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सुखद स्थिति का मुश्किल बजट

सुखद स्थिति का मुश्किल बजट

By अश्विनी महाजन

बजट में विदेशों में कालाधन रखने वालों पर कड़ाई से निपटने की प्रतिबद्धता दिखाई देती है। विदेशों में कालाधन रखने पर सजा का प्रावधान वास्तव में अच्छा कदम है, जो लोगों को देश का पैसा बाहर ले जाने के लिए हतोत्साहित करेगा। लेकिन, कंपनियों पर यह बजट मेहरबान दिखाई दिया और कारपोरेट कर की दर को अगले चार सालों में 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत करने की बात की गई है।

जीडीपी ग्रोथ दर इस साल 7.4 प्रतिशत और अगले साल 8 से 8.5 प्रतिशत अपेक्षित है। 5 फीसदी उपभोक्ता महंगाई और शून्य पर पहुंचती थोक महंगाई और विदेशी भुगतान घाटा जीडीपी का मात्र 1.3 फीसदी रह जाना वास्तव में अनुकूल स्थितियों की तरफ  इंगित करता है। आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि आज अर्थव्यवस्था एक ‘मधुर स्थिति’ में है, जो कभी-कभार ही होता है। आज भारत चीन को पछाड़ कर दुनिया की सबसे तेज गति से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। विदेशी निवेश का प्रवाह भी बढ़ रहा है और दुनिया का रूख भी भारत के बारे में बदला है। वित्तमंत्री ने यह भी कहा है कि अब भारत की उडऩे की बारी है, यह दुनिया मानती है।

लेकिन सरकार के पास पैसा है कम
तेल की घटती अंतर्राष्ट्रीय कीमतों और ग्रोथ में आ रही तेजी के चलते परिस्थितियां अनुकूल होने पर भी सरकार के खजाने में पैसा कम ही है। केन्द्र सरकार की आमदनी में थोड़ी वृद्धि होने के बावजूद 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के लागू होने से सरकार को ज्यादा पैसा राज्यों को देना होगा, जिसके चलते उसके पास स्वयं के बजट के लिए पैसा कम बचेगा। पिछले साल के 3.8 लाख करोड़ की तुलना में राज्यों को 2015-16 में 5.8 लाख करोड़ मिलने वाला है। गौरतलब है कि 2014-15 के बजट में 17.9 लाख करोड़ का खर्च तय किया गया था (हालांकि वास्तविक खर्चा 16.81 लाख करोड़ ही हुआ); लेकिन इस बार के बजट में पिछले बजट से भी कम राशि खर्च के लिए रखी गई है, यानि 17.77 लाख करोड़। जाहिर है कि राज्यों को ज्यादा राशि देने के बाद केन्द्र सरकार के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा बचा ही नहीं है।

स्थाई खर्चें हैं यथावत
सरकार को कई मदों पर खर्च करना निहायत जरूरी है, जैसे – ब्याज की अदायगी जरूरी है, जिस पर 4.56 लाख करोड़ रूपया जाना है। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, पुलिस, प्रतिरक्षा इत्यादि पर कुल खर्च हर बार की भांति बढ़ाया गया है। ऐसे में स्वभाविक ही है कि सरकार सामाजिक सेवाओं पर खर्च ज्यादा नहीं बढ़ा पाएगी। उच्च शिक्षा पर पिछले साल के बजट से मात्र 244 करोड़ रूपए ही ज्यादा खर्च का प्रावधान है, जबकि स्कूली शिक्षा पर पहले से 100 करोड़ रूपया कम खर्च किया जाएगा। स्वास्थ्य पर भी खर्च मामूली बढ़ा है। माना जा सकता है कि सरकार पर इन खर्चों को कम करने के लिए खासा दबाव रहा होगा।

काले धन पर कड़ा लेकिन कारपोरेट पर नरम
बजट में विदेशों में कालाधन रखने वालों पर कड़ाई से निपटने की प्रतिबद्धता दिखाई देती है। विदेशों में कालाधन रखने पर सजा का प्रावधान वास्तव में अच्छा कदम है, जो लोगों को देश का पैसा बाहर ले जाने के लिए हतोत्साहित करेगा, लेकिन कंपनियों पर यह बजट मेहरबान दिखाई दिया और कारपोरेट कर की दर को अगले चार सालों में 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत करने की बात की गई है। यह बात दूसरी है कि साथ ही साथ कारपोरेट को मिलने वाले छूटों को कम करने की बात भी बजट में की गई है। यानि कहा जा सकता है कि कारपोरेट पर यह बजट खासा नरम रूख अपना रहा है।

गौरतलब है कि यदि वैयक्तिक आयकर में छूट, जो 2014-15 में 40,435 करोड़ रूपए थी और लघु उद्योगों को मिलने वाली उत्पाद शुल्क में छूट, जो कारपोरेट कर दाताओं के छूटों के तुलना में दसवां हिस्सा भी नहीं है, को निकाल दिया जाए तो केन्द्रीय कर प्रणाली के केन्द्रीय राजस्व पर पडऩे वाला अधिकतर प्रभाव कारपोरेट जगत को मिलने वाली छूटों के कारण है। वर्तमान में केन्द्र सरकार के पास राज्यों को उनका हिस्सा देने के बाद बहुत कम राजस्व बचता है, ऐसे में कारपोरेट जगत को दी जाने वाली अनावश्यक छूटों को कम करने का विशेष उपाय किया जाना जरूरी हो गया है। हालांकि इस बजट में वित्तमंत्री ने इस बावत कुछ घाषणाएं की हैं, लेकिन इससे कहीं अधिक काम करने की जरूरत है।

घाटा घटने से महंगाई पर अंकुश
पिछले वर्षों में राजकोषीय घाटा खासा बड़ा रहता रहा है। पिछले साल के संशोधित अनुमानों के अनुसार यह जीडीपी का 4.1 प्रतिशत रहा। बजट में वित्तमंत्री ने राजकोषीय घाटे को अगले साल 3.9 प्रतिशत और अगले तीन सालों में 3 प्रतिशत तक ले जाने की बात कही है। गौरतलब है कि राजकोषीय घाटा वर्ष 2008-09 में 6.0 प्रतिशत तक पहुंच गया था। पिछले सालों में लगातार बढ़ती महंगाई के पीछे यह एक प्रमुख कारण था। गौरतलब है कि इस घाटे की पूरी भरपाई उधार से न कर पाने के कारण सरकार को रिजर्व बैंक से ऋण लेना पड़ता है और इस कारण से ज्यादा नोट छपते हैं और महंगाई बढ़ती है। पिछले 4 साल का जायजा यदि लें तो हर साल करेंसी की मात्रा 9 से 17 प्रतिशत तक बढ़ी, जो महंगाई का प्रमुख कारण रही। आशा की जा सकती है कि राजकोषीय घाटे को काबू में रखने की प्रतिबद्धता आम आदमी के लिए महंगाई पर अंकुश लगाएगी।

मेक इन इंडिया’
‘मेक इन इंडिया’ इस सरकार का नारा रहा है, जिसका मतलब है कि भारत में ही वस्तुओं का उत्पादन। गौरतलब है कि आज हमारे टेलीकॉम के आयात 100 अरब डालर तक पहुंच रहे हैं। आज देश में कम्प्यूटर चिप से लेकर कम्प्यूटर, मोबाईल फोन समेत विभिन्न प्रकार के टेलीकॉम उत्पाद आयात किए जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि इन वस्तुओं के आयात पर कम शुल्क लगता है, जबकि देश में उत्पादन करने पर ज्यादा टैक्स देने पड़ते हैं, यह बात पहली बार आर्थिक सर्वेक्षण में भी स्वीकार की गई। ऐसे में स्वभाविक ही था कि सरकार ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के अनुसार इस विसंगति को दूर करे। बजट में आयातित स्पेयर पार्ट पर शुल्क कम करने का प्रावधान रखा गया है। सरकार का कहना है कि इससे ‘मेक इन इंडिया’ को बल मिलेगा और तैयार माल के आयात घटेंगे। इसके साथ ही यह जरूरी था कि विदेशों से इन वस्तुओं के आयातों पर शुल्क को बढ़ाया जाता, ताकि भारत में बना सामान प्रतिस्पर्धा में टिक सके।

मध्यम वर्ग को निराशा
भारतीय जनता पार्टी द्वारा चुनावों के दौरान यह संकेत दिया गया था कि आयकर की छूट की सीमा बढ़ाई जाएगी, लेकिन ऐसा लगता है कि राजस्व की कमी के दबाव के चलते सरकार अपने वायदे को पूरा नहीं कर पाई। हालांकि न्यू पेंशन स्कीम में निवेश और स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम भरने पर कर में छूट जरूर बढ़ाई गई है। साथ ही साथ नौकरी पेशा लोगों के लिए ट्रांसपोर्ट एलाउंस पर छूट की सीमा भी बढ़ी है, जिसका थोड़ा बहुत फायदा मध्यम वर्ग को मिलेगा।

लेकिन, ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग की अनदेखी हुई है। छोटे और माइक्रो उद्योगों के लिए ऋण की सुविधा बढ़ाने हेतु ‘मुद्रा बैंक’ की स्थापना और उसके लिए 20,000 करोड़ रूपए का प्रावधान व्यापार और छोटे उद्योगों में लगे मध्यम वर्ग के लिए एक बड़ी सुविधा लाएगा, ऐसा माना जा सकता है। गरीब वर्ग के लिए सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान जैसे, 12 रूपए सालाना देकर 2 लाख का दुर्घटना बीमा, 365 रूपए देकर 2 लाख का सामान्य बीमा (प्राकृतिक मृत्यु), वृद्धावस्था पेंशन हेतु सरकार द्वारा अंशदान कुछ ऐसे कदम हैं जो गरीबों के हित में कहे जा सकते हैं।

हालांकि सरकार ने कहा है कि व्यापार, व्यवसाय को आसान बनाने के लिए नियमों को सुगम बनाया जाएगा और बिना वजह अनुमतियों के चक्कर में व्यवसाय शुरू करने में कठिनाई दूर होगी, जिसे ‘प्लग एंड प्ले मॉडल’ का नाम वित्तमंत्री ने दिया है। देश में व्यापार, व्यवसाय और उत्पादन के लिए बेहतर वातावरण देगा, ऐसा माना जा सकता है। यह बजट सरकार राजकोष में आई भारी कमी की चुनौती के बावजूद एक ऐसा बजट कहा जा सकता है, जिसमें गरीब और छोटा काम करने वालों से लेकर बड़े-बड़े कारपोरेट को खुश करने की कोशिश की गई है।

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