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शुक्रवार : पत्थरवार!

शुक्रवार : पत्थरवार!

 

 

 

 

दीपक कुमार रथ
(editor@udayindia.in)

देश अभी तक खरगोन, करौली और जहांगीरपुरी में हुए दंगों से हुए जख्मों से उबरा नहीं है, देश को फिर से विभिन्न दंगों के रूप में जैसे की कानपुर, प्रयागराज, रांची, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आदि के रूप में और घाव दिए हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस बढ़ते तनाव का बीज तथाकथित शांतिप्रिय मुसलमानों के एक वर्ग द्वारा बोया गया है। क्या यह कहा जा सकता है कि ज्ञानवापी में शिवलिंग की खोज के बाद हमारे समाज को अस्थिर करने और लोगों के विभिन्न वर्गों के बीच अशांति पैदा करने में शामिल विभाजनकारी ताकतें अब निराश हैं और इस तरह की आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दे रही हैं? ये विभाजनकारी ताकतें देश को पथराव, लक्षित हमले, आगजनी और तोडफ़ोड़ की ओर ले जाती हैं। नूपुर शर्मा के बयान को हिंसक तरीके से निशाना बनाकर भारतीय मानस में चतुराई से आत्मसात की गई गंगा-यमुनी तहजीब का तमाशा धुंधला सा हो जाता है। यहां यह उल्लेख करना उचित है कि पथराव मस्जिदों और आस-पास के घरों की छतों से शुरू होता है। देखते ही देखते दुकानें और वाहन आग के हवाले कर दिए जाते है। दंगाइयों के हौसले का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे पुलिसकर्मियों पर भी हमला करने से नहीं हिचकिचाते। गृह मंत्री अमित शाह ने तथाकथित कट्टर अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की सही सलाह दी है ताकि वे इस तरह की गतिविधियों को दोहराने की हिम्मत न करें। इन दंगों में देश ने पुलिस प्रशासन पर उपद्रवियों की हमले की तस्वीरें भी देखी थीं। जब पुलिस अपराधी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करती है, तो राजनेता उनके बचाव के लिए आते हैं, जैसा कि प्रयागराज में हुआ था जब अपराधियों के घर गिरा दिए गए। पुलिस, जिसके सामने आम आदमी जमानत पाने में पसीना बहाता है, ऐसे अपराधियों की जमानत रोकने में पसीना बहाती है, सजा देने की बात तो दूर की है।

कैसी विडम्बना है कि इस तरह के सांप्रदायिक दंगे और हिंसात्मक घटनाक्रम का आरोप भाजपा पर लगाया जाता है, जबकि कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने अपने गिरते राजनीतिक वर्चस्व के कारण इन सब घटनाओं को अंजाम दिया हैं। भला कोई भी सत्ताधारी पार्टी ऐसे दंगों एवं साम्प्रदायिक हिंसा को अंजाम देकर अपनी शासन-व्यवस्था पर क्यों दाग लगायेगी? इस देश की बढ़ती साख एवं राष्टीयता को गिराने की मंशा रखने वाले राजनीतिक दलों एवं समुदायों का यह स्थायी चरित्र बन गया है कि वे अपने राष्ट्र से भी कहीं ज्यादा महत्व अपने स्वार्थ, अपनी जात और अपने मजहब को देते हैं। थोक वोट के लालच में सभी राजनीतिक दल जातिवाद और सांप्रदायिकता का सहारा लेने में जरा भी संकोच नहीं करते। जो कोई अपनी जात और मजहब को बनाए रखना चाहते हैं, उन्हें उसकी पूरी आजादी होनी चाहिए लेकिन उनके नाम पर घृणा फैलाना, ऊंच-नीच को बढ़ाना, दंगे और तोड़-फोड़ करना कहां तक उचित है? यही प्रवृत्ति देश में पनपती रही तो भौगोलिक दृष्टि से तो भारत एक ही रहेगा लेकिन मानसिक दृष्टि से उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। ऐसी अनिश्चय और भय की स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए संकट की परिचायक है और इन संकटों को समाप्त करने की दृष्टि से देश के कई राज्यों में घटी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ताजा फैसलों का महत्व समझा जा सकता है। योगी सख्त प्रशासक के रूप में जाने जाते हैं और उनके ताजा निर्देश इस बात इंगित करते हैं। मुख्यमंत्री योगी ने राज्य की कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठक में स्पष्ट निर्देश दिया कि कि कोई भी दोषी बचना नहीं चाहिए और जो दंगों में शामिल नहीं हैं उन्हें परेशान न किया जाए। इसमें कोई दो मत नहीं कि आस्था नितांत निजी विषय है और देश का कानून अपने सभी नागरिकों को उपासना की आजादी देता है। लेकिन आस्था जब प्रतिस्पर्धा में तब्दील होने लगे, तब वह कानून के दायरे में भी आ जाती है।

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