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आखिर कौन है मोहम्मद जुबैर?

आखिर कौन है मोहम्मद जुबैर?

तथाकथित फैक्ट चेकर  मोहम्मद जुबैर का नाम बेहद चर्चा में है। उसे दिल्ली पुलिस ने धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया है। जुबैर के पक्ष और विपक्ष में माहौल गरम है। विपक्षी दल और मजहबी कट्टरपंथियों के झुंड जुबैर के समर्थन में सोशल मीडिया पर लगातार कैंपेन चला रहे है। वहीं उसके खिलाफ भी माहौल बनाया जा रहा है।

मोहम्मद जुबैर वही कथित फैक्ट चेकर और पत्रकार है जिसने नूपुर शर्मा की विवादित क्लिप ट्विट पर डाली थी। जिसकी वजह से पूरे देश में दंगों का माहौल बन गया था। मामला विदेश तक पहुंच गया था और भारत सरकार को भी बयान जारी करना पड़ा था।

 

मोहम्मद जुबैर के बारे में कोई जानकारी नहीं उपलब्ध

आश्चर्य की बात है कि देश-विदेश में इतना हंगामा मचाने वाले मोहम्मद जुबैर के बारे में जब आप जानने की कोशिश करते हैं तो कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती। सिर्फ इतना पता चलता है कि साल 2017 में मोहम्मद जुबैर ने प्रतीक सिन्हा नाम के एक शख्स के साथ मिलकर अछळ ठी६२ नाम की एक वेबसाइट शुरू की थी। जिसमें कथित रुप से फैक्ट चेकिंग का काम किया जाता था। लेकिन इन कथित फैक्ट चेक करने वाले मोहम्मद जुबैर के बारे में कोई फैक्ट इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है। उसकी वेबसाइट पर सिर्फ एक लाइन की जानकारी है। ट्विटर पर भी कोई जानकारी नहीं है।

मोहम्मद जुबैर के बारे में जो भी सूचना उपलब्ध है, वो साल 2017 के बाद की है। उसके पहले वो क्या करता था, उसका बैकग्राउंड क्या है। इस बारे में कोई भी जानकारी घंटों रिसर्च करने के बाद भी नहीं मिल पा रही है। बहुत मुश्किल से बीबीसी पर एक लाइन लिखी मिलती है कि जुबैर अछळ ठी६२ स्थापित करने से पहले 13 साल तक टेलीकॉम इंडस्ट्री में काम करता था। लेकिन वो क्या काम करता था, किस पद पर था, उसकी जिम्मेदारियां क्या थीं। इस बारे में विस्तार से कुछ भी नहीं बताया गया है।

अब सवाल ये है कि पूरी दुनिया के फैक्ट चेक का दावा करने वाले मोहम्मद जुबैर के फैक्ट कहां हैं? आखिर क्या छिपाने की कोशिश की जा रही है?

आखिर पत्रकार कैसे हो गया मोहम्मद जुबैर

मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेसी, वामपंथी, समाजवादी, तृणमूल कांग्रेस सभी एकजुट होकर उसके पक्ष में माहौल बना रहे हैं। क्योंकि मौका सरकार के विरोध का है। इसलिए सबने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। जुबैर की गिरफ्तारी को पत्रकारिता पर हमला, अभिव्यक्ति की आजादी का दमन जैसे स्लोगन देकर उसके गुनाह को ढकने की कोशिश की जा रही है।

लेकिन मजेदार बात ये है कि जुबैर खुद को पत्रकार बताता ही नहीं है। उसने एक ट्वीट का जवाब देते हुए खुद लिखा है कि वो पत्रकार नहीं है। हालांकि जुबैर इस बात का जवाब नहीं देता कि जब वो पत्रकार नहीं है तो खबर लिखना और फैक्ट चेक के नाम पर उलूल जुलूल हरकतें करने की छूट उसे किसने दी। अगर जुबैर एक ट्रेंड पत्रकार होता तो शायद वह मामलों की गंभीरता को समझता और जिम्मेदारी से काम करता। लेकिन वह खुद कहता है कि वो पत्रकार नहीं है फिर भी फैक्ट चेक के नाम पर भ्रम फैलाता रहता है।

इस बात का सबसे बड़ा गवाह नूपुर शर्मा का मामला है। जिसमें उसने बहस के दौरान गुस्से में दिए गए नूपुर के बयान को इतना प्रचारित किया कि देश में दंगा भड़क गया। करोड़ों की संपत्ति नष्ट कर दी गई। विदेश में भारत की छवि खराब हुई। आगजनी और हिंसा की घटनाएं हुई। कई लोगों की जान चली गई।

यह घटना साबित करती है कि मोहम्मद जुबैर को पत्रकारिता का समझ नहीं है। तो फिर उसे खबरों को प्रसारित करने का अधिकार कैसे मिल गया, वो भी गलत नजरिए से। अदालत भी मोहम्मद जुबैर के गुनाहों से वाकिफ है। इसलिए उसे जमानत नहीं मिल रही है। जुबैर की कुत्सित मानसिकता इस बात से भी उजागर होती है कि साल 2020 में उसने एक नाबालिग बच्ची का चेहरा उजागर कर दिया था। जिसकी वजह से उस पर केस दर्ज किया गया था।

इस आरोप में हुई है मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी

20 जून को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की कऋरड यूनिट में प्राथमिकी दर्ज की गई है। जिसमें ड्यूटी आॅफिसर ने बताया है कि मॉनिटरिंग के दौरान उन्होंने देखा कि किसी हनुमान भक्त, ट्विटर आईडी ने मोहम्मद जुबैर का एक ट्वीट शेयर किया था। उसमें धार्मिक भावनाएं भड़काने वाली आपत्तिजनक बातें लिखी गई थीं। इसे साल 2014 में जुबैर के अकाउंट से ट्वीट किया गया था।

इस ट्वीट में हिंदुओं के आराध्य देवता ब्रह्मचारी हनुमान जी की तुलना हनीमून से की गई थी। जिसकी वजह से धार्मिक भावनाएं आहत हो रही थी। इस पर एक्शन लेते हुए दिल्ली पुलिस ने आईपीसी की धारा 153अ और 295 के तहत एफआईआर दर्ज की और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि जुबैर की दलील है कि यह एक फिल्म का पोस्टर है। लेकिन वह इस बात का जवाब नहीं दे रहा है कि उसने इस पोस्टर के साथ इीाङ्म१ी 2014 आ३ी१ 2014 का जो कैप्शन लिखा। उसके पीछे उसकी मंशा क्या थी।

जुबैर के गुनाहों की लंबी है फेहरिस्त

’ मोहम्मद जुबैर ने आपसी झगड़े के एक वीडियो को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश करते हुए एक वीडियो शेयर किया। जिसमें कुछ लोग एक बुजुर्ग को पीटते हुए उससे जय श्री राम बुलवा रहे हैं। ये मामला झूठा निकला क्योंकि आरोपी और पीड़ित दोनों मुस्लिम थे। जो कि आपसी रंजिश की वजह से झगड़ा कर रहे थे। लेकिन जुबैर ने ये साबित करने की कोशिश की थी कि हिंदुओं ने मुसलमान बुजुर्ग को जय श्री राम बुलवाने के लिए पीटा। जबकि पीटने वालों के नाम आरिफ, आदिल और मुशाहिद थे। पुलिस की जांच में इस मामले का खुलासा हुआ।

’ मोहम्मद जुबैर ने एक न्यूज वेबसाइट पर इंटरव्यू दे रहे एक शख्स का वीडियो यह बताते हुए शेयर किया कि वो मोदी सरकार का समर्थक है और अब विरोधी हो चुका है। लेकिन बाद में पता चला कि सरकार की खामियां गिनाने वाला वह शख्स कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा हुआ है।

’ कोरोना संकट के लॉकडाउन के समय मोहम्मद जुबैर ने दो जैन मुनियों का वीडियो शेयर करके आरोप लगाया कि वो लॉकडाउन का उल्लंघन कर रहे हैं। जबकि बाद में खुलासा हुआ कि ये दोनों जैन मुनि लॉकडाउन के दौरान भूखे पशु पक्षियों के लिए भोजन का इंतजाम कर रहे थे। लेकिन इस वीडियो में भोजन के पैकेट और फल फूल को छिपा लिया गया।

’ कोरोना के दौरान महंत गोपालदास कोरोना पीड़ित हुए तो मोहम्मद जुबैर ने उनके साथ सरसंघचालक मोहन भागवत की बगल में बैठी फोटो शेयर की। इसका मकसद था कि भागवत जी को भी आइसोलेशन में भेज दिया जाए। लेकिन बाद में पता चला कि इस तस्वीर को फोटो शॉप करके दोनों को साथ में बैठा दिखाया गया था।

’ प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात कार्यक्रम द्वारा जनता से जुड़ने के कार्यक्रम की आलोचना करते हुए मोहम्मद जुबैर ने लिखा कि मैक्सिको में टीवी के जरिए पढ़ाई की जाती है, लेकिन यहां दूरदर्शन प्रधानमंत्री के मन की बात के प्रसारण में लगा रहता है। बाद में जब जवाब मिला कि भारत में 3 दर्जन से ज्यादा चैनल बच्चों के साथ-साथ उच्च शिक्षा के काम में लगे हुए हैं। बाद में शर्मिंदा होकर जुबैर ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

इस तरह के दर्जनों और भी उदाहरण हैं। जब मोहम्मद जुबैर ने गलत तरीके से तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की और समाज में वैमनस्य और हिंसा फैलाने की कोशिश की। जैसे श्री राम जन्मभूमि के लिए चंदा इकट्ठा करने के कार्य को जुबैर ने बदनाम करने की कोशिश की, जामिया के पत्थरबाज छात्रों को बचाने की कोशिश की, तनिष्क शोरुम के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसक बताने की कोशिश, सनातनी दलितों को हिंदू विरोधी साबित करने की कोशिश…जैसे कई गुनाह मोहम्मद जुबैर के सिर पर हैं।

लेकिन सबसे बड़ी जांच का विषय ये है कि आखिर मोहम्मद जुबैर की नीयत क्या थी। आखिर क्यों इंटरनेट पर उसने अपने पिछले जीवन की जानकारी छिपा रखी है? इन बातों की बारीकी से जांच होनी चाहिए। कहीं इसके पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं है?

आपको बता दें कि मोहम्मद जुबैर को सनातनी प्रतीकों से विशेष घृणा थी। जिसका सबूत उसका ये खास ट्वीट भी है-

 

 

अंशुमान आनंद

 

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