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ज्ञानवापी: आदिकाल से अब तक

ज्ञानवापी: आदिकाल से अब तक

वाराणसी: दुनिया के इस सबसे प्राचीन शहर को आधुनिक इतिहासकारों ने ‘Older Than History’ यानी ‘इतिहास से भी पुराना’ जैसा विशेषण दिया है। जो भी व्यक्ति अपनी ज़िंदगी में एक बार भी बनारस गया हो, उसे ये महसूस होता है कि इस शहर में कुछ ना कुछ खास तो जरुर है। जो कि आपको अपनी तरफ खींचता है।

हर तरफ प्राचीन मंदिर और उसमें भक्तों की भीड़, अद्भुत स्वाद वाली कचौरियों और मिठाइयों की दुकानें, साड़ियों कपड़ों और तरह तरह के सामानों से सजे दमकते बाजार, आधुनिक शिक्षा के केन्द्र बीएचयू जैसे संस्थान और उसके जिज्ञासु छात्र, चाय के अड्डे, पान और भंग छानती ठंडई की छोटी गुमटियां, आधुनिक रेलवे स्टेशन, संगीत विद्यालयों से उठती हुई मधुर स्वर लहरियां, यात्रियों को अपनी तरफ खींचते गंगा नदी के घाट।

दूसरी तरफ कभी ना बुझने वाले श्मशान में लगातार पहुंचते हुए शव, पूरे शरीर में भस्म लपेटे हुए संन्यासी और अघोरी, भिखारियों की भीड़, संकरी गलियों में घूमते विशालकाय सांड और गाय, स्थानीय लोगों की जुबान पर सजी गालियां। जो कि आपको आश्चर्य में डालती हैं कि एक ही शहर में इतना आकर्षण और विकर्षण कैसे हो सकता है?

ज्ञानवापी परिसर के सामने नंदी का चित्र, अंग्रेजों के जमाने की खींची हुई फोटो

बनारस(Benaras) वैसे तो भगवान विश्वेश्वर की नगरी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी(PM Modi) का निर्वाचन क्षेत्र होने की वजह से हमेशा चर्चा में रहता है। लेकिन इन दिनों एक बेहद खास वजह से पूरी दुनिया का ध्यान वाराणसी पर ही टिका हुआ है। वो है ज्ञानवापी..जिसके मंदिर या मस्जिद होने पर विवाद चल रहा है। ये मामला अदालत हैं। तो जानते हैं कि आखिर क्या है ज्ञानवापी और क्यों ये चर्चा बटोर रहा है?

ज्ञानवापी अर्थात् ज्ञान का कुंड

ज्ञानवापी एक बेहद प्राचीन शब्द है। इसका उल्लेख सनातन ग्रंथों में कई जगह मिलता है।

स्कंद पुराण के काशी खंड में बनारस के 62 कुंडों का उल्लेख है। जिसमें ज्ञानवापी को सर्वप्रमुख माना जाता है, क्योंकि इसे भगवान शिव ने स्वयं अपने त्रिशूल से बनाया था। कहते हैं ज्ञानवापी का अस्तित्व तब से है जब गंगा का धरती पर अवतरण नहीं हुआ था। उस समय जल के लिए वाराणसी के लोग ज्ञानवापी पर ही निर्भर थे।

शिवपुराण के अध्याय 21 के पृष्ठ संख्या 1093 में लिखा है कि भगवान शिव ने आदेश दिया कि हे अविमुक्तेश्वर, तुम मेरा अंश हो, तुम काशी को कभी नहीं छोड़ना। इसी अविमुक्तेश्वर लिंग के स्नान के लिए शिव ने अपने त्रिशूल से ज्ञानवापी का निर्माण किया।

लिंग पुराण में 6 प्रमुख वापियों यानी भूमिगल जल स्रोत वाले कुओं का जिक्र आता है। जिसमें से-

  • पहली वापी ज्येष्ठा वापी है। जो कि काशीपुरा मे थी। यह अब लुप्त हो गई है।
  • दूसरी वापी ज्ञानवापी है। जिसपर विवाद चल रहा है। यह वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर के उत्तर में है। इसका नाम ज्ञानवापी इसलिए है क्योंकि भगवान शिव के आशीर्वाद से उत्पन्न हुए इस कुंड का जल भक्तों को ज्ञान देता है। इसके जल का पान करने से ज्ञान के चक्षु खुल जाते हैं और श्रद्धालुओं को सभी तरह का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। ज्ञानवापी के ही बगल में संसार प्रसिद्ध भगवान विश्वेश्वर का प्राचीन मंदिर और शिवलिंग स्थापित है। जिसे अविमुक्तेश्वर के नाम से जाना जाता है। ये भक्तों को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं। इनके नाम लेने मात्र से उद्धार हो जाता है। नीचे अंग्रेजों के जमाने में खींची गई ज्ञानवापी की फोटो आप देख सकते हैं।

  • तीसरी वापी का नाम कर्कोटक वापी, जो नागकुआं के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें लगातार जल भरा होता है। जिसके अंदर शिवलिंग उपस्थित है। नाग पंचमी के दिन इस कुएं का जल निकालकर शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है।
  • चौथी वापी का नाम है भद्रवापी, जो भद्रकूप मोहल्ले में है।
  • पांचवीं वापी है शंखचूड़ा वापी, जो कि अब लुप्त हो गई।
  • छठी वापी है सिद्ध वापी, जो कभी बाबू बाज़ार मे थी और अब लुप्त हो गई।

ज्ञानवापी मंदिर का इतिहास

दुनिया में जहां कहीं भी प्राचीन शिवमंदिर होता है। उसके बगल में जल स्रोत जरुर होता है। यह परंपरा हर ज्योतिर्लिंग में है। ठीक उसी तरह अविमुक्तेश्वर भगवान विश्वनाथ के मंदिर के पास में ज्ञानवापी का जल स्रोत स्थित था। वैसे तो ये मंदिर आदिकाल का था। लेकिन काल के थपेड़ों से जब यह जीर्ण हो गया तब संसार प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य ने अब से लगभग 2050 साल पहले इसका जीर्णोद्धार कराया।

प्राचीन काल से इस मंदिर की महत्ता अक्षुण्ण रही। यहां श्रद्धालु दर्शन के लिए आते रहे। लेकिन इतिहास में मुस्लिम काल शुरु होने के बाद इस मंदिर पर संकट के बादल मंडराने लगे।

  • 11वीं शताब्दी में हमलावर महमूद गौरी ने बनारस के मंदिरों को तोड़ने का जिम्मा अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिया। जिसने प्राचीन अविमुक्तेश्वर मंदिर समेत बनारस के 1000(एक हजार) मंदिर तोड़ दिए। बाद में गोरी ने कुतुबुद्दीन को भारत का शासक बना दिया और लौट गया। सन् 1197 में कुतुबुद्दीन ने बनारस में एक मुस्लिम प्रशासक की नियुक्ति की। जिसने सनातन प्रतीकों पर काफी जुल्म किए।
  • 1296 ईस्वी में बनारस के लोगों ने अविमुक्तेश्वर मंदिर को मुक्त करा लिया और उसपर फिर से भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।
  • 14वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में बनारस के मंदिर फिर से तोड़ दिए गए। उस समय जौनपुर के शर्की शासकों ने मंदिर तुड़वाने का जिम्मा उठाया। इसके बाद बहुत समय तक मंदिर खंडहर बना रहा। 15 वीं शताब्दी में सिकंदर लोदी के समय में फिर से बनारस के मंदिरों पर हमला किया।
  • साल 1585 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर के शासन काल के दौरान उनके नवरत्नों में से एक वित्त मंत्री टोडरमल से उनके गुरु नारायण भट्ट ने आग्रह किया कि भगवान विश्वेश्वर के मंदिर का पुनर्निर्माण कराया जाए। जिसके बाद शास्त्रीय विधि विधान से ज्ञानवापी कुंड के बगल में विश्वनाथ मंदिर को फिर से बनाया गया। जिसके बाद अगले 84 सालों तक वहां पूजा अर्चना होती रही। इस बीच जहांगीर और शाहजहां ने भारत पर शासन किया। लेकिन पूजा जारी रही।
  • लेकिन इसके बाद अकबर के धर्मांध पोते औरंगजेब का शासन काल शुरु हुआ। जिसने साल 1669 में बनारस के सभी मंदिरों को तोड़ने का आदेश जारी किया। उसी दौर में ज्ञानवापी के उपर मस्जिद का निर्माण किया गया। जो कि वर्तमान समय में भी खड़ी है। इस मस्जिद के निर्माण के लिए मंदिर के टूटे हुए मलबे का इस्तेमाल किया गया। जिसे जेम्स प्रिंसेप नाम के अंग्रेज कलाकार द्वारा आजादी से पहले बनाई हुई तस्वीर में देखा जा सकता है।

लिखित इतिहास है प्रमाण

वर्तमान समय में मुसलमान मौलवी और कट्टरपंथी औरंगजेब द्वारा मंदिर ढहा दिए जाने को नकार रहे हैं। लेकिन उनका झूठ इसी बात से साबित हो जाता है कि औरंगजेब के जमाने में दर्ज इतिहास में मंदिर को तोड़ दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

औरंगजेब ने 8 अप्रैल 1669 को अपने सूबेदार अबुल हसन को विश्वनाथ मंदिर तोड़ने का आदेश दिया। जिसके पांच महीने बाद यानी सितंबर 1669 को अबुल हसन ने औरंगजेब को जवाब में कि ‘मंदिर को तोड़ दिया गया है और उस पर मस्जिद बना दी गई है।’औरंगजेब का यह फरमान अपने मूल स्वरुप में एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित रखा हुआ है।

इसके अलावा औरंगजेब के दरबार में रोजनामचा दर्ज करने वाले इतिहासकार लेखक साकी मुस्तइद खां की लिखी हुई किताब ‘मआसिर-ए- आलमगीरी’ में विश्वनाथ मंदिर के ध्वंस का वर्णन है। मुस्तइद खान ने अपनी किताब में लिखा है कि औरंगजेब को ये सूचना मिली थी कि तत्ता, मुल्तान और विशेष तौर पर बनारस के ब्राह्मण झूठी शिक्षा (इस्लामी नजरिए से) का प्रसार कर रहे हैं और उनके बहकावे में मुसलमान भी आ रहे हैं। जिससे नाराज होकर आलमगीर ने बनारस के सभी मंदिरों को तोड़ने का आदेश दे दिया। इस किताब का फारसी से अंग्रेजी में अनुवाद प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने किया था। जिसमें से औरंगजेब के आदेश की तस्वीर उपर लगाई गई है।

ऐतिहासिक ज्ञानवापी पर आज भी मस्जिद बनी हुई है। लेकिन अविमुक्तेश्वर मंदिर टूटने के बाद सनातनी जनता में बेहद निराशा फैल गई थी। जिसे दूर करने करने के लिए मंदिर टूटने के 108 साल बाद यानी साल 1777 में मालवा की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने प्राचीन ज्ञानवापी परिसर के बगल में काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया। जिसके बाद साल 1828 में नेपाल के राजा ने विश्वनाथ मंदिर में शिव वाहन नंदी की प्रतिमा को स्थापित किया। लाहौर के सनातनी सिख महाराजा रणजीत सिंह ने विश्वनाथ मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया। यही मंदिर आज आस्था का केन्द्र बना हुआ है।

लेकिन अविमुक्तेश्वर का मूल स्थान और ज्ञानवापी कुंड पर आजादी के 75 सालों बाद भी हिंदुओं को पूजा का अधिकार नहीं मिल पाया है। जिसके लिए कानूनी लड़ाई चल रही है। इस बीच अंग्रेजों के जमाने में हिंदुओं ने एक बार ज्ञानवापी पर कब्जा करने की कोशिश की थी।

अंग्रेजों के जमाने में ज्ञानवापी विवाद

भारत के अंग्रेजों के शासनकाल (British rule in India) तक हिंदुओं ने काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) मंदिर से संतोष कर लिया था और वहां पूजा अर्चना जारी थी। लेकिन ज्ञानवापी पर कब्जे की कसक हर सनातनी के हृदय में थी। जिसमें चिंगारी तब लगी, जब साल 1809 में मुहर्रम के समय बनारस के स्थानीय मुसलमानों ने ज्ञानवापी परिसर में गोहत्या की और उसका खून पवित्र ज्ञानवापी में बहा दिया। जिसे देखकर हिंदू भड़क गए।

अंग्रेजों के रिकॉर्ड के मुताबिक उस समय बनारस का हर हिंदू हथियार लेकर उतर आया और पूरे शहर में दंगा फैल गया। अंग्रेज सरकार ने बेहद मुश्किल से इस दंगे को दबाया। जिसके बाद अंग्रेज सरकार के मजिस्ट्रेट डीएम वाटसन ने पूरे मामले की जांच शुरु की और दंगा भड़काने के लिए मुसलमानों को गुनहगार माना। अंग्रेजों ने पूरे ज्ञानवापी परिसर का एक नक्शा बनाया था। जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह मंदिर का परिसर है। वह नक्शा कुछ इस प्रकार है।

मजिस्ट्रेट वाटसन ने 23 मार्च 1810 को ये अनुशंसा की थी कि मुसलमानों को इस पूरे परिसर से बाहर कर दिया जाए और पूरा इलाका हिंदुओं को सौंप दिया जाए। क्योंकि मुस्लिम समुदाय के पास इस संपत्ति का मालिकाना हक नहीं है। उन्होंने इसपर जबरन कब्जा कर रखा है। लेकिन अंग्रेज सरकार ने अपने अधिकारी की इस सलाह को नहीं माना। क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर इस सिफारिश को मान लिया गया तो बेवजह विवाद भड़क जाएगा और अंग्रेजी सरकार की प्रशासनिक मशीनरी हिंदू-मुसलमानों के बीच के दंगों को सुलझाने में उलझ जाएगी। जिसकी वह से अंग्रेजों ने ज्ञानवापी परिसर की यथास्थिति बहाल रखी।

ज्ञानवापी परिसर की वर्तमान कानूनी स्थिति

वर्तमान समय में हिंदू पक्ष का दावा है कि ज्ञानवापी परिसर पर औरंगजेब के जमाने में जबरदस्ती कब्जा किया गया और मस्जिद बना दी गई। इस विवादित ढांचे के नीचे भगवान विशेश्वर का स्वयम्भू ज्योतिर्लिंग स्थापित है। पूरा ज्ञानवापी इलाका एक बीघा, नौ बिस्वा और छह धुर में फैला हुआ है। हिंदू पक्ष अपने दावे के पक्ष में पूरे ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण कराना चाहता है। जिससे कि यह साबित हो सके कि इस इलाके पर जबरदस्ती कब्जा करके मस्जिद बना दी गई है।

लेकिन मुस्लिम समुदाय हिंदू पक्ष के दावे का विरोध कर रहा है और साल 1991 में बनाए गए प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का हवाला दे रहा है। जिसके मुताबिक आजादी के समय यानी साल 1947 में जिन ऐतिहासिक इमारतों की जो स्थिति थी वही बहाल रहनी चाहिए। मुस्लिम समुदाय मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाए जाने से भी इनकार करता है।

अदालतों में ज्ञानवापी को लेकर कुछ इस तरह लड़ाई जारी है-

साल 1991 में वाराणसी की स्थानीय अदालत में याचिका दायर करके ज्ञानवापी परिसर में पूजा के साथ मस्जिद को ढहाने की मांग की गई।

– साल 1998 में अंजुमन इस्लामिया मस्जिद कमिटी की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्रवाई पर स्टे लगा दिया।

– साल 2019 में वाराणसी जिला अदालत में ज्ञानवापी परिसर का आर्कियोलोजिकल सर्वे कराए जाने की मांग करते हुए एक याचिका लगाई गई।

-साल 2020 में मस्जिद कमेटी ने ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण कराए जाने का विरोध किया।

– साल 2020 में ही याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा स्टे की अवधि नहीं बढ़ाए जाने के कारण स्थानीय अदालत से फिर से सुनवाई शुरु कराने का आग्रह किया।

– 17 अगस्त 2021 को वाराणसी की 5 महिलाओं ने ज्ञानवापी परिसर में स्थित मां श्रृंगार गौरी की प्रतिमा की पूजा किए जाने का अनुमति मांगते हुए अदालत में याचिका दाखिल की।

-26 अप्रैल 2022 को स्थानीय अदालत ने ज्ञानवापी परिसर में वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण का आदेश दिया।

-6 मई 2022 को पुरातत्व विभाग(ASI) ने सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी का काम पूरा किया।

– अदालत की कार्यवाही अब तक जारी है……..

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