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अहिंसा और लोक-मंगल

अहिंसा और लोक-मंगल

सभी प्राणी सुख से जीना चाहते हैं। दु:ख सभी को अप्रिय है। फिर भी दु:ख जीवन में आ जाते हैं बिना बुलाए मेहमान की तरह, अनाहत अतिथि की तरह दुख हमारे जीवन-द्वार पर पुन:-पुन: आकर दस्तक देते हैं।

पिछले जन्म में हमने जो कर्म किए उन्हें हम देख नहीं सकते हैं। अचानक कोई बीमारी आ जाती है। निश्चित ही वह किसी दुष्कर्म का फल भोग है। परन्तु इतना ही मानकर तो हम चुप नहीं हो जाते हैं। बीमारी आती है तो उसका उपचार भी हम कराते ही हैं और बीमारी ठीक भी हो जाती है। कभी-कभी प्रगाढ़ कर्मबंध होने पर बीमारी ठीक भी नहीं हो पाती है। परन्तु उपचार तो हम करते ही हैं। बीमारी का आना कर्मगत है। उपचार करना-कराना व्यावहारिक है।

जगत के प्राणियों के प्रति हमारी यह भावना रहनी चाहिए कि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो, कोई प्राकृतिक आपदा उन पर न आए, कोई विपत्ति उन्हें न घेरे। प्राकृतिक मर्यादाएं स्थिर रहें। लोक मंगल की ये भावनाएं जब जन-जन के हृदय में प्रबल बनती हैं तो लोक में अवश्य ही मंगल होता है।

एक-दूसरे के प्रति मन में द्वेष और अमंगल का भाव न रहे। एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय के उत्थान और प्रभाव से ईष्र्या न करें। एक जाति दूसरी जाति की अवनति न चाहे। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से बैर न रखे।

सभी मानव समान हैं। सभी मानवों के एक जैसे अंगोपांग और शक्लों-सूरत हैं। कोई भारत में जन्मा हो या अमेरिका में, सबके शरीरों में लाल रक्त ही बहता है। हिन्दू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो, सभी के सीने में एक जैसा हृदय धड़कता है। सब जगह सब समान हैं, फिर पारस्परिक पे्रम में बाधा कैसी? समस्त मनुष्यों के हृदयों में मौलिक संभावनाएं समान होते हुए भी परस्पर विग्रह और विद्वेष क्यों?

हमें विग्रह नहीं चाहिए, विद्वेष नहीं चाहिए, ईष्र्या और घृणा नहीं चाहिए। ये दानवीय दुर्गुण हैं। हम सब मानव हैं, एक जैसे हैं। एक-दूसरे के प्रति हमारे हृदयों में सद्भाव रहे, कल्याण कामना रहे कि जन-जन सुखी हो, जन-जन का कल्याण हो। कभी किसी पर कोई कष्ट न आए। सभी में धर्म भावना का विकास हो, सभी अपनी आत्मा के चरम लक्ष्य को साधे।

हमारे अन्दर सर्वोदय की भावना का विकास हो। सर्वोदय शब्द का अर्थ है समस्त प्राणियों का उदय, सभी का उत्थान। जब हम सभी के उत्थान की भावना रखेंगे तो हमारा भी उत्थान अवश्य होगा। जब समष्टि का हित होगा तो हमारा भी हित होगा।

आप मानवता को दीवारों में कैद मत कीजिए। आप जिस देश में रहते हैं उस देश के मनुष्यों और दूसरों देशों में रहने वाले मनुष्यों में मौलिक रूप से कोई भेद नहीं है। जब मानव, मानवता के सच्चे अर्थों को समझ लेगा तो उसके हृदय से बैर-विरोध स्वत: ही विदा हो जाएगा।

जैन धर्म का एक मौलिक सूत्र है- ‘परस्परोग्रहो जीवानाम्’।

यह सूत्र जैन धर्म को विश्व धर्म के ऊंचे सिंहासन पर आसीन करता है। इस सूत्र का अर्थ है- प्रत्येक प्राणी का जीवन पर पारस्परिक उपकार भाव पर आधारित है। प्रत्येक प्राणी को प्रत्येक प्राणी पर कृपाभाव बरसाना चाहिए। जीवमात्र में यदि यह उपकार भाव, कृपा-करुणा का भाव उतर आए तो यह सृष्टि स्वर्ग बन जाएंगी।

जब आपका चित्त अहिंसा से अनुप्राणित है तो आप से करुणा बहती है, प्रेम बहता है, सद्भाव, मैत्रीभाव और स्नेहभाव बहता है। समष्टि के लिए सुख और शांति की सरिताएं आपके हृदय से प्रवाहित होती है। उससे सबका कल्याण होता है। सबका हित होता है।

प्रस्तुति: ललित गर्ग

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