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ज्ञानवापी विवाद के मायने

ज्ञानवापी विवाद के मायने

नब्बे के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन उफान पर था, तो अमूमन गलियों में एक नारा जोरो से लगाया जाता, ‘अयोध्या तो झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है’। वजह थी कि अयोध्या में जिस तरह की स्थितियां मौजूद थीं, वैसी ही स्थितियां काशी और मथुरा में भी थी। वर्तमान में एक बार फिर हिन्दू धर्म की ओर से हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों की मांग का मुद्दा उठाया गया, और एक बार फिर ज्ञानवापी मंदिर हेतु भारतीय अदालत में याचिका दायर की गयी। मामले की जांच हेतु अदालत के द्वारा एक आर्कलॉजिकल सर्वे टीम का गठन किया गया ताकि यह पता लगाया जा सके कि ज्ञानवापी वास्तव में हिंदुओं का धर्म स्थल है या सिर्फ मुस्लिमों का। वाराणसी में काशी विश्वनाथ से सटा एक हिस्सा है, जिसे ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। इस मस्जिद को लेकर विवाद हिंदू और मुस्लिम समुदायों के मध्य काफी लंबा विवाद रहा है। हिन्दू पक्ष का दावा है कि इस मस्जिद को मंदिर तोड़कर बनाया गया, जबकि मुस्लिम पाक हिंदुओं के इस दावे को जड़ से खारिज करता आया है। बहरहाल ज्ञानवापी से संबंधित मुकदमा लगभग तीन दशकों से अदालत में लंबित चल रहा है।  ज्ञानवापी मस्जिद की जांच हेतु पिछले साल अगस्त में पांच महिलाओं की तरफ से विजला अदालत में एक और याचिका दाखिल कराई गई। जो पुराना मुकदमा है, वह वर्ष 1991 में जिला अदालत में ही दायर किया गया था। याचिका में ज्ञानवापी परिसर में पूजा की अनुमति मांग की गई थी। जिसके पीछे यह तर्क दिया गया कि जिस स्थल को एक पक्ष मस्जिद बता रहा है, दरअसल वह मस्जिद है ही नहीं। इसका मुख्य कारण वाराणसी स्थित वो ज्ञानवापी परिसर है, जहां काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ ही साथ मस्जिद भी है।

ज्ञानवापी शब्द ज्ञान+वापी से बना है, जिसका मतलब है ज्ञान का तालाब। कहते हैं कि इसका ये नाम उस तालाब की वजह से पड़ा, जो अब मस्जिद के अंदर है। वहीं भगवान शिव के गण नंदी मस्जिद की ओर आज भी मुंह किए बैठे हैं।

ज्ञानवापी का इतिहास

माना जाता है कि विश्वनाथ मंदिर को सबसे पहले 1194 में मोहम्मद गौरी ने लूटा और तोडफ़ोड़ की। इसके बाद 15वीं सदी में राजा टोडरमल ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इसके बाद 1669 में औरंगजेब ने एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करवाया। कहा जाता है कि औरंगजेब ने जब काशी का मंदिर तुड़वाया तो उसी के ढांचे पर मस्जिद बनवा दी, जिसे आज ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। यही वजह है कि इस मस्जिद का पिछला हिस्सा बिल्कुल मंदिर की तरह लगता है। दूसरी ओर सन 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने काशी के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इस दौरान पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने करीब एक टन सोना मंदिर के लिए दान किया था।

क्या है विवाद

ज्ञानवापी परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर शुरू से ही विवाद रहा है। हिंदू पक्ष का कहना है कि 400 साल पहले मंदिर तोड़कर वहां मस्जिद बना दी गई, जहां मुस्लिम समुदाय नमाज पढ़ता है। इस ज्ञानवापी मस्जिद का संचालन अंजुमन-ए-इंतजामिया कमेटी करती है। 1991 में विश्वेश्वर भगवान की ओर से वाराणसी के सिविल जज की अदालत में एक याचिका लगाई गई, जिसमें कहा गया कि जिस जगह ज्ञानवापी मस्जिद है, वहां पहले भगवान विश्वनाथ का मंदिर था और श्रृंगार गौरी की पूजा होती थी। याचिका में मांग की गई कि ज्ञानवापी परिसर को मुस्लिम पक्ष से खाली कराकर इसे हिंदुओं को सौंप देना चाहिए। वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में स्थित बाबा विश्वनाथ के मंदिर और मस्जिद को लेकर यही विवाद है।

आखिर क्यों हुआ विवाद

बता दें कि 5 अगस्त, 2021 को कुछ महिलाओं ने वाराणसी की लोकल कोर्ट में एक याचिका लगाई थी, जिसमें उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर समेत कई विग्रहों में पूजा करने की अनुमति देने और सर्वे कराने की मांग की थी। इसी याचिका पर कोर्ट ने यहां सर्वे करने की अनुमति दी थी। हालांकि, जब टीम सर्वे करने पहुंची तो वहां मुस्लिम पक्ष के लोगों ने उन्हें मस्जिद की वीडियोग्राफी करने से रोक दिया। परंतु फिर भी सर्वे टीम के द्वारा 6 मई को ज्ञानवापी मस्जिद की जांच की गई और 10 मई को जो रिपोर्ट दायर हुई उसमें आर्कलॉजिकल सर्वे टीम के माध्यम से यह दावा किया गया कि ज्ञानवापी मस्जिद मंदिर को तोड़कर बनवाई गई थी ऐसा वहां प्राप्त हुए साक्ष्य से साबित होता है। परंतु यहां विचार करने का विषय यह है कि जब कभी भारत में हिंदू धर्म और आस्था पर आचरण करने का विषय आता है तो समाज इतना विद्रोही क्यों हो जाता है? क्यों तमाम बुद्धिजीवी और राजनीतिक दल हिंदुओं को असहिशुन होने का दावा करने लगते हैं? भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों से संबंधित भाग 3 में निहित अनुच्छेद 25 के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को उसके धार्मिक आचरण और धर्म के पालन करने का पूर्ण अधिकार दिया गया है जो भारत की धर्मनिरपेक्ष चरित्र का परिचायक है। लेकिन जब कभी हिंदू अपने धार्मिक आचरण की मांग करते हैं तो अचानक से सरकारें और कोर्ट कैसे मुस्लिम विरोधी हो जाते हैं? यह भी विचार करने का विषय है। वास्तव में यदि वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो विपक्षी दलों की वर्तमान सरकार की विकासवादी नीतियों के प्रति बौखलाहट को सहज ही समझा जा सकता है परिणाम स्वरूप आम आदमी के मस्तिष्क पर प्रत्येक मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से जोड़कर देखने को मजबूर किया जाता है।  इस सब के बीच यह गौर करने वाली बात यह है कि जब एम एफ हुसैन के द्वारा हिंदू देवी-देवताओं के नगमे तस्वीरें बनाकर उन्हें अपमानित किया जाता है तो हिंदू पक्ष की ओर से कोई पतरा या विरोध की कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती और ना ही किसी राजनीतिक दल या अंतरराष्ट्रीय संगठन के द्वारा इसका कोई संज्ञान हीं लिया जाता है। परंतु जब कभी तर्क पूर्ण तरीके से और संवैधानिक तरीके से हिंदू समुदायों के द्वारा उनके अधिकारों की मांग की बात की जाती है तो यह बुद्धिजीवी और राजनीतिक दल स्लीपर सेल्स की तरह भारतीय सौहार्द को बिगाडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ते जो भारतीय एकता के लिए एकमात्र खतरा है जिसका निवारण किया जाना अति आवश्यक है बहरहाल ज्ञानवापी से संबंधित मुकदमे पर निर्णय अभी अदालत में लंबित है जिस पर त्वरित निर्णय की मांग की जा रही है।

 

 

 

डॉ. प्रीती

(लेखिका असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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