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भारत को महाशक्ति बनाने की नई पहल

भारत को महाशक्ति बनाने की नई पहल

By आर. बालशंकर

यह बजट आर्थिक उदारीकरण के पिछले 23 साल के अनुभवों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें नव-उदारवाद के तमाम पैरोकारों की बातों से किनारा कर लिया गया। बजट में निवेश और बचत को प्रोत्साहन दिया गया, जबकि खपत बढ़ाने के लिए भी प्रेरित किया गया और साथ में आम आदमी की जेब में अधिक नकदी का आश्वासन दिया गया।

शेयर बाजार का सूचकांक उछल रहा है। निराशाजनक बेरुखी दिखा रहे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर बैंक दरों में कटौती को तैयार हुए और अमूमन ठंडी प्रतिक्रिया देने वाली रेटिंग एजेंसियां भी 28 फरवरी को मोदी सरकार के पहले वास्तविक बजट के बाद उत्साहजनक संकेत देने लगीं। वामपंथी दलों और कांग्रेस को अपनी दलील तैयार करने में कुछ समय लगा और आखिर में वे यही कह पाईं कि मोदी का बजट ‘कॉरपोरेट समर्थक’ है। आम धारणा यही है कि यह बजट भारत के पंखों में हवा भरने का मौका मुहैया कराएगा। दुनिया भर के कॉरपोरेट प्रमुख भी इस पर एकमत हैं कि भारत दुनिया में उभर रही नई अर्थव्यवस्था में शिखर पर जाने को तैयार है। यानी भारत ही उम्मीदों का क्षेत्र है।

यह देखिए कि महज नौ महीने में भारत निराशा, मोहभंग, नकारात्मक वृद्धि दर और पूंजी पलायन से पस्त देश से निवेश का बेहतरीन ठिकाना, कारोबार के लिए अनुकूल देश बन गया है। जाहिर है, मोदी ने देश का मिजाज बदल दिया है। 2014 और 2015 के आर्थिक सर्वेक्षणों की तुलना से यह पता लगता है कि भारत में माहौल किस कदर बदल गया है। नए आर्थिक सर्वेक्षण में देश के इतिहास में पहली दफा अगले साल दहाई अंकों की वृद्धि और इस साल 8 फीसदी वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। साल भर पहले भारत की वृद्धि दर 4 फीसदी तक गिर गया था।

पिछले साल मई में केंद्र की सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार के पहले संपूर्ण बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली व्यावहारिक और राजनैतिक जरूरतों में मोदी की खास छाप के साथ संतुलन कायम करने में कामयाब हुए हैं। नए बजट का असली संदेश नई कल्पनाशीलता और व्यावहारिकता में संतुलन है। बजट पेश होने के पहले बड़े सुधारों, चौंकाने वाले और स्पष्ट पूंजीवादी रुझान की चर्चाएं थीं। कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों ने बजट में गरीबों को बड़ा झटका लगने, सब्सिडियों के खत्म किए जाने की भविष्यवाणी ही कर दी थी। उन लोगों ने खाद्य सुरक्षा, मनरेगा और दूसरे लोकप्रिय योजनाओं के बंद किए जाने की भविष्यवाणी कर डाली थी। इन योजनाओं को वे अपनी पहल मानते हैं, लेकिन जेटली के बजट ने उनकी जबान बंद कर दी। नए बजट में न सिर्फ सभी योजनाओं को बरकरार रखा गया, बल्कि और आगे बढ़कर सभी 1.30 अरब देशवासियों के लिए कल्याण योजनाओं पर विचार किया गया, न कि खास वोटबैंक पर लक्षित किया गया। नए बजट में पहली दफा बुजुर्गों के लिए पेंशन और स्वास्थ्य बीमा योजनाएं शुरू की गईं। बजट में कमजोर वर्गों के हितों का ख्याल रखा गया है। कुल मिलाकर इसमें हर किसी के लिए कुछ न कुछ है।

यह बजट आर्थिक उदारीकरण के पिछले 23 साल के अनुभवों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें नव-उदारवाद के तमाम पैरोकारों की बातों से किनारा कर लिया गया। बजट में निवेश और बचत को प्रोत्साहन दिया गया, जबकि खपत बढ़ाने के लिए भी प्रेरित किया गया और साथ में आम आदमी की जेब में अधिक नकदी का आश्वासन दिया गया। यह बजट चतुराई से बारीकियों का ख्याल रखता है और स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करता है। यूपीए सरकार के बजटों के विपरीत इसमें आंकड़ों की बाजीगरी नहीं की गई है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि अर्थव्यवस्था के हालात का ईमानदारी से बयान करना है,

जिस पर आगे बढऩे की तमाम संभावनाएं टिकी हुई हैं। अरुण जेटली ने जोर देकर कहा कि बौद्धिक ईमानदारी ही बजट निर्माण की असली कसौटी है।

वित्त मंत्री ने कहा, ”मेरे प्रस्ताव वृद्धि दर तेज करने, निवेश बढ़ाने और प्रगति के लाभ आम आदमी, औरत, युवा और बच्चे को देने के ख्याल से तैयार किए गए हैं।’’

बजट में 8.5 प्रतिशत वृद्धि दर, 3.9 प्रतिशत राजकोषीय घाटा, 14 प्रतिशत सेवा कर, पूरे देश को एक आर्थिक ईकाई मानकर वस्तु व सेवा कर व्यवस्था लागू करने, अगले चार साल में 25 प्रतिशत कॉरपोरेट टैक्स, संपत्ति कर के बदले सालाना एक करोड़ से अधिक कर योग्य आमदनी वाले अमीरों पर 2 प्रतिशत अधिभार लगाने का प्रस्ताव है। एक अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा कि जेटली वह करने में कामयाब हुए, जिसमें उनके पूर्ववर्ती कोशिश करके नाकाम हो गए। दूसरे ने लिखा कि यह बड़े सुधारों का बजट भले न हो पर उस दिशा में धीरे ही सही यकीन के साथ उठा कदम है। जाहिर है, भारत वैश्विक वृद्धि में ऊंचा मुकाम हासिल की दिशा में अग्रसर है। अगर बजट के अनुमान सही निकले तो भारत दुनिया में सबसे तेज रफ्तार से बढऩे वाला अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसमें हर साल एक करोड़ रोजगार सृजन होगा। सबको आवास मुहैया कराने के लिए इसमें आने वाले वर्षों में 5 करोड़ घर बनाने का वादा है। इसमें काले धन पर कड़ा प्रहार का वादा है और ऐसा कानून बनाने की बात है जिससे विदेशों में अपनी जमा रकम और संपत्ति का ऐलान किया जाए या फिर दंड भुगतने को तैयार हो जाएं।

बजट में प्रतिस्पर्धा के लिए प्रेरित करने वाले भी कई कदम हैं। यह साहसिक, समावेशी बजट है और इसमें कारोबार, शिक्षा, स्वास्थ्य, वरिष्ठ नागरिकों और नौजवानों सभी का ध्यान रखा गया है।

बजट को लेकर गैर-जरूरी हौवा खड़ा कर दिया गया था, जो ज्यादातर कॉरपोरेट लॉबी की कारस्तानी थी। यह लॉबी चीख-चिल्ला कर कह रही थी कि मोदी के लिए यह आखिरी और एकमात्र मौका है, जबकि मोदी सरकार का यह पहला ही पूर्ण बजट था। उनकी राय शायद यह थी कि सरकार पर निर्मम सुधारों का दबाव बनाया जाए, जैसा कि मुक्त बाजार व्यवस्था के हिमायती कुछ अर्थशास्त्री चाहते हैं, लेकिन इससे मोदी को 2014 में मिले जनादेश की अवहेलना होती। मोदी भला वह कड़वी गोली क्यों निगलते। इसके बदले उन्होंने गुगली फेंकना ही मुनासिब समझा।

मोदी मैजिक का यही करिश्मा है। अर्थशास्त्र में कहा जाता है कि ‘दूसरी बातें एक समान रहती हैं।’ मोदी को विरासत में खस्ताहाल अर्थव्यवस्था मिली थी। उन्होंने आरबीआई के गवर्नर को भी नहीं बदला, लेकिन मोदी के राज में मुद्रास्फीति की दर दस साल में सबसे निचले स्तर पर आ गई। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरने से देश के आयात बिल में 50 अरब डॉलर की बचत हो गई। यूपीए के आखिरी दो वर्षों में भारतीय कंपनियों ने ‘पॉलिसी पैरालाइसिस’ और बेलगाम भ्रष्टाचार के कारण अनुमानित 30 अरब डॉलर का निवेश विदेशों में किया। मोदी ने उस मकडज़ाले को साफ किया और निवेश का माहौल बनाया। इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में तेजी लाई गई, कोयला उत्पादन में 8 प्रतिशत बढ़ोत्तरी की गई, बिजली उत्पादन में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई और भारत की छवि विश्व मंच पर बेहतर बनी। उम्मीद और आकांक्षाओं का यह माहौल ही बदलाव का वाहक बना। सरकार की छवि यह बनी कि वह कारोबार का माहौल बेहतर करना चाहती है।

इसी बड़े बदलाव की ओर बजट इशारा करता है। इसमें मेगा पॉवर प्लांट, एम्स, आइआइटी और आइआइएम बनाने जैसी बड़ी घोषणाएं हैं, लेकिन फोकस वादों पर नहीं डिलीवरी पर है। इसी वजह से भारत के महाशक्ति बनने का एजेंडा विश्वसनीय लगता है। आयकर में छूट की सीमा भी बढ़ाई जा सकती थी। इसकी संभावना थी और वेतनभोगी ईमानदार कर दाताओं को रियायत दी जा सकती थी। 14 प्रतिशत का सेवाकर भी उनको मायूस करता है। कर दायरे को चौड़ा करने की जरूरत थी। इसके बावजूद जेटली के बजट ने सबको संतुष्ट किया।

बजट का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू घरेलू उद्योग के प्रति उसमें जाहिर की गई आस्था है। बजट में कारोबार अनुकूल माहौल बनाने और एफडीआई आकर्षित करने पर जोर है, लेकिन यह भी कहा गया है कि अपने घरेलू उद्योग का इजाफा ही असली मूलमंत्र है। इसलिए भारतीय पूंजी को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। सरकार ने सार्वजनिक खर्च में इजाफा करके संदेश दिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र ही निवेश और रोजगार सृजन का मूल स्रोत है। पूर्व सरकार ने क्रोनी कैपिटलिज्म के चक्कर में जिन कोयला ब्लॉकों के आवंटन में घोटालों का सिलसिला शुरू कर दिया था, मोदी के अधीन उससे भारी रकम मिल रही है। इससे गरीब राज्यों के खजाने में भारी वृद्धि होगी। राज्यों को वृद्धि की प्राथमिक ईकाई बनाकर उन्हें निवेश आकर्षित करने को प्रेरित करना बजट का एक और अहम पहलू है। इससे यह अवधारणा भी निकली कि बजट निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। जाहिर है, काम अच्छा है और असहमति की कोई खास वजह नहीं बनती है।

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