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क्रूरता की गूंज में दब गई अधिकार की आवाज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) पर विशेष

क्रूरता की गूंज में दब गई अधिकार की आवाज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) पर विशेष

By आशा त्रिपाठी

देश में जिस तरह से महिलाओं का मजाक उड़ाया जा रहा है और उनके साथ क्रूरता से पेश आया जा रहा है, उसे देख अपने अधिकारों की बात करने में भी डर लगने लगा है। देश की बेटी निर्भया के बलात्कारियों का इंटरव्यू दिखाने से एक बार फिर से पूरे देश का जख्म हरा हो गया है। निर्भया कांड के गड़े मुर्दे उखाड़ते हुए ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब तलाशे बिना ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाना मुश्किल है। जिस तरह से भारत और भारतीयों की भावनाओं का खिलवाड़ किया गया है, उससे डॉक्यूमेंट्री निर्माता की साख और मंशा दोनों कठघरे में आ गए हैं। इस पूरे मामले में जिस तरह जल्दबाजी दिखाई गई है, उससे यह लगता है कि कुछ तो है जिसकी परदादारी है। क्या है ये परदादारी और क्यों ऐसा किया? डॉक्यूमेंट्री में देश की बहादुर बेटी निर्भया के साथ गैंगरेप करने वालों का इंटरव्यू है। जैसे ही इस डॉक्यूमेंट्री में मुजरिमों के इंटरव्यू की बात सामने आई पूरा देश गुस्से में उबलने लगा। संसद में जमकर हंगामा हुआ। सभी दलों के सांसदों के विरोध के बाद गृहमंत्री राजनाथ ने माना कि डॉक्यूमेंट्री के लिए मुजरिमों के इंटरव्यू की इजाजत की शर्तों का उल्लंघन किया गया। एक तरफ जब पूरा देश निर्भया के बलात्कारियों के इंटरव्यू पर गुस्से में था तो उसी वक्त इस डॉक्यूमेंट्री को दिखा दिया। सवा सौ करोड़ भारतीयों की भावनाओं की फिक्र भी नहीं रही। भारत सरकार और भारतीय संसद की भावनाओं की परवाह भी नहीं की। निर्भया बलात्कार पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ से छिड़ी बहस संसद से सड़क तक हो रही है।

मीडिया पर इस डॉक्यूमेंट्री का विरोध करने वाले लोगों को सबसे ज्यादा आपत्ति निर्भया कांड में दोषी करार दिए गए एक सजायाफ्ता कैदी के इंटरव्यू पर है। इस इंटरव्यू में उसने अपने किए पर किसी तरह का पछतावा दिखाने के बजाए पीडि़ता को ही दोषी ठहराया है। प्रोड्यूसर लेस्ली उडविन के साथ इस डॉक्यूमेंट्री पर काम करने वाले भारतीय पत्रकार दिबांग अपेक्षा के अनुरूप ही इसे दिखाए जाने की पुरजोर वकालत कर रहे हैं। वहीं बहुत लोगों को लगता है कि इससे समाज में गलत संदेश जाता है। केन्द्र सरकार ने ब्रिटिश मीडिया संगठन को कानूनी नोटिस भेजा है, जबकि भारत के कई लोग लैंगिक भेदभाव की ओर ध्यान दिलाने के लिए इस डॉक्यूमेंट्री को दिखाने की वकालत कर रहे हैं। दरअसल, निर्भया कांड के अभियुक्त मुकेश सिंह का इंटरव्यू तिहाड़ जेल के अंदर लिया गया। डॉक्यूमेंट्री दिखाने वाले टेलीविजन निदेशक डैनी कोहेन ने भारत सरकार में सूचना-प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव राकेश सिंह की चठ्ठी के जवाब में लिखा है कि हमें लगता है कि ‘इंडियाज डॉटर’ एक ग्लोबल समस्या के प्रति जागरूकता पैदा करती है जो एक व्यापक जनहित का काम है और हम इस फिल्म के संपादकीय मूल्यों से संतुष्ट हैं। हमें प्रोडक्शन कंपनी ने भी आश्वस्त किया है कि उन्होंने विस्तृत और सुविचारित इंटरव्यू करने के लिए सभी उचित प्रक्रियाओं का पालन किया है। दोषी के बयान को कई अन्य लोगों के बयान के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिनमें मृतका के माता-पिता, न्यायपालिका के पूर्व एवं

वर्तमान सदस्य और चश्मदीद शामिल हैं। बलात्कार के दोषी के इंटरव्यू को डॉक्यूमेंट्री में इसलिए शामिल किया गया, ताकि एक बलात्कारी की मानसिकता को समझा जा सके और इसका उद्देश्य बलात्कार को केवल भारत के स्तर पर ही नहीं, बल्कि उसके व्यापक संदर्भों में समझना है।

पिछले दिनों डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ ब्रिटेन में प्रसारित की गई। भारत में रोक के चलते इसे नहीं दिखाया गया, पर इंटरनेट के जरिए देश में काफी लोगों ने इसे देखा। महज तीन मिनट में करीब तीन हजार से अधिक लोगों ने इस डॉक्यूमेंट्री पर अपने विचारों को साझा किया। अधिकांश लोगों ने यही कहा कि इस डॉक्यूमेंट्री के बनाने और दिखाने का समर्थन किया जाना चाहिए। यह अभियुक्त के लिए मंच नहीं है, बल्कि यह समाज के एक तबके की उस मानसिता को उजागर करता है जो यह सोचते हैं कि बलात्कार के लिए बलात्कारी के बजाय पीडि़ता ही दोषी है। यह न भारत विरोधी है और न ही पुरुष विरोधी। यह एक बर्बर और अमानवीय कृत्य के खिलाफ आवाज है। कहते हैं कि डॉक्यूमेंट्री सच्चाई दर्शाता है। यह दिल्ली या भारत केंद्रित नहीं है, बल्कि बलात्कार की समस्या और इस तरह के जघन्य अपराध के कारणों को संबोधित करता है। जबकि कुछ लोग कहते हैं कि डॉक्यूमेंट्री पूरे भारत की बात नहीं करती। 125 करोड़ भारतीयों की भावनाओं के साथ यह खिलवाड़ है। यदि बलात्कारी की मानसिकता समझना ध्येय था तो डॉक्यूमेंट्री कई देशों से बलात्कारियों को लेकर बनाई होती। अमरीका में रेप के मामले सबसे अधिक हैं। महज दो-तीन लोगों की मानसिकता की वजह से आप 125 करोड़ भारतीयों की बेइज्जती नहीं कर सकते।

डॉक्यूमेंट्री महिलाओं के प्रति केवल कुछ भारतीय पुरुषों की मानसिकता को बताता है। इस मानसिकता के बदलने की जरुरत है, ताकि भविष्य में ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्में न बनाई जा सकें। डॉक्यूमेंट्री भारतीय पुरुषों की मानसिकता को खुले में लेकर आता है। आश्चर्यजनक यह भी है कि अधिकारी एक अपराधी के आपत्तिजनक शब्दों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय इस डॉक्यूमेंट्री के पीछे पड़े हैं। एक वकील कहता है कि अगर उसकी बेटी उसके परिवार के लिए शर्म का कारण बनती है तो वह उसकी हत्या कर देगा। ये ऐसे पुरुष हैं जो कभी औरत को बराबरी का दर्जा नहीं दे पाएंगे। भारत में एक बेटी की मां होने के नाते यह वाकई भयानक और परेशान करने वाला है। जब आवाज को दबा दिया जाता है या जब नफरत फैलाने वाले अपराधियों को अपने अपराधों को सही ठहराने दिया जाता है तब लोकतंत्र कहां होता है? महिलाओं पर बलात्कारी के विचार भारत या दुनिया भर में पुरुषों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। एक चैनल पर इस तरह के विचारों को मंच प्रदान करना इस तरह के अप्रिय विचारों को वैध बनाने और उनके साथ सहमत लोगों को बढ़ावा देना होगा। एक खौफनाक और दर्दनाक घटना पर डॉक्यूमेंट्री पर रोक नहीं होनी चाहिए। हमें मानना पड़ेगा कि हमारे समाज में इस तरह के विकृत रवैये से ग्रसित लोग हैं।

निर्भया पर बनी डॉक्यूमेंट्री पर कहीं ये सुनाई नहीं दे रहा कि इस फिल्म का मूल सवाल क्या है? क्या इस डॉक्यूमेंट्री से दुनिया में भारत की छवि खराब हो सकती है? फिल्म में बलात्कार के दोषी के इंटरव्यू को इजाजत कैसे दी गई? क्या इस फिल्म को बैन करना सही है? पर, ये कोई नहीं पूछ रहा कि अगर कोई फिल्म एक बार फिर कुछ ऐसे पुरुषों की सोच सामने लाती है जो बलात्कार जैसी हिंसा को अपने मन में सही ठहराते हैं, तो ये सोच हमारे समाज में कितनी गहरी है? और इसको बदलने के लिए सरकार, पुलिस और समाजसेवियों की कोशिशों में क्या कमी है? दिसंबर 2012 से बार-बार, बलात्कार और महिलाओं की सुरक्षा पर बात हो रही है। इसमें गर्व भी महसूस किया जा रहा है कि मुद्दे पर नजर तो है। कई महिलाओं ने पत्र लिखकर निर्भया के केस की अदालती कार्रवाई खत्म होने तक इस फिल्म को ना दिखाए जाने की मांग की है। ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन्स एसोसिएशन की अध्यक्ष कविता कृष्णनन ने कहा है कि बलात्कार करने वाले पुरुषों की मानसिकता दुनिया भर में ऐसी ही है। कहती हैं कि इसे ऐसी फिल्म में दोहराने से भारतीय मर्दों और गरीब तबके के लड़कों के बारे में गलत धारणाएं बनने का डर है। नाराजगी फिल्म के नाम से भी है। निर्भया को ‘इंडियाज डॉटर’ कहना भी ठीक नहीं है। ‘इंडियाज डॉटर’ बनाने वाली फिल्मकार लेस्ली उडविन खुद बलात्कार का शिकार हो चुकी हैं। फिर भी इस फिल्म में बलात्कार के दोषी व्यक्ति के विचार सामने रखना उन्होंने सही और जरूरी समझा।

भारत में महिलाओं का इतिहास काफी गतिशील रहा है। फिर भी महिलाओं के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, जो नहीं हो रहा है। आधुनिक भारत में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता आदि शीर्ष पदों पर रही हैं, फिर भी महिलाओं को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला है। यह अलग बात है कि भारत में महिला साक्षरता दर धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन यह पुरुष साक्षरता दर से कम है। लड़कों की तुलना में बहुत ही कम लड़कियां स्कूलों में दाखिला लेती हैं और उनमें से कई बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देती हैं। नेशनल सैम्पल सर्वे के आंकड़ें के मुताबिक केवल केरल और मिजोरम ने सार्वभौमिक महिला साक्षरता दर को हासिल किया है। ज्यादातर विद्वानों ने केरल मेंं महिलाओं की बेहतर सामाजिक और आर्थिक स्थिति के पीछे प्रमुख कारक साक्षरता को माना है, परंतु महिला साक्षरता के आधार पर हम अन्य देशों से आज भी पिछड़े हुए हैं। महिलाओं की इस दशा के लिए अगर देखा जाए तो पूरा देश जिम्मेदार है, क्योंकि हम आज हर क्षेत्र में अंग्रेजों की नकल करने में लगे हुये हैं। यूरोपीय सभ्यता के जनक माने जाने वाले प्लेटो ने अपनी किताब में लिखा है की ‘स्त्री एक उपभोग की वस्तु है’ जिसे हर तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। यूरोप के देशों में तो स्त्रियों की दशा देखने योग्य तक नहीं है। अब धीरे-धीरे वो यहां भी होने लगा है। आखिर वजह क्या है जो औरतों को कमतर आंका जाता है, जबकि स्त्री के बिना दुनिया खत्म हो जाएगी।

निर्भया कांड के बाद इतने शोर-शराबे और नए कानून बनने के बावजूद पूरे देश में बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। निर्भया कांड के बाद वादा किया गया कि ऐसी घटना फिर ना हो इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, फिर भी ऐसी घटनाएं रूकने का नाम नहीं ले रही हैं।

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