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मुंबई के राजनीतिक ज्वार का क्या है संदेश?

मुंबई के राजनीतिक ज्वार का क्या है संदेश?

अरब सागर के किनारे स्थित मुंबई यूं को ज्वार और भाटा का अनुभव बहुत है। ज्येष्ठ महीने में जब पूरे देश में मानसून का इंतजार हो रहा था, मुंबई में हर महीने के आखिर की तरह एक ज्वार आया और यहां के राजनीति माहौल को सराबोर कर गया। नई शिवसेना के महज 39 विधायकों के समर्थन वाले  एकनाथ शिंदे की अगुआई में अरब सागर की नई लहर की तरह नई सरकार मुंबई पर काबिज हो गई। 2019 के विधान सभा चुनावों में विधान सभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भारतीय जनता पार्टी के नेता देवेंद्र फडणवीस के हाथों से सत्ता यूं फिसल गई, जैसे मुट्ठी से रेत फिसल जाती है। राज्य के दो  बार मुख्यमंत्री रह चुके फडणवीस को अपने आलाकमान के निर्देश पर भारी मन से उप मुख्यमंत्री का पद संभालना पड़ा है।

महाराष्ट्र के राजनीतिक संदेश क्या हैं? शिवसेना के विरासती प्रमुख उद्धव ठाकरे भले ही मायूस मन से भाजपा को अपनी बात याद दिलाते रहें। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकाकर बड़ा संदेश दिया है। संदेश यह कि हिंदुत्व की बुनियाद पर महाअघाड़ी जैसे गठबंधनों के राजनीतिक भवन को चाहे जितना भी मजबूत बनाने की कोशिश हो, वह मजबूत नहीं हो सकता। हिंदुत्व के पेड़ पर सेक्युलरवाद की हवा नहीं बहाई जा सकती। अगर महाअघाड़ी की तरह बहाने की कोशिश होगी तो उसका एक हश्र एकनाथ शिंदे जैसा हो सकता है।

भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में अकेले चुनाव लड़ा था। तब उसका शिवसेना से पुराना गठबंधन टूट चुका था। चुनाव मैदान में शिवसेना के कुछ नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी के लिए सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल भी किया था। इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी। उस वक्त उसके 122 विधायक जीते थे। सात निर्दलीयों में से चार उसके ही पुराने साथी थे। इसी तरह शिवसेना 63 सीटें जीत पाई थीं। बाद में दोनों ने मिलकर सरकार बनाई। इसका असर अव्वल तो यह होना चाहिए था कि भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली गठबंधन को जीत मिलती। लेकिन इसका ठीक उलट हुआ। जीत तो मिली, लेकिन दोनों ही दलों की सीटें घट गईं। भारतीय जनता पार्टी 105 सीटों पर सिमट गई, यही स्थिति शिवसेना की भी रही, जिसकी सीटें 54 रह गईं। यानी भारतीय जनता पार्टी को 17 सीटों का नुकसान हुआ तो शिवसेना को नौ सीटों की कमी रही। भारतीय जनता पार्टी अब मान चुकी है कि शिवसेना के साथ होने से उसे नुकसान ही होना है। इसलिए वह नई शिवसेना को आत्मसात करने की कोशिश भी कर सकती है।

अव्वल तो होना यह चाहिए था कि दोनों दल साथ मिलकर सरकार बनाते, क्योंकि दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़े थे। लेकिन शिवसेना के विरासती सुप्रीमो की सत्ता की ललक जाग गई। इसके पहले तक शिवसेना का विरासती सुप्रीमो परिवार सत्ता का नैतिक केंद्र होता था, लेकिन इस बार वह खुद सत्ता का ताज संभालने उतर पड़ा। मुंबई में लोग मानते हैं कि इसके पीछे उद्धव ठाकरे से ज्यादा उनके बेटे आदित्य ठाकरे का हाथ ज्यादा रहा। यहीं से रार बढ़ी और भारतीय जनता पार्टी से शिवसेना ने अपनी राह अलग चुन ली। वह उस कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ जा मिली, जिससे उसके वैचारिक आधार पर दूर-दूर तक समानता नहीं थी।

इसका असर हुआ पालघर कांड, जिसमें दो निर्दोष साधुओं की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी। इसे लेकर इसलिए विवाद हुआ, क्योंकि शिवसेना की पूरी वैचारिक बुनियाद उग्र हिंदुत्व की वैचारिकी पर आधारित है। भारतीय जनता पार्टी भी हिंदुत्व की राजनीति करती है। लेकिन बाबरी ढांचे के ध्वंस का उसने कभी दावा नहीं किया, लेकिन शिवसेना के पहले सुप्रीमो खुलकर इसका श्रेय तक ले चुके थे।

दिलचस्प यह है कि शिवसेना के विरासती सुप्रीमो उद्धव उस सरकार के मुखिया भले रहे, लेकिन गृह जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय अपेक्षाकृत संशयी राजनीतिक साख वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पास रही। जिन अनिल देशमुख ने गृहमंत्रालय संभाला, वे खुद जेल की हवा खा रहे हैं।

शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी की राह भले ही अलग हो गई, लेकिन शिवसेना के विधायक हिंदुत्व से दूर नहीं हुए और उसी वैचारिकी के चलते भारतीय जनता पार्टी के साथ खुद को सहज महसूस करते रहे। रही-सही कसर पूरी कर दी सरकार की अंदरूनी खींचतान और संजय राऊत की बदजुबानी ने। एक तरफ शिवसेना के विधायकों की पूछ सरकार में लगातार कम होती चली गई, तो दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे तक उनकी पहुंच भी कम होती चली गई। इसका फायदा तो भारतीय जनता पार्टी को उठाना ही था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जिस महाराष्ट्र में स्थापना हुई, उसकी वैचारिकी पर स्थापित भारतीय जनता पार्टी अब तक महाराष्ट्र में कभी एक छत्र समर्थन हासिल नहीं कर पाई। दिलचस्प यह है कि जनता पार्टी से अलग होने के बाद भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को मुंबई में ही हुई थी। यहां याद करना चाहिए कि जिस भारतीय जनता पार्टी का झंडा जब तमाम गैर मराठी राज्यों में अपने दम पर लहरा रहा हो, उसका महाराष्ट्र में काबिज न होना कसक का आधार न बने, ऐसा कैसे हो सकता है। चूंकि शिवसेना का सहयोग से वह हिंदुत्व के वैचारिक आधार पर विकास का नया मॉडल प्रस्तुत करती रही है। लेकिन वही शिवसेना अपने अतिवादी व्यवहार के चलते जब अलग हो गई तो भारतीय जनता पार्टी को अपनी राह तलाशनी ही थी और उसने राह तलाश भी ली।

दिलचस्प यह है कि महाराष्ट्र के आॅपरेशन में भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी शामिल रहा। हालांकि महाराष्ट्र इकाई और देवेंद्र फडणवीस को ऐसा लगता रहा कि सिर्फ वे ही इस आॅपरेशन के अगुआ हैं। केंद्रीय नेतृत्व के हाथ का स्पष्ट संकेत तब दिखा, जब उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा दिया। इसके बाद महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी उत्साह में डूबी थी। देवेंद्र फडणवीस भावी मुख्यमंत्री के तौर पर संयत उत्साह से भरे नजर आ रहे थे। लेकिन अगले ही दिन नजारा बदल चुका था। मराठा नेता एकनाथ शिंदे नए नायक बन चुके थे। फडणवीस को खुद को सत्ता से अलग रखने का ऐलान करने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन उनकी यह मजबूरी दूसरी मजबूरी में बदल गई, जब भारतीय जनता पार्टी के आलाकमान ने उन्हें उप मुख्यमंत्री बनने का फरमान सुना दिया।

शिवसेना में यह चौथा विद्रोह था। पहली बार 1985 में नौ विधायकों के साथ छगन भुजबल अलग हुए थे। शिवसेना में दूसरा विद्रोह इसके ठीक बीस साल बाद 2005 में हुआ, जब राज ठाकरे को दरकिनार करने के खिलाफ नारायण राणे ने आवाज बुलंद की और अपनी अलग राह चुन ली। उन्हीं दिनों राज ठाकरे भी अलग हुए थे। शिवसेना में यह तीसरा विद्रोह रहा। चौथा विद्रोह एकनाथ शिंदे की अगुआई में इस बार हुआ है। पहले के तीनों विद्रोहों से शिवसेना के कम से कम शिवसेना के विधायक दल को वैसा चोट नहीं पहुंचा पाए, जैसा इस बार हुआ है। दिलचस्प यह है कि शिवसेना के पहले विद्रोह में हिंदुत्व कोई आधार नहीं था। इसके साथ ही पहले तीनों विद्रोहों का आधार व्यक्तित्व का टकराव से उपजा था। लेकिन इस बार का विद्रोह हिंदुत्व की सरजमीं को बचाए और बनाए रखने के आधार पर हुआ है। इसलिए कहा जा सकता है, इस विद्रोह ने एक तरह से शिवसेना के हिंदुत्व की वैचारिकी को उसके पैरों के नीचे से पूरी सफाई से खींच लिया है। जाहिर है कि इस विद्रोह से शिवसेना का उबर पाना आसान नहीं है। इस बार ना सिर्फ उसे विधायकों के आधार में जबरदस्त चोट पहुंची है, बल्कि उसका वैचारिक आधार भी सवालों के घेरे में आ गया है।

भारतीय जनता पार्टी इसे समझती है, इसीलिए उसने एकनाथ शिंदे का जूनियर पार्टनर बनना स्वीकार किया है। भारतीय जनता पार्टी की एक समस्या यह रही है कि मराठवाड़ा में तमाम कोशिशों के बावजूद बड़ा समर्थन नहीं मिल पाया है। यहां या तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का मजबूत आधार है या फिर उसके उलट शिवसेना का। अब भारतीय जनता पार्टी की कोशिश होगी कि मराठवाड़ा इलाके में वह नई शिवसेना के जरिए सेंध लगाए और अपना वैचारिक और समर्थक आधार बढ़ाए। इसमें एकनाथ शिंदे की शिवसेना सहयोगी हो सकती है।

भारतीय जनता पार्टी के उत्साह की वजह फरवरी-मार्च में हुए पांच राज्यों के चुनाव और उनमें से चार राज्यों में मिली भारी जीत ने भी बढ़ाया है। वैसे महाराष्ट्र जैसे आॅपरेशन वह पहले कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कर ही चुकी है। वहां मिली सफलता से उसका उत्साहित होना स्वाभाविक है।

भारतीय जनता पार्टी की घोषित नीति है देश को कांग्रेस मुक्त करना। यह अच्छा है या बुरा, इस पर विचार की यहां गुंजाइश नहीं है। बहरहाल महाराष्ट्र के आॅपरेशन से भारतीय जनता पार्टी ने संदेश दिया है कि वह नहीं चाहती कि आम चुनावों से पहले महत्वपूर्ण राज्यों में कांग्रेस सत्ता में रहे। चूंकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार है। इसलिए वहां ज्यादा गुंजाइश नहीं। लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी झारखंड में भी ऐसा ही आॅपरेशन कर सकती है या करने की तैयारी में है। ताकि वहां की सत्ता में शामिल कांग्रेस को सत्ता से दूर किया जा सके।

महाराष्ट्र के सफल आॅपरेशन का एक और संकेत यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी 2024 के आम चुनावों के लिए अपना गढ़ सुरक्षित कर लेना चाहती है। पार्टी की तैयारी से लगता है कि वह अगले आम चुनाव में भी भारी बढ़त की तैयारी में है। इसलिए उसने अभी से अपने पत्ते फेंटने और फेंकने शुरू कर दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी इसके जरिए देश की जनता को यह भी संदेश देने की तैयारी में नजर आती है कि वही एक मात्र पार्टी है, जो देश के किसी भी कोने में बाकी दलों की तुलना में बेहतर और मजबूत शासन दे सकती है। देवेंद्र फडणवीस को एकनाथ शिंदे का डिप्टी बनाकर पार्टी ने यह भी संदेश दिया है कि उसके यहां अनुशासन सर्वोपरि है और उसके दायरे में उसका हर कार्यकर्ता रहता है।

देश की सत्ता के बारे में कहा जाता है कि दिल्ली की राह उत्तर प्रदेश और बिहार से गुजरती है। यह राजनीतिक सच तो है, लेकिन इसमें यह भी जोड़ दिया जाना चाहिए कि महाराष्ट्र का साथ मिले तो दिल्ली की दूरी और कम हो जाती है। दरअसल महाराष्ट्र आर्थिक गतिविधियों के साथ ही आर्थिक जगत के प्रमुख लोगों का राज्य है। मुंबई महज महाराष्ट्र की राजधानी नहीं, बल्कि देश की आर्थिक राजधानी भी है। देश की आर्थिकी की मजबूत डोर उसके ही हाथों में है। जाहिर है कि जिसका यहां कब्जा होता है, उसका देश की आर्थिकी पर भी नियंत्रण होता है। भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र के आॅपरेशन के जरिए अपना यह उद्देश्य हासिल करने में सफल रही है।

मुंबई में ज्वार और भाटा आते रहते हैं। उद्धव सरकार में मलाईदार और ताकतवर मंत्रालयों पर काबिज रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शरद पवार का दर्द समझना आसान है। उन्होंने कहा है कि महाराष्ट्र की नई शिवसेना के विधायकों के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के विधायकों में भारी असंतोष है। इस वजह से शिंदे सरकार महज छह महीनों में ही जमींदोज हो जाएगी। लेकिन ऐसा होना आसान नहीं लगता। उलटे यह हो सकता है कि वैचारिकी से दूर हुई शिवसेना में रह गए विधायकों में से कुछ और भी नई शिवसेना में आ जाएं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की बुनिया में सत्ता की बड़ी भूमिका रही है। उसके नेता हों या विधायक, उनकी बुनावट ही ऐसी नहीं है कि वे सत्ता से ज्यादा दिनों तक दूर रह सकें। ऐसे में उसके यहां होने वाली टूटफूट से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

 

उमेश चतुर्वेदी

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