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कर्म प्रधान है फल नहीं

कर्म प्रधान है फल नहीं

क्रियाशील दुनिया में हर प्राणी अपने-अपने कार्य में लगा हुआ है। व्यक्ति के द्वारा होने वाले प्रत्येक कार्य को हम कर्म कहते हैं। वास्तविक कर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। कर्म केवल हमारे द्वारा होने वाला कार्य नहीं हो सकता। जब हमारा कार्य ईश्वर की इच्छा से, ईश्वर के लिए किया जाता है तो वहीं कार्य कर्म कहलाता है। लेकिन, एक सांसारिक व्यक्ति के लिए अपनी इच्छा से अधिक ईश्वर की इच्छा को मान कर कार्य को संपादित करना बहुत कठिन होता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने ईश्वर प्राप्ति के लिए अनेक मार्ग दर्शाए हैं उनमें से प्रधान तीन मार्ग हैं- कर्म योग, भक्ति मार्ग और ज्ञानयोग। यह तीनों ही मार्ग प्रमाणित हैं। इन सब में भी कर्मयोग सबसे सरल एव अनुकूल मार्ग है।

कर्म के दो हिस्से हैं। कर्ता और क्रिया, कर्म योग के अनुसार कर्ता को गौण माना जाता है। अपने लिए किया गया कोई भी कर्म, कर्म नहीं हो सकता है। कर्ता को पहचानने के लिए कर्म को सविस्तृत भाव से देखना पड़ेगा। कोई भी व्यक्ति उद्देश्य, लोभ, मोह से दूर होकर सांसारिक तथा मानसिक क्रियाओं को कर्म कह सकते हैं। कर्म की प्रक्रिया सदा-सर्वदा, जाने-अनजाने चलती रहती है। अपने लिए कर्म करने से अपना संबंध कर्मफल के साथ हो जाता है। लेकिन, यही कर्म दूसरों के लिए करने लगते हैं तो कर्मफल का संबंध परमात्मा के साथ जुड़ जाता है। दूसरों के लिए किए जाने वाले कर्म से हमारे अंदर का अंहकार मिटता है। जब हमारे अन्दर से अहंकार मिटता है तब हम ईश्वर के निकट हो जाते हैं।

फल प्राप्ति की आशा से हमें कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए ,गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत सुंदर रूप से वर्णन किया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सड्गोअस्त्वकर्मणि।।

साधारण मनुष्य यह जरूर सोचता है कि बिना फल के हम कर्म क्यों करें? लेकिन ये वाक्य जो स्वयं भगवान ने कहे हैं वह प्रमाणित है। जब हम किसी फल की प्राप्ति के लिए कर्म करते हैं तो हम कर्म मजबूर हो कर करते हैं सिर्फ फल को प्राप्त करने के लिए और जब हमें उम्मीद के मुताबिक फल नहीं मिलता तो हम निराश हो जाते हैं। लेकिन अगर हम बिना फल की प्राप्ति के बारे में सोचे कर्म करते हैं, तो परिणाम निश्चित रूप से अच्छा मिलता है। जब एक छोटा बच्चा कोई कार्य करना शुरू करता है तो उसके मन में कोई भी आकांक्षा नहीं होती तब उसका काम प्रशंसनीय होता है। हम उसके मन में प्रतियोगिता में अव्वल आने के लिए जोर डाल कर उसके मन में फल की इच्छा को जागृत कर देते हैं। जो उसकी स्वाभाविक उन्नति में बाधा उत्पन्न करती है।

शास्त्रों के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि कर्म को यज्ञ मानकर करना चाहिए। अपने कर्म से सबकी सेवा करनी चाहिए। कर्म करने से समाज की उन्नति होने के साथ-साथ अपनी आत्मा का उत्थान भी होता है। देखा जाए तो पूरी सृष्टि में सदा-सर्वदा यही यज्ञ चलता रहता है। सूर्य का प्रकाश, हवा का आत्म-समर्पण, पृथ्वी की सहिष्णुता, वृक्षों की दानशीलता यह सभी दृष्टान्त समझने के लिए उचित हैं। जब सूर्य सुबह से शाम तक दुनिया को प्रकाशित करता है तो वह यह नहीं सोचता कि उसके उपरान्त उसे क्या मिलेगा। वह केवल ईश्वर के आदेश का पालन करता है। तभी तो विश्व में समस्त ऊर्जा का आधार सूर्य को मानते हैं। अगर हम हर कार्य को ईश्वर की इच्छा और आज्ञा मानकर करेंगे तो हमारी जिंदगी खिल उठेगी गीता में भी यह कहा गया है कि अनासक्त कर्म के द्वारा अपना अंत:करण शुद्ध हो जाता है। जिससे हमें परमात्मा की कृपा से तत्वज्ञान अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

उपाली अपराजिता रथ

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