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ना चिंतन ना शिविर यह कैसी कांग्रेस?

ना चिंतन ना शिविर यह कैसी कांग्रेस?

उदयपुर में कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति की मीटिंग बड़े जोर-शोर से कुछ नया करने के लिये बुलाये जाने का शोर-शराबा किया गया पर उसमें नया कुछ भी नहीं हुआ। वही पुरानी बोतल में पुरानी शराब ही रही। इस शिविर का नया संकल्प चिंतन शिविर को नाम दिया गया। न तो उसमें कोई नया चिंतन हुआ और न ही कोई नये संकल्प की बात दिखाई दी। पिछली गलतियों को सुधारने के नाम पर पिछली गलतियों को ढकने का काम किया गया। हाल ही में उत्तर प्रदेश विधान सभा में बुरी तरह हार पर विचार करने के बजाय उस पर पर्दा डाला गया। उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी की कार्य प्रणाली पर कोई चर्चा तक नहीं हुयी। जबकि उनके नेतृत्व में कांग्रेस की एतिहासिक पराजय हुयी है। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश विधान सभा में 402 सदस्यों में 2 सीट ही मिल पायी। कई सदस्य इस पर चर्चा चाहते थे पर बिल्ली के गले में कौन घंटी बांधे।

बैठक में पुराना गांधी परिवार की जमकर चमचागिरी का राग अलापा गया। इस होड़ में उत्तर प्रदेश के नेता कांग्रेस के प्रवक्ता सबसे आगे निकल गये। प्रमोद त्यागी उर्फ प्रमोद कृष्णन ने प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाये जाने की पेशकश कर डाली। जो नेतृत्व उत्तर प्रदेश में पिछले दो चुनाव में फेल हो गया और पूरी ताकत झोंकनें के बाद भी कांग्रेस का ग्राफ और ज्यादा गिर गया ऐसे नेतृत्व और पार्टी संगठन पर और हार के कारणों पर बिन्दुबार चर्चा नहीं होने दी। प्रियंका गांधी को पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष की बागडोर संभालने पर चर्चा हुयी। गांधी परिवार की प्रशंसा में बाजी मारने के लिये पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी आगे आये। लोक सभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी और मल्लिकार्जुन खडग़े जैसे वरिष्ठ नेता ने कहा यदि राहुल गांधी तैयार नहीं हैं तो प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाये जाने की बात कही। किसी की हिम्मत नहीं हुयी जो राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वांड्रा के नेतृत्व पर या उनकी कार्य प्रणाली पर सवाल करता। त्र23 नेताओं ने भी मुंह सिल लिया। उन्हें पता था कि उनके बोलते ही वफादारी दिखाने के लिये कुछ लोग तुरन्त उनकी खबर ले लेंगे। उन्होंने चुपचाप रहने में ही अपनी बेहतरी समझी।

परिवर्तन की बात पर नवयुवकों को लाने की बात हुयी, एक परिवार को एक ही टिकट दिये जाने की बात हुयी पर नेतृत्व परिवर्तन पर कोई बात नहीं हुयी। अस्थायी रूप से पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद संभालने वाली सोनिया गांधी पर एक शब्द भी नहीं बोला गया। मतलब साफ है कि किसी भी सदस्य को स्वतंत्र रूप से विचार प्रकट करने की आजादी नहीं थी। ऐसा लगता है कि सोनिया, राहुल या प्रियंका की प्रसंशा करते हुये उनके ऊपर किसी तरह की उंगली बिना उठाये हुये ही लोगों को बोलना था।

पार्टी की तदर्थ अध्यक्ष नेे पद त्याग कर सर्वमान्य नेतृत्व की बात तक नहीं की और ऊपर से लेकर दे दिया कि अब नहीं सुधरे तो खत्म हो जायेंगे। सवाल ये है कि सुधरना किसे है किसके कारण खत्म होते जा रहे हैं। इस पर कोई बात हुयी होती तो शायद कोई नतीजा इस बैठक से निकल सकता था। चलो ये मान लें कि नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में कांग्रेस पार्टी के पास काफी कमजोर नेतृत्व है पर इससे पार्टी समाप्त तो नहीं हो जायेगी। पार्टी नवयुवक नेताओं को आगे बढ़ायेगी पर नये नेता को नेतृत्व नहीं दिया जायेगा और यदि परिवर्तन करना पड़ा तो वह मात्र नाम का या दिखावे का होगा। सोनिया के पुत्र की जगह अब उनकी पुत्री की ताजपोशी की बात चलने लगी।

हमेशा की तरह कई कमेटियां बनी, उनके संयोजक बने, पर वही पुराने लोग। कोई नयी ठोस बात सामने नहीं आयी। राजनैतिक मामलो पर बनी कमेटियां कोई नई बात नहीं सुझा सकी। बुरी तरह फेल हुये भ्रष्टाचार में, महीनों जेल में रहे पी. चिदम्बरम ने मंहगाई पर चर्चा की पर कोई ठोस प्रस्ताव या नयी बात के अभाव में उनकी आवाज दबी रह गयी। रोजगार, किसान, पार्टी संगठन आदि की बात हुयी पर लगभग सब कुछ बेमानी रहा।

सरकार के खिलाफ आवाज उठानें की नयी रणनीति नहीं बन पायी। आर्थिक मोर्चो पर कोई भविष्य को ध्यान में रखकर जनता का ध्यान आकर्षित करने का रास्ता सामनें नहीं आया। किसी नेता ने जाति गणना, महिला आरक्षण और ट्रांसजेंडर  को साथ लेने की बात कही। पर कोई बताये जाति गणना से लोगों को या देश का क्या नया फायदा होने वाला है। केवल हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा जो कृषि कमेटी के संयोजक थे ने अवश्य डैच् पर कानून बनाये जाने और कृषि आयोग द्वारा कर्जा माफी की  बात सामने रखी। यह एक गंभीर विषय है और इससे किसानों को खुश किया जा सकता है।

राजनैतिक कमेटी के संयोजक गुलाम नबी आजाद मुखर होकर नहीं बोले। वे शायद तारिक अनवर के बढ़ते कद को लेकर चिंतित रहे हों। वे कोई ऐसी बात नहीं करना चाहते थे जो थोड़ी भी गांधी परिवार के किसी सदस्य को बुरी लगे या लोग उसे बड़ा-चड़ा कर उसका लाभ उठा पायें। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिन्हें पार्टी हमेशा आर्थिक सुधारों का प्रणेता प्रदर्शित करती है, कोई नयी दिशा देने वाली बात नही लाये। वैसे भी उनकी आर्थिक नीतियां नरेन्द्र मोदी के आगे बेकार और बौनी साबित हो रहीं हैं। मनमोहन सिंह तो शुरू से ही किसी तरह की कोई सब्सिडी दिये जाने के खिलाफ रहे है। कांग्रेस के पचमढ़ी सम्मेलन में उन्होनें आर्थिक कमेटी के संयोजक के रूप में डीजल आदि पर सब्सिडी बन्द करने की बात कही थी पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता अर्जुन सिंह के विरोध के कारण प्रस्ताव पास कराने में असफल रहे थे। अर्जुन सिंह ने उनके प्रस्ताव को किसान विरोधी बताया था और किसानों के पार्टी से दूर हो जाने की बात कही थी। कमेटियां तो बनी उनके संयोजक भी पार्टी के पुराने वरिष्ठतम नेता भी बने, पर उन्हें  कमेटियों के अधिकांश सुझाव वही पुराने घिसेपिटे थे एैसी कोई बात नहीं दिखाई दी जिससे लगे की पार्टी को कोई नयी दिशा मिलने वाली है। बड़ी-बड़ी बातें कहीं गयी जैसे आमूल चूल परिवर्तन। पर क्या आमूल-चूल परिवर्तन है या होने वाला है या होगा इसे कोई नहीं समझ सका। हिन्दुत्व और हिन्दुज्म की बात केवल राहुल गांधी को खुश करने के लिये कही गयी क्योंकि वही इसमें फर्क की बात करते रहते हैं पर इस बात का कोई मतलब न था, न निकला। इसको आगे बढ़ाने से मन में भय भी था कि भारतीय जनता पार्टी इसे ही अगले लोक सभा चुनाव में मुद्दा बना कर इनके ही गले में न फांस दे।

पार्टी संगठन में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछडा और महिलाओं के लिये 50 प्रतिशत आरक्षण दिये जायेंगे। इसके पहले महिलाओं को 50 प्रतिशत टिकिट दिये जानें की बात प्रियंका गांधी कह चुकी है पर पार्टी ने उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव में इसे अमल नहीं किया और बहुत कम टिकिट महिलाओं को दिये। अभी तक संगठन में महिलाओं को 25 प्रतिशत पद तक नहीं दिये गये। कांग्रेस कार्य समिति में आधे सदस्य पार्टी अध्यक्ष द्वारा नामित किये जाते है। उन तक में 50 प्रतिशत  तो क्या 25 प्रतिशत  महिला सदस्य कभी नामित नहीं हुये और वर्तमान में भी यही स्थिति है। प्रदेश अध्यक्षों में शायद ही कोई महिला हो यानि ये बात भी प्रियंका गांधी को खुश करने के लिये कही गयी। संगठन में एैसा हो पायेगा कठिन लगता है और टिकट वितरण के लिये तो ये कहा ही नहीं गया।

कुल मिलाकर इस मींटिग का एजेण्डा कांग्रेस की पिछले विधान सभा चुनावों में पांचों प्रदेशों में हुयी बुरी तरह हार पर पर्दा डाल कर नेतृत्व के खिलाफ उठी हल्की दबी आवाज को कुचलना था। त्र23 के नेताओ को उनकी औकात दिखाने का था और गांधी परिवार के नेतृत्व में आस्था जताने का था और अधिवेशन इसमें पूरी तरह सफल रहा। पिछले चुनावों में लगातार हो रही कांग्रेस की पराजय पर गांधी परिवार के विजय की मुहर लग गयी।

 

डॉ. विजय खैरा

 

 

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