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भारतीय राष्ट्रवाद के अग्रदूत विनायक दामोदर सावरकर

भारतीय राष्ट्रवाद के अग्रदूत विनायक दामोदर सावरकर

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कई ऐसे महान व्यक्तित्व हुए जिन्होनें अपने विचारों और देशभक्ति से स्वतंत्रता की एक नई अलख जगाई, ऐसे ही एक महान विभूति थे:- विनायक दामोदर सावरकर, जिन्होनें अपने विचार, साहित्य और लेखनी से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति की बिगुल फूंक दी। सावरकर के क्रांतिकारी विचारों से डरकर अंग्रेजी हुकूमत ने उन पर न केवल बेइतंहा जुल्म ढाए बल्कि उन्हें काला पानी भेजते हुए, दो जन्मों के आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई, लेकिन इन सबसे बिना डरे सावरकर देश की आजादी के लिए भारतवासियों को एक करने में जुटे रहें। अपनी लेखनी और विचारो से उन्होंने देश को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। ‘विनायक दामोदर सावरकर एक क्रांतिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, चितंक, लेखक, कवि, वक्ता, राजनेता और दार्शनिक ऐसे ही विनायक दामोदर सावरकर के कई रूप है।’    आधुनिक भारत के राजनीतिक विमर्श में जो नाम लगातार चर्चा में रहते है विनायक दामोदर सावरकर उनमें से एक है। सावरकर के अस्तित्व को आधुनिक विमर्श में नकारा नही जा सकता। स्वतंत्रता आंदोलन, धर्म सुधार, सामाजिक विषमताओं और दर्शन के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया। उस पर आज के राजनीतिक हालत में चर्चा जरूरी है। उनके दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद, सकारात्मकतावाद के अलावा मानवतावाद और सार्वभौतिकता जैसे बिन्दु भी है। जिन पर चर्चा होती ही नहीं।

जीवन परिचय

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक में हुआ। सावरकर महज नौ वर्ष के थे जब महामारी में उनकी माता राधाबाई का निधन हो गया। इसके बाद बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन -पोषण का जिम्मा सभाला। 1901 में उन्होनें नासिक के शिवाजी हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की, 1901 में ही उनकी शादी यमुनाबाई के साथ हो गई। इस दौरान तमाम परेशानियों के बावजूद उन्होने आगे की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया, पुणे के मशहूर फर्ग्युसन कॉलेज से स्नातक करने के बाद वकालत की पढ़ाई करने लदंन चले गए। पढाई के दौरान ही उनका झुकाव राजनीतिक गातिविधियों की तरफ हुआ। 1904 में सावरकर ने अभिनव भारत नामक का एक सगंठन बनाया। 1905 में बगांल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलन में वो सक्रिय रहे। इस दौरान कई पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख भी छपे। रूसी क्रांति का उनके जीवन पर गहरा असर हुआ।

लदंन में उनकी मुलाकाल लाला हरदयाल से हुई जो उन दिनों इंडिया हाउस की देख-रेख करते थे, 1907 में इंडिया हाउस में आयोजित 1857 के पहले स्वतंत्रता सग्रांम की स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में उन्होनें संक्रिय भूमिका निभाई। जुलाई 1909 को मदन लाल ढीगरा ने विलियम लार्ड कर्जन वाइली को गोली मार दी इसके बाद सावरकर ने लंदन टाइम्स में एक लेख लिखा था। 13 मई 1910 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। 24 दिंसम्बर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। 31 जनवरी 1911 को उन्हें दुबारा आजीवन कारावास दिया गया। 7 अप्रेल 1911 को इन्हें कालापानी की सजा पर पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल भेज दिया गया। सावरकर 4 जुलाई 1911-21 मई, 1921 तक पोर्ट ब्लेयर जेल में रहे। इसके बाद अग्रेज शासकों ने उनकी याचिका पर विचार करते हुए उन्हें रिहा कर दिया। आजादी तक वो विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मंचो पर सक्रिय रहे।

1959 में पुणे विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की मानद उपाधि से उन्हें सम्मानित किया। नवंबर 1963 में उनकी धर्म पत्नी का देहांत हो गया इसके कारण सावरकर भी बिमार रहने लगें। इसके बाद उन्होनें उपवास करने का फैसला लिया, इस तरह विनायक दामोदर सावरकर ने 26 फरवरी 1966 को अपना शरीर त्याग दिया।

भारतीय राष्ट्रवाद और सावरकर

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले विनायक दामोदर सावरकर न केवल क्रांतिकारी थे बल्कि प्रखर राष्ट्रवाद के समर्थक भी थे। भारतीय राष्ट्रवाद को देखने का सावरकर का अपना नजरिया था। विनायक दामोदर सावरकर के मुताबिक सिर्फ जाति संबंध या पहचान ही राष्ट्रवाद को परिभाषित करने के लिए काफी नही है। सावरकर का मानना था कि किसी भी राष्ट्रवाद की पहचान के मुख्य रूप से तीन आधार होते है।

1) भौगोलिक एकता

2) जातीय गुण

3) साझी संस्कृति

सावरकर के अनुसार सांझी संस्कृति ऐसी हो जो एक भाषा के जरिए सबको जोड़कर रख सके। इसके लिए सावरकर ने संस्कृत या हिन्दी को अपनाने की बात कही। बचपन से ही राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक सावरकर ने 1904 में अभिनव भारत नाम से एक क्रांतिकारी सगंठन की स्थापना की, जिसका मकसद अंग्रेजो से भारत को आजाद कराना था और जब देश आजाद हो गया तो इसे भंग कर दिया गया। राष्ट्रवाद से प्रेरित सावरकर ने 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी का नारा दिया और पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा के चलते सावरकर जहां द्वि-राष्ट्र सिद्वांत के समर्थक थे वही देश के विभाजन के विरोधी भी थे। सावरकर मानते थें कि हिन्दू-मुसलमान दो अलग-अलग सांस्कृतिक कौम है जिनकी अपनी अलग-अलग जरूरते है। लेकिन बतौर देश दोनो भारत के अभिन्न अंग है, इसलिए देश का विभाजन नही होना चाहिए। सावरकर ने राष्ट्रवाद को अधिक मजबूत बनाने के लिए वेदो को पढ़ाने और उनका अनुसरण करने पर जोर दिया। उनका मानना था कि राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय पुर्नउत्थान की जरूरत है, अपनी राष्ट्रवाद की अवधारणा में सावरकर मानते थे कि हिदुत्व कोई शब्द नही है बल्कि एक इतिहास है और राष्ट्रवाद को किसी एक धर्म से जोडऩा गलत है। उनका मानना था कि केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से ही हिदुत्व को देखना केवल हिदुत्व के साथ गलत होगा बल्कि राष्ट्रवाद के साथ भी धोखा है। सावरकर मानते थे कि राष्ट्रवाद के विकास और खुद को जागरूक करने के लिए सधंर्ष करना जरूरी है। और ये संघर्ष किसी राष्ट्र या आक्रामणकारी से नही बल्कि खुद से ही करना होता है।

राष्ट्रवाद की अपनी विचारधारा को ज्यादा व्यापक बनाने के लिए सावरकर ने हिन्दुओं में शुद्धि आंदोलन चलाया जिसका मकसद हिन्दुत्व का प्रचार-प्रसार और राष्ट्रवाद की विचारधारा को बढ़ाना था। सावरकर नें अपनी राष्ट्रवाद की विचारधारा को बढ़ाने के लिए अनेक सामाजिक सुधार कार्यक्रम भी चलाए। उनके सामाजिक उत्थान कार्यक्रम ने हिन्दुओ को सशक्त ही नहीं किया बल्कि राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ाने और उसका प्रसार करने पर भी बल दिया।

 

 

डॉ. प्रीती

(लेखिका असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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