के लिये विदेशी ताकतें आतंकवादियों को फंड भेजती है।   पाकिस्तान तो आतंकवादियों को भी भेजता रहता है। माफिया गैंग भी इनमें लिप्त पाया गया है। दिल्ली के जहांगीरपुरी में जिन घरों की छतों से पत्थर फेंके गये वे सभी मुसलमानों के थे। सड़क पर घर बना कर कब्जा किया गया जिससे सड़कें संकरी हो गयी। संकरी सड़कों पर पत्थर मारना या गोली चलाना आसान हो गया। जब अनाधिकृत कब्जे हटानें कार्यवाही की गयी तो उसे रोकने के लिये राजनैतिक नेता और पार्टियां मुसलमान आतंकियों के पक्ष में खड़ी हो गयीं। ओवैसी जैसे मुस्लिम नेताओं ने तो धमकियां भी दे डाली। सरकारी जमीनों से अनाधिकृत कब्जा हटानें के खिलाफ खड़े हो गये।

हजारों लाखों लोग ईद पर नमाज पढ़ कर इकट्ठे निकलते है, ताजिया निकलते समय जुलूस में हजारों मुसलमान इक_े होकर चलते हैं, वारावफात आदि मुस्लिम त्याहारों पर जुलूस निकलते हैं लेकिन कभी किसी हिन्दु संगठन ने या किसी ग्रुप ने उन पर पत्थर नहीं फेंके। धार्मिक जुलूसों शोभायात्रा पर पत्थरबाजी का काम केवल मुसलमानों ने ही किया। हिन्दुस्तान कब तक ये बर्दाश्त करेगा। आजादी के बाद जो मुसलमान देश में रह गये। उन्हें बराबरी के अधिकार मिले। जिस क्षेत्र में भी हिंसक घटनायें होती है वे सभी मुस्लिम बाहुल्य होते हैं। देश की एकता विकास और रक्षा के लिये जनसंख्या नियंत्रण बिल को लाना और समान आचार संहिता कानून बनाना नितांत आवश्यक है। एैसी हिंसक शक्तियों, संगठनों, संप्रदायों या नेताओं से सरकार को शक्ति से निबटना होगा। इन्हें नेस्त-नाबूत करने के लिये सख्त कानून बनाना होगें अन्यथा ये हिंसक घटनायें, दंगे देश के विकास में रोड़ा अटकाने का काम करेंगे।

 

 

 

डॉ. विजय खैरा

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