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अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का खतरनाक खेल

अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का खतरनाक खेल

धार्मिक तुष्टीकरण की राजनीति का जन्म देश की आजादी से पहले ही शुरू हो गया था। यदि एैसा न होता तो शायद भारत का विभाजन नहीं होता। हिन्दु मुस्लिम दोनों अंग्रेजी राज के खिलाफ मिल कर लड़ाई लड़ी थी और आजादी के बाद भी वे मिल कर रह सकते थे। एक अकेले जिन्ना की जिद ने हमारे प्यार भरे माहौल को पलीता लगा दिया। गांधी ने भरसक प्रयास किया कि देश का विभाजन न हो। यहां तक कि उन्होंने तत्कालीन वायसराय लार्ड माउन्टइबेटन से जिन्ना का प्रधानमंत्री बना देने की अपनी राय प्रकट की थी पर जिन्ना अड़े रहे और धार्मिक आधार पर या कहिये हिन्दू मुसलमान आधार पर देश दो हिस्सों में बंट गया। दोनों देशों ने कुछ बातों पर सहमति हुयी जिसमें अल्पसंख्यकों के हितों का पूरा ध्यान रखे जानें की बात थी।

दु:खद ये रहा कि पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यक हिन्दुओं आदि को प्रताडि़त किया जबकि भारत ने प्रत्येक धर्म के अल्पसंख्यकों के हितों की न केवल रक्षा की, उन्हें विशेष सुविधायें भी दी गयी। जिनमें उन्हें बस परमिट लाइसेंस, आदि दिये गये। धीरे-धीरे पाकिस्तान से हिन्दुओं को या तो जबरन मुसलमान बनाया गया या उन्हें पाकिस्तान छोडऩे पर मजबूर किया गया। ठीक इसके उलट हिन्दुस्तान में किसी भी अल्पसंख्यक को धर्म परिवर्तन के लिये मजबूर नहीं किया और न ही देश छोडऩे के लिये पाकिस्तान में हिन्दु धर्म, बौद्ध धर्म, सिक्ख, ईसाई आदि धर्मो का सफाया करने मिटानें का काम किया। तो भारत में सभी धर्म फलते-फूलते रहे।

जब कांग्रेस की सत्ता में हिस्सेदारी कम होने लगी तो उसमें वोट बैंक की राजनीति शुरू की। चूंकि मुसलिम समुदाय की जनसंख्या अनुपातिक रूप से बढ़ती जा रही है तो मुसलमानों में कांग्रेस को एक सुरक्षित वोट बैंक दिखाई दिया। यहीं से तुष्टीकरण की राजनीति शुरू हुयी। बाद में इसे क्षेत्रीय पार्टियों ने अपनाया और वोट बैंक की होड़ में इतने आगे निकल गये कि मुस्लिम समुदाय की सुविधायें अधिकार बढ़ते चलेगा ये और मायूस हिन्दू इसे देखता रहा, फिर वो दिन भी आया जब हिन्दू अपने आपको दोयम ना-रिक यानि दो दर्जे का नागरिक समझनें लगा। इसके अनेको अनेक उदाहरण हैं जब बहुत सी बातों में कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टियों ने हिन्दुओं की अवहेलना करके मुसलमानों को प्राथमिकता दी। हिन्दुओं में आक्रोश पलनें लगा। वे अपने को ठगा महसूस करने लगे, कि आजादी मिलने के बाद भारत हिन्दुओं को मिला और यहां भी उनको धार्मिक आजादी मुसलमानों से कम क्यों मिल रही। मुसलमानों का तरह तरह की सुविधायें मिली जो हिन्दुओं को नहीं दी गयी। सरकारी खजानें से धार्मिक आयोजन में सम्मिलित होने के लिये उन्हें मदद दी जानें लगी पर हिन्दुओं को नहीं।

ऐसी बहुत सी बातें जिनमें मुसलमानों को हिन्दुओं से अधिक अधिकार मिलते गये और प्रदेश में, क्षेत्रीय पार्टियों की सरकारों ने तो हद ही कर दी जिसमें बंगाल में तृणमूल और उत्तर प्रदेश में सपा इस हद तक निकल गयी कि उन पर हिन्दुओं के ऊपर मुसलमानों को खुश रखनें के लिये जुल्म हिंसा और अत्याचार के आरोप बराबर लगते रहे।

कैराना, मुजफ्फरनगर की शर्मनाक घटना जिसमें समाजवादी पार्टी पर न मिटने वाला कलंक लगा, जहां सपा के परोक्ष मुख्यमंत्री की हैसियत रखने वाले मुसलिम नेता आजम खां के दबाब में रातोंरात कलेक्टर और पुलिस कप्तान को ट्रांसफर किया गया। जुल्म की इतिंहा तब हो गयी जब हिन्दुओं को पलायन करना पड़ा। उनके घरों पर मकान बिकाऊ के नोटिस लग गये। इसी तरह कश्मीर से भी लाखों हिन्दुओं को घर छोड़ कर भागना पड़ा था। जो दे्या हिन्दुओं को बंटवारे में मिला था उसी दे्या से हिन्दुओं को अपने घरों से बेघर कर दिया गया। सनातन धर्म का आधार ही सभी जीवों पर दयाभाव और बसुधा को कुटुम्ब माननें वाला है। कश्मीरी हिन्दुओं बजाय हिंसा का मार्ग अपनाने के घर छोड़ कर चल दिये। पूरे देश का हिन्दू चुप रहा न कोई हिंसा की न कोई धरना प्रदर्शन।

इतना सब हुआ पर कभी कश्मीरी हिन्दुओं ने हिंसक प्रदर्शन कर पत्थर बाजी नहीं की पुलिस वालों को घेर कर उन पर पत्थर नहीं बरसाये। कभी किसी मुसलमान को घर छोड़ कर नहीं भगाया चाहे हिन्दुओं के मुहल्लों में एक ही घर क्यों न हो।

सरिया के नाम पर विशेष अधिकार मांगना कहां तक जायज है जब कई मुसलिम देश ही सरिया को नहीं मानते। माना कि भारत एक सेक्यूलर धर्म निरपेक्ष देश है पर अधिकार सबके समान होना चाहिये। कोमन सिविल कोड का विरोध गैर जरूरी हैं। अल्पसंख्यक धार्मिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र है और ये उनका संविधानिक अधिकार भी है। पर धर्म के नाम पर उन्हें समान नियम कानून से छूट देना कहां तक उचित है।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ये कहना कि देश के स्त्रोतों पर अल्पसंख्यकों का अधिकार पहले है जैसे ब्यानों से ही समाज मे वैमनस्ता फैलती है। पर कांग्रेस और क्षेत्रीय दल सत्ता की भूख में तुष्टीकरण के लिये कुछ भी कर सकते हैं जो देश के लिये घातक है। यही हालात रहे और वोट बैंक बनाने के लिये राजनैतिक पार्टियां इसी तरह धर्म विषे्या के लोगों को अतिरिक्त सुविधायें और अधिकार देती रही तो एक न एक दिन ये बात उठेगी कि भारत बंटवारे में हिन्दुओं को मिला था। आजादी के बाद उसे विशुद्ध हिन्दु रा्यट्र होना चाहिये था जो नहीं हुआ। सेक्यूलर होना अच्छा था अच्छा लगता भी है पर सेक्यूलर के नाम पर अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण न रूका तो हिन्दु राष्ट्र की मांग जोर पकड़ेगी और विभाजन की शर्तों के आधार पर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना पड़ेगा। हालांकि इससे केवल नाम ही बदलेगा-देश तो तब भी संविधान से ही चलेगा और सेक्यूलर के मार्ग पर ही चलेगा।

 

 

 

डॉ. विजय खैरा

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