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क्या ज्ञानवापी मंदिर पर मिलेगा इन्साफ?

क्या ज्ञानवापी मंदिर पर मिलेगा इन्साफ?

1991 से अदालतों के कटघरों में उलझा ज्ञानवापी का विवाद निर्णायक मोड़ में पहुंच चुका है। वाराणसी जिला न्यायालय के आदेशानुसार विवादित ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में कड़ी सुरक्षा के बीच वीडियोग्राफी सर्वेक्षण किया गया है। इस सर्वेक्षण में ‘शिवलिंग’ पाया गया है और अदालत ने इस क्षेत्र की सुरक्षा करने एवं इसे सील करने के आदेश दिए हैं। इस सर्वेक्षण को रुकवाने के लिए मुस्लिम पक्ष उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा, हालांकि शुरुआती दिक्कतों के बाद यह काम पूरा हुआ। यह कानूनी विवाद अभी अपने शुरुआती चरण में हैं और इसे अपनी परिणति तक पहुंचने के लिए कई सोपान तय करने है और इसका अंतिम परिणाम क्या होगा, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। फिर भी, ज्ञानवापी का अभी तक का कानूनी इतिहास देखना भी दिलचस्प है। ज्ञानवापी मस्जिद का मामला 1991 से अदालत में है। तब काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों के वंशज पंडित सोमनाथ व्यास के साथ दो अन्य लोगों ने वाराणसी की सिविल जज अदालत में मुकदमा दायर करके यह दावा किया कि विवादित मस्जिद वस्तुत: औरंगजेब द्वारा मंदिर को ढहाकर उसके स्थान पर बनाई गई है। जिस स्थान पर आज मस्जिद है, वहां मस्जिद बनाए जाने से पहले भगवान विश्वेश्वर का मंदिर था, इसलिए यह स्थान उन्हें वापस किया जाए। इसके बाद 18 अगस्त 2021 को वाराणसी की इसी अदालत में पांच महिलाओं ने मां श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा करने की मांग करते हुए याचिका दायर की। इस पर अदालत ने मां श्रृंगार गौरी मंदिर की वर्तमान स्थिति जानने के लिए अदालत आयुक्त नियुक्त किए और मां श्रृंगार गौरी मूर्ति एवं ज्ञानवापी परिसर की वीडियोग्राफी कर सर्वेक्षण रिपोर्ट देने का आदेश दिया। शुरुआत में मुस्लिम पक्ष के हंगामे के कारण वीडियोग्राफी सर्वेक्षण नहीं हो पाया। हालांकि अंतत: न्यायालय की तल्ख टिप्पणियों के बाद और कड़ी सुरक्षा के बीच 14 अप्रैल को सर्वेक्षण शुरू हुआ।

ज्ञानवापी का विधिक इतिहास वस्तुत: 1936 में भारत की स्वतंत्रता से शुरू होता है। तब से लेकर अब तक ज्ञानवापी ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, हालांकि यह लेख इस पवित्र स्थल की कानूनी पेजीदगियों के बारे में नहीं है। यह लेख वस्तुत: इस बारे में है कि भारत में इस्लामी आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए धर्मस्थलों के बारे में मुस्लिम पक्ष के तर्क एवं नैरेटिव किस तरह मनमाने ढंग से बदलते रहते हैं। अयोध्या के मामले में तर्क कुछ और होता है, तो ज्ञानवापी के मामले में कुछ और। बाबरी मस्जिद में पुराने मंदिर कोई चिह्न शेष नहीं था, इसलिए मुस्लिम पक्ष यह मानने को तैयार नहीं था कि मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य एस क्यू आर इलियास ने मीडिया से साफ-साफ कहा, ”हमने हमेशा यह कहा है कि अगर कोई यह प्रमाणित कर दें कि मंदिर को पहले तोड़ा गया था और फिर मस्जिद बनाई गई थी तो हम यह स्थान छोड़ देंगे। इस्लामी शरीयत कहती है कि अवैध जमीन पर या जमीन पर कब्जा करके मस्जिद नहीं बनाई जा सकती।” ज्ञानवापी में यह तर्क हवा हो जाता है। यहां कानूनी पेचीदगियों के पीछे छिपने का प्रयास किया जा रहा है। इस दोहरे मापदंड का कारण क्या है? इसका एकमात्र कारण यह है कि बाबरी में जो सच्चाई जमीन के नीचे छिपी थी, ज्ञानवापी में वह सच्चाई दीवारों पर अंकित है। मुस्लिम पक्ष भी यह जानता है कि इस मामले में मंदिर नहीं तोड़े जाने का तर्क टिक नहीं पाएगा। मस्जिद पर सरसरी नजर ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि मस्जिद किन दीवारों पर खड़ी है। इसके अलावा इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध हैं कि औरंगजेब ने 1669 में गर्वनर अबुलहसन को आदेश देकर प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तुड़वाया था। अब प्रश्न है कि अयोध्या में मुस्लिम पक्ष के लिए मंदिर तोड़कर बनाई गई मस्जिद शरीयत के अनुसार अवैध थी तो ज्ञानवापी में ऐसी ही मस्जिद वैध कैसे हो गई।

यह कहानी किसी एक मंदिर या एक स्थान की नहीं हैं बल्कि आज के पाकिस्तान-बांग्लादेश सहित पूरे भारत की है। 700 ई. के समय से भारत ने इस्लामी आक्रमणकारियों के सबसे भयानक हमलों को झेला है। कट्टर इस्लाम से प्रेरित आक्रमणकारियों ने मात्र लूटपाट ही नहीं की बल्कि बड़े पैमाने पर हिंदू धर्मस्थलों और श्रद्धा केंद्रों को भी तोड़ा। यह विध्वंस इस्लाम में मूर्तियों और मूर्ति पूजकों के लिए व्याप्त हेय दृष्टि और घृणा पर आधारित था। देशज संस्कृति पर ऐसे वीभत्स और लगातार हमलों का विश्व में शायद ही कोई समकक्ष उदाहरण हो। हालांकि इन वीभत्स हमलों के 1000 से अधिक वर्षों के बाद जब भारत को अंतत: स्वतंत्रता मिली तो क्या हिंदुओं को न्याय मिल पाया? इसका उत्तर है नहीं। बल और हिंसा के बुते हिंदुओं से छीने गए धर्मस्थल आज भी उनके अधिकार में नहीं हैं। बर्बर कट्टरपंथियों द्वारा कब्जाए गए ये स्थल आज भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं। इस देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था ने न्याय करने के बजाय मात्र अन्याय बरकरार रखने के लिए ही प्रयास किए हैं।

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का दौर समाप्त होने के बाद सत्य और सुलह आयोग गठित किया गया था। इसके पीछे मंतव्य यह था कि अश्वेत लोगों को रंगभेद के दौरान होने वाले अन्यायों के प्रति न्याय और समापन बोध मिल सके। यही व्यवस्था भारत में क्यों नहीं होनी चाहिए थी। इतिहास में हुए अपराधों के लिए बेशक इतिहास के अपराधियों को दंडित नहीं किया जा सकता परंतु ऐतिहासिक लूट-खसोट से इकठ्ठी की गईं संपत्तियां तो उनके वैध उत्तराधिकारियों को लौटाई जा सकती हैं। दक्षिण अफ्रीका के सत्य और सुलह आयोग की तर्ज पर भारत में भी ऐसा तथ्यान्वेषी आयोग बनाया जाना चाहिए जो भारत में विदेशी आंक्राताओं के विध्वंस के शिकार हुए धर्मस्थलों के बारे में तथ्य इकठ्ठे करे और इन धर्मस्थलों को मूल स्वामियों को वापस लौटाए।

प्रेरणा कुमारी

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