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ज्ञानवापी-मजहबी कट्टरता के इतिहास से स्वर्णिम भविष्य की उम्मीद

ज्ञानवापी-मजहबी कट्टरता के इतिहास से स्वर्णिम भविष्य की उम्मीद

जब हम ज्ञानवापी का इतिहास खंगालते हैं तो हम देखते हैं कि ज्ञानवापी वस्तुत: किसी एक मंदिर के ध्वंस या किसी एक घटना का इतिहास नहीं है बल्कि यह उस भयावह दौर की सिलसिलेवार सच्चाई है जब हमारा देश मजहबी कट्टरता से पराजित हुआ और हमने लगभग पूरे देश में अपने आस्था केंद्रों की वीभत्स तबाही को सहा। भारत पर जितने भी इस्लामी आक्रमण हुए हैं, उनमें धन-संपदा की लूटपाट के साथ मंदिरों-मठों में तोडफ़ोड़ करना शामिल रहा है। भारत के असंख्य मंदिर इस मजहबी कट्टरता के शिकार हुए हैं। ऐसे ही आस्था स्थलों में शामिल काशी के बारे में राणापीबी सिंह बताते हैं कि काशी के विश्वेश्वर मंदिर का पहला विध्वंस कुतुबुद्दीनऐबक के आदेश से 1194 में हुआ। यह मंदिर उस जगह स्थित था जहां आज बेगम रजिया मस्जिद खड़ी है। हिंदुओं के लिए बेहद पवित्र स्थान पर प्राचीन और प्रमुख मंदिर के ध्वंस स्थल पर मस्जिद खड़ी करना वस्तुत: इस देश की सर्वधर्म समभाव की आत्मा से क्रूर उपहास था। इसके बाद 13वीं शताब्दी में एक गुजराती व्यापारी द्वारा विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया, हालांकि मजहबी जुनून के आगे यह मंदिर भी टिक नहीं पाया। इस मंदिर को पहले जौनपुर के शर्की राजाओं द्वारा आंशिक रूप से तोड़ा गया, फिर 1490 में सिकंदर लोदी ने इसे पूर्णतया तुड़वा दिया।

1585 में टोडरमल, जयपुर के राजा मान सिंह और महान विद्वान नारायण भट्ट के प्रयासों से काशी में फिर से मंदिर खड़ा किया गया। यह मंदिर संभवत: 13वीं शताब्दी के प्राचीन मंदिर के संरचनात्मक ढांचे पर ही खड़ा किया गया था। हालांकि इस मंदिर को फिर से मजहबी जुनून के मुगलिया दौर का सामना करना पड़ा। बादशाह बनने के मात्र एक वर्ष के बाद ही औरंगजेब ने 09 अप्रैल 1669 को शाही फरमान निकालकर खुद को इस्लाम का सच्चा खिदमतगार घोषित किया। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, उस दिन ‘बादशाह ने अपने सभी प्रांतों के सुबेदारों को आदेश दिया कि काफिरों के विद्या केंद्र और मंदिर तोड़े जाएं और उनकी शिक्षाओं और धार्मिक व्यवहारों को कड़ाई से नीचा दिखाया जाए।’ औरंगजेब की फतवा-ए-आलमगिरी के अनुसार मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र काम यह है कि वे गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध जिहाद करें। औरंगजेब के दौर का ही लेखक साकी मुस्ताक लिखता है ‘यह जानकारी मिली कि बादशाह के फरमान का पालन करते हुए बादशाह के अधिकारियों ने काशी (बनारस) में विश्वनाथ मंदिर तोड़ दिया।’ इस विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ही उस पर मस्जिद खड़ी की गई जिसे आज ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। इस विध्वंस की एक बात बेहद निश्चित है कि प्राचीन मंदिर का पूरा ढांचा तोडऩा औरंगजेब और उसके कारिंदों के लिए कोई मुश्किल बात नहीं थी, लेकिन मंदिर का पिछला हिस्सा जानबूझकर इसलिए बरकरार रखा गया ताकि हिंदुओं को हमेशा के लिए नीचा दिखाया जा सके।

इसके बाद इस मंदिर को फिर से इसके प्राचीन स्वरूप में लाने के लिए प्रयास शुरू हुए। 18वीं शताब्दी के मध्य में मराठों और कचावाह मुखियाओं द्वारा औरंगजेब की बनाई मस्जिद हटाने और मंदिर फिर से खड़ा करने के विभिन्न प्रयास किए गए हालांकि ये प्रयास सफल नहीं हो पाए। अंतत: मराठा रानी अहल्या बाई होल्कर के प्रयासों से 1776 में काशी में नया मंदिर बनाया गया। यह मंदिर ज्ञानवापी स्थित इसके मूलस्थान पर नहीं, बल्कि इसके समीप बनाया गया। 1835 में इसी मंदिर में महाराज रणजीत सिंह ने इसके गुबंद को सोने से मढऩे के लिए 10 क्ंवटल सोना चढ़ाया। हाल ही में 13 दिसंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काशी में स्थित विभिन्न मंदिरों की प्राचीन प्रतिष्ठा फिर से बहाल करते हुए काशी विश्वनाथ मंदिर कोरिडोर का उद्घाटन किया गया। 18वीं शताब्दी के बाद काशी के गौरवशाली इतिहास को फिर से स्थापित करने के प्रयासों के बावजूद यह सच है कि ज्ञानवापी में गैर-मुस्लिमों के लिए अपमानित करने के लिए तैयार की गई संरचना आज भी बरकरार है। मजहबी जुनून की प्रतीक यह इमारत आज भी सर्वधर्म समभाव की इस देश की मूल आत्मा पर नश्तर चुभो रही है।

 

प्रेरणा कुमारी

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